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यूरिया सब्सिडी सुधार से तेल के क्षेत्र में सबक ले सरकार

ए के भट्टाचार्य /  December 13, 2017

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में हालिया तेजी ने केंद्र सरकार की वित्तीय स्थिति को किस हद तक प्रभावित किया है? वर्ष 2017-18 के शुरुआती सात महीनों में सरकार का पेट्रोलियम उत्पादों का सब्सिडी बिल 30 फीसदी बढ़ा है। अप्रैल-अक्टूबर 2016 में यह 16,237 करोड़ रुपये था और वर्ष 2017 की समान अवधि में उसके 21,246 करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया है। 

इस दर से देखें तो मौजूदा वर्ष के अंत तक पेट्रोलियम सब्सिडी करीब 35,000 करोड़ रुपये की हो सकती है। यह राशि 25,000 करोड़ रुपये के बजट प्रावधान से काफी ज्यादा है। अगर पेट्रोल और डीजल पर प्रति लीटर 2 रुपये की उत्पाद शुल्क कटौती के कारण होने वाली 26,000 करोड़ रुपये की वार्षिक राजस्व हानि को इसमें शमिल कर दिया जाए तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि तेल कीमतों के मामले में मोदी सरकार की अच्छी किस्मत का तीन साल का सिलसिला अब थम गया है। 

सरकार क्या कर सकती है? इसका उत्तर चालू वित्त वर्ष के दौरान सरकार के सब्सिडी व्यय के आंकड़ों में निहित है। अगर पेट्रोलियम उत्पादों का सब्सिडी व्यय शुरुआती सात महीनों में 30 फीसदी बढ़ा भी है तो यूरिया के सब्सिडी बिल में 30 फीसदी की कमी भी आई है। गत वर्ष अप्रैल-अक्टूबर के बीच यूरिया सब्सिडी पर 39,123 करोड़ रुपये व्यय किए गए थे जबकि इस वर्ष समान अवधि में यह राशि 27,398 करोड़ रुपये रही। 

यूरिया सब्सिडी बिल में यह कमी इसलिए आई क्योंकि सरकार ने नीम की कोटिंग वाला नया यूरिया पेश किया ताकि उसका दुरुपयोग बंद किया जा सके। सॉइल हेल्थ कार्ड को बढ़ावा देने से भी काफी मदद मिली। परंतु सबसे अहम बात यह है कि यूरिया के कामचलाऊ पैकेटों की बिक्री से कीमतों में बढ़ोतरी आई। नए पैकेट में यूरिया कम था जबकि कीमत पहले के समान थी। इसे आप चोरी चुपके किया गया सुधार कह सकते हैं। आखिरकार, सरकार ने दोनों लक्ष्य हासिल कर लिए। उसने किसानों को यूरिया के अत्यधिक इस्तेमाल से दूर कर लिया क्योंकि वह जमीन की उर्वरता के लिए नुकसानदेह था। साथ ही उसने सब्सिडी का बोझ कम करने में भी सफलता पाई। 

यह याद रखें कि इस अवधि में सरकार की पोषक आधारित उर्वरक सब्सिडी योजना पर बोझ में 6 फीसदी का इजाफा हुआ। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि किसानों को यूरिया की आपूर्ति में जिस तरह के प्रयास अपनाए गए वैसे प्रयास सरकार की पोषक आधारित उर्वरक सब्सिडी योजना में नहीं नजर आए। अब वक्त आ गया है कि सरकार यूरिया के अलावा अन्य उर्वरकों पर भी ध्यान दे। 

इसी प्रकार पेट्रोलियम क्षेत्र को भी अब अगले दौर के सुधारों की आवश्यकता है। पेट्रोल, डीजल और घरेलू गैस की कीमतों में थोड़ा-थोड़ा इजाफा करने की नीति प्रभावी रही है। अब वक्त आ गया है कि कच्चे तेल की रिफाइनिंग के स्तर पर प्रतिस्पर्धा और किफायत बढ़ाई जाए। पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों के निर्धारण में कारोबारी समता के सिद्घांत का पालन करने की उपादेयता और प्रासंगिकता अब समाप्त हो चुकी है। अब रिफाइनरों के बीच यह प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए कि वे कच्चे तेल को सर्वश्रेष्ठï कीमत पर खरीदें और अपने तकनीकी कौशल से उसे अधिक किफायती तरीके से शोधित करें। इससे उन्हें प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद मिलेगी और उनकी लागत में कमी और मार्जिन में इजाफा होगा। इसके साथ ही साथ खुदरा कारोबारियों को भी इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए कि वे अपनी लागत और मार्जिन का ध्यान रखते हुए मूल्य निर्धारण करें। पेट्रोलियम उत्पादों के मूल्य निर्धारण की मौजूदा नीति जिसमें कोई भी बदलाव सर्वसम्मति से घोषित होता है, उसे रद्द किया जाना चाहिए। खुदरा कारोबारियों को रोजमर्रा के आधार पर उत्पाद की कीमत तय करने के अधिकार से भी बदलाव आया है। अब वक्त आ गया है कि इस गतिविधि को अगले स्तर पर ले जाया जाए। 

सब्सिडी व्यय पर लगाम लगाने के मामले में मोदी सरकार का प्रदर्शन अब तक अच्छा रहा है। खाद्य सब्सिडी जरूर इसका अपवाद है जो मनमोहन सरकार के कार्यकाल में वर्ष 2013-14 के 0.92 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर मोदी सरकार के कार्यकाल के वर्ष 2016-17 तक 1.35 लाख करोड़ रुपये हो चुकी है। इसके बावजूद मोदी सरकार ने उर्वरक, खाद्य और पेट्रोलियम उत्पादों के मामले में अपना कुल व्यय कम किया है और यह 2013-14 के 2.45 लाख करोड़ रुपये से घटकर वर्ष 2016-17 में 2.32 लाख करोड़ रुपये रह गया है। सकल घरेलू उत्पाद के एक हिस्से के रूप में भी सरकार का सब्सिडी बिल वर्ष 2013-14 के 2.18 फीसदी से घटकर 2016-17 में 1.52 फीसदी रह गया है। 

चालू वर्ष में जरूर इस रुझान में बदलाव आया होता लेकिन यूरिया सब्सिडी के प्रबंधन में उल्लेखनीय प्रदर्शन ने बचाव किया। अगर रिफाइनरी के लिए कच्चे तेल के मूल्य निर्धारण की व्यवस्था में इस वर्ष सुधार हो गया होता तो सरकार सब्सिडी के मोर्चे पर थोड़ी और सफलता हासिल कर लेती। जब हालात बेहतर हों, उस वक्त जरूरी सुधार करना अच्छा है। तेल कीमतें अभी भी बहुत अधिक नहीं बढ़ी हैं इसलिए गुंजाइश बरकरार है। सरकार के पास मौका है कि वह बाकी के सुधारों को अंजाम दे।
Keyword: oil, market, prize, subsidy, कच्चे तेल, सब्सिडी,
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