बिजनेस स्टैंडर्ड - कटाई के बाद फसल की बरबादी कम करनी जरूरी
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कटाई के बाद फसल की बरबादी कम करनी जरूरी

खेती-बाड़ी
सुरिंदर सूद /  December 12, 2017

कटाई के बाद फसलों की बरबादी में कमी लाने के लिए अब जितना ध्यान दिया जा रहा है, उतना शायद ही पहले कभी दिया गया हो। इसके बावजूद ऐसा नुकसान काफी अधिक बना हुआ है। इससे देश न केवल अपनी मूल्यवान कृषि उपज से वंचित रह जाता है, बल्कि इसे उपजाने में इस्तेमाल होने वाले पानी, बिजली, खाद-बीज जैसे नकद खर्च और किसान की मेहनत बेकार जाते हैं। 

 
खाद्य की यह बरबादी किसान के खेत से शुरू होती है और उपभोक्ताओं के पास पहुंचने तक जारी रहती है, जिसे आमतौर पर फसल की कटाई के बाद की बरबादी कहा जाता है। हालांकि खाद्य की बरबादी यहीं खत्म नहीं होती है। बड़ी मात्रा में खाद्य पकाए जाने के बाद भी बरबाद होता है। फसल की बरबादी में कमी लाने के लिए भंडारण, परिवहन, विपणन एवं प्रसंस्करण जैसी उत्पादन के बाद की मूल्य शृंखला के विस्तार की बात कही जाती है, लेकिन आम तौर पर पके हुए खाने की बरबादी की अनदेखी की जाती है। 
 
अनाज, फल, सब्जियां, मछली और पशुधन उत्पाद जैसे 45 महत्त्वपूर्ण खाद्य उत्पादों के उत्पादन के बाद नुकसान को लेकर पूरे देश में एक सर्वेक्षण किया गया है। इसमें कहा गया है कि हर साल देश में करीब 6.5 करोड़ टन खाद्य पदार्थ बरबाद होते हैं, जिनकी कीमत 2014 की कीमतों पर करीब 92,651 करोड़ रुपये है।  यह अध्ययन कटाई के बाद की इंजीनियरिंग एवं तकनीक पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना के तहत किया गया है। इसमें पाया गया है कि सबसे ज्यादा बरबादी सब्जियों और फलों में होती है, जो कुल उत्पादन का 15.88 फीसदी तक होता है। सबसे कम बरबादी दूध की होती है, जो करीब 0.9 फीसदी है। समुद्री मत्स्य उत्पाद 10.5 फीसदी तक खराब हो जाते हैं। 
 
पकाए हुए खाने की बरबादी को लेकर ऐसा कोई आधिकारिक आकलन नहीं है, इसलिए इसका सटीक अनुमान लगाना बड़ा मुश्किल है। हालांकि जानकारों का कहना है कि यह नुकसान कीमत के लिहाज से कच्चे फसली उत्पादन की तुलना में ज्यादा हो सकता है। पके हुए खाद्य का सबसे ज्यादा नुकसान शादियों और पार्टियों में होता है। इसके बाद ज्यादा बरबादी होटलों और रेस्टोरेंटों में होती है। रोचक बात यह है कि बौद्धिक लोगों की सभाओं, कार्यशालाओं और सेमिनारों में भी बड़ी मात्रा में तैयार खाना बरबाद होता है। तब इसमें कोई अचंभा नहीं होना चाहिए कि भारत में उससे कहीं ज्यादा खाद्य बरबाद होता है, जिनता कुछ देशों में उत्पादित होता है। 
 
खेतों में खाद्य की बरबादी की मुख्य वजह कटाई के पुराने तरीके और उपज का कुप्रबंधन है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद में सहायक महानिदेशक एस एन झा का कहना है, 'कृषि जिंस नवजात बच्चे की तरह हैं, जिनकी मृत्यु में कमी लाने के लिए अच्छी देखभाल की जरूरत होती है।' उनकी यह बात विशेष रूप से फलों और सब्जियों के मामले में सही है, जिन्हें आम तौर पर हाथों से बिना क्लीपर या अन्य आधुनिक टूलों की मदद से तोड़ा जाता है। इससे उत्पादों को बाहरी और आंतरिक नुकसान पहुंचता है। इसके अलावा इन फसलों को तेज धूप में तोड़ा जाता है और आम तौर पर इन्हें छंटाई, पैकिंग और खेतों से बाहर भेजने से पहले ठंडा नहीं होने दिया जाता है, जिससे उनके ठीक बने रहने की अवधि कम हो जाती है। उन्होंने कहा कि बड़ी मात्रा में उपज शीतभंडारगृहों में खराब हो जाती है क्योंकि एक-दूसरे से विपरीत खासियत वाली जिंसों को एक ही चैंबर में उसी तापमान में रखा जाता है। 
 
अफसोस की बात यह है कि ये छोटे मसले नजर आते हैं, लेकिन नतीजों के हिसाब से बड़े हैं। आमतौर पर इन मसलों पर इस समय चल रहे कटाई के बाद के खाद्य प्रबंधन कार्यक्रमों में ध्यान नहीं दिया जाता है। वर्तमान योजनाओं में से बहुत सी खेत से थाली तक खाद्य की प्रत्येक चरण की यात्रा के वैज्ञानिक प्रबंधन के जरिये बरबादी को कम करने के बजाय प्रसंस्करण के जरिये मूल्य संवर्धन पर केंद्रित हैं। इसलिए इस मसले के समाधान के लिए विशेष जागरूकता और तकनीक हस्तांतरण अभियान चलाने की जरूरत है। 
 
इसी तरह तैयार खाने की बरबादी रोकने के लिए संगठित कार्रवाई जरूरी है। यह खाना आसानी से कुपोषितों और भूखों को खिलाया जा सकता है। इस क्षेत्र में निजी कंपनियां और औद्योगिक घराने अपनी कंपनी सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के तहत एक उपयोगी भूमिका निभा सकते हैं। सरकार उन्हें कर और अन्य लाभ देकर प्रोत्साहित कर सकती है। वे सामाजिक कार्यक्रमों से अतिरिक्त भोजन एकत्रित कर इसे अनाथालयों, रात्रि विश्रामगृह आदि को मुहैया करा सकते हैं। 
 
अमीर देशों सहित कुछ देशों ने खाद्य की बरबादी पर कानूनी प्रतिबंध लगाए हैं। उदाहरण के लिए फ्रांस ने सुपरमार्केटों को नहीं बिक सकने वाले या बचे हुए खाद्य को नष्ट करने पर रोक लगा दी है। वहां सरकार ने इसे धमार्थ संस्थाओं को दान करना अनिवार्य किया है। भारत भी अपने भोजन के अधिकार कानून में ऐसे कुछ प्रावधान शामिल कर सकता है। संभवतया खाद्य की बरबादी पर तर्कसंगत प्रतिबंध लगाने की खातिर खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 में संशोधन करने के लिए ज्यादा देर नहीं हुई है। 
Keyword: agri, आधुनिक मशीन, किसान, कृषि उपकरण,,
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