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बाबरी विध्वंस से शुरू हुआ कड़वाहट का सिलसिला

जब तक संविधान को राजनीतिक बहस के केंद्र में नहीं रखा जाएगा तब तक हमें कड़वाहट का सामना करते रहना होगा।
श्याम सरन /  December 14, 2017

सन 1992 की 6 दिसंबर को जब अयोध्या में नफरत और गुस्से से भरे एक हमले में बाबरी मस्जिद ढहाई जा रही थी, तब मैं और मेरा परिवार मुंबई में था। मुझे मॉरीशस में भारतीय उच्चायुक्त नियुक्त किया गया था और वहीं जा रहा था। बाबरी विध्वंस के बाद मुंबई में भी अफरातफरी मच गई। आसपास के कई इलाकों में सांप्रदायिक झड़पें शुरू हो गईं। ऐसे में हमारे लिए होटल से निकलना तक नामुमकिन हो चला था। हमने पूरा दिन टेलीविजन देखते हुए गुजारा जहां स्वतंत्र भारत के इतिहास की सबसे शर्मनाक घटना की तस्वीरें तैर रही थीं। सबसे चौंकाने वाली बात थी हमले की सुनियोजित और कहें तो पहले से अभ्यास की हुई प्रकृति। बड़ी तादाद में तैनात सुरक्षाकर्मी मूक दर्शक बने देखते रहे और नियम कानून को तार-तार कर दिया गया। इस दौरान नाना प्रकार के राजनेता किनारे खड़े होकर आक्रमणकर्ताओं का उत्साहवर्धन करते रहे। यह घटना वर्ष 1984 की एक और घटना की याद दिलाती है जो इतनी ही शर्मनाक थी। उस वक्त देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके एक सिख सुरक्षाकर्मी द्वारा हत्या किए जाने के बाद कई जगह हिंसक भीड़ ने सिख समुदाय के लोगों को निशाना बनाया। एक व्यक्ति द्वारा की गई हत्या को पूरे समुदाय द्वारा की गई हिंसा से प्रतिस्थापित कर दिया गया। बाबरी मस्जिद मामले में भी कुछ तथाकथित धार्मिक लोगों द्वारा किए गए कृत्य का बदला पूरे समुदाय से लेने का प्रयास किया गया। यह उस आधुनिक और बहुलतावादी लोकतांत्रिक भारत पर जबरदस्त चोट थी जो अपने सभी नागरिकों को जाति और धर्म से परे समान अधिकार सौंपता आया है। 

अगले दिन जब मैं मॉरीशस पहुंचा तो इन सवालों की झड़ी लगी थी कि बाबरी विध्वंस का देश के भविष्य पर क्या असर होगा? मैंने समझाना चाहा कि यह घटना दुर्भाग्यपूर्ण अवश्य है लेकिन इसे सामान्य प्रवृत्ति से जोड़कर न देखा जाए। मैंने कहा कि यह वक्त बीत जाएगा और देश की सहिष्णुता और विविधता, सभी धर्मों के सम्मान की भावना बरकरार रहेगी। परंतु यह स्पष्ट था कि देश में कुछ तो बदलाव आया है। सिख विरोधी दंगों के बाद इस घटना में यह क्षमता थी कि यह देश को संविधान में उल्लिखित पथ से भटका दे। 

भारतीय संविधान की शुरुआत ही इन शब्दों से होती है, 'हम भारत के लोग।' यह कथन बताता है कि देश में सभी लोग समान नागरिक अधिकार संपन्न हैं। संविधान में जो भी अधिकार और दायित्व उल्लिखित हैं वे सभी नागरिकों के लिए हैं। संविधान निर्माताओं ने यह बात समझी कि सामाजिक ढांचे और ऐतिहासिक कारणों से कुछ नागरिकों को अस्थायी तौर पर पात्रता देनी पड़ सकती है ताकि वे अपनी विरासत में मिली कमियों को दूर कर सकें। कुछ लोग अपने सामुदायिक मानकों से जुड़े रहना चाह सकते हैं लेकिन यह उनकी निजी पसंद होगी, न कि कोई सामुदायिक निर्देश। भारतीय कानून व्यवस्था अपने धर्म से बाहर विवाह को वैध मानती है और उसका पंजीयन सिविल मैरिज ऐक्ट के तहत होता है। भले ही समुदाय इसे नकार दें। 

नागरिकता की बात करें तो किसी ऐतिहासिक कष्टï को आधार बनाकर नागरिकों के बीच किन्हीं को वरीयता देने की कहीं कोई गुंजाइश नहीं है, भले ही वह धारणा कितनी भी मजबूत क्यों न हो। अगर एक बार ऐसी किसी समस्या को वैधता दे दी गई तो अन्य किसी शिकायत को खारिज करना मुश्किल होगा। ये शिकायतें वास्तविक या काल्पनिक हो सकती हैं। ये किसी आस्था, जाति, क्षेत्र, भाषा, ऐतिहासिक या मिथकीय चरित्र या किसी समूह के मनमाने मानक पर आधारित हो सकती हैं। एक बार अगर व्यक्तिगत अधिकारों पर सामुदायिक मांगों को वरीयता दी जाने लगी तो आधुनिक बहुलतावादी लोकतंत्र के लिए यह बुरा होगा। संविधान में उल्लिखित 'हम' की भावना के विपरीत हमने 'हम' बनाम 'वे' की बात शुरू कर दी। देश परस्पर प्रतिस्पर्धी समुदायों के केंद्र के रूप में बदलता गया। इसका अपरिहार्य नतीजा है समाज का विघटन। निहित स्वार्थी समूह अन्य समुदायों पर वीटो अधिकार की मांग के साथ सामने आने लगे। मानो वे अन्य समुदायों को संचालित करना चाहते हों। ऐसी कमजोर और संकीर्ण बुनियाद पर राष्ट्रवाद की मजबूत इमारत नहीं खड़ी हो सकती। गुजरात में चंद रोज पहले तक चल रहे चुनाव प्रचार अभियान में सत्ताधारी दल बार-बार यह कह रहा है कि गुजराती अस्मिता और गुजरात के बेटे पर प्रश्न खड़ा किया जा रहा है। इन बातों ने चुनाव के अन्य मुद्दों को अप्रासंगिक बना दिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि एक गुजराती प्रधानमंत्री प्रदेश को ज्यादा लाभ पहुंचा सकता है। ऐसे में वह पूरे देश के प्रधानमंत्री कैसे हो सकते हैं? 

यह बतौर राजनेता केवल उनकी दुविधा नहीं है बल्कि ऐसी दुविधा सबके सामने है। जिस तरह कांग्रेस पार्टी ने राहुल गांधी की हिंदू पहचान को लेकर उठे सवालों को लेकर प्रतिक्रिया दी, वह स्वयं बहुत कुछ कहता है। इस मसले पर रक्षात्मक होने के बजाय वह गर्व से खुद को एक कश्मीरी ब्राह्मïण, एक राष्टï्रवादी पारसी और एक इतालवी रोमन कैथलिक की संतान बता सकते थे, वह भी महज चार पीढिय़ों में। परंतु देश के राजनीतिक फलक में बढ़ती सांप्रदायिक और पंथ आधारित भावनाओं के चलते शायद उनके राजनीतिक प्रबंधकों को लगा होगा कि वैसा करना सही नहीं साबित होगा।

अतीत पर नजर डालें तो हमें यह अंदाजा लगता है कि अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए सांप्रदायिक भावनाओं और पूर्वग्रहों का दोहन करना हमेशा एक नागरिक केंद्रित लोकतांत्रिक भारत के निर्माण की राह में  रोड़ा बना है। समय बीतने के साथ-साथ इन चीजों ने मुख्य राजनीतिक बहस का स्वरूप ले लिया। जब बाबरी मस्जिद ढहाई गई उस वक्त भाजपा के राजनीतिक नेतृत्व ने कार सेवकों के इस कदम की निंदा की थी। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की नाराजगी छद्म नहीं थी। कांग्रेस ने तत्काल बाद उसी स्थान पर मस्जिद का निर्माण किए जाने की मांग की थी। आज शायद ही हमें बाबरी के दोषियों के खिलाफ कुछ सुनने को मिलता हो। राममंदिर निर्माण का शोर बढ़ता ही जा रहा है। भारत की मूल भावना पर हुए इस हमले के खिलाफ एक लफ्ज सुनने को नहीं मिलता। अगर हम अपनी राजनीतिक बहस में संविधान को आगे रखकर काम नहीं करेंगे तो हमें बहुत बुरे नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं। 
 
Keyword: Ayodhya, Babari maszid, अयोध्या , बाबरी मस्जिद,
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