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एफआरडीआई विधेयक लाएगा वित्तीय तंत्र में सुधार

अजय शाह /  December 12, 2017

अगर एफआरडीआई विधेयक को ठीक से लागू किया गया तो ग्राहकों को कोई नुकसान नहीं होगा और वित्तीय कंपनियों के स्थायित्व पर भी कोई जोखिम पैदा नहीं होगा। बता रहे हैं अजय शाह 

 
भारतीय समाजवाद में कोई कारोबार शुरू करना मुश्किल था। किसी कारोबार में उतरने की वे बाधाएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं, मगर कम जरूर हुई हैं। कंपनियों की बिना नाकामी वाला पूंजीवाद अमीरों के लिए समाजवाद है। भारत में सराफेसी (2002) से लेकर आईबीसी (2016) और अब एफआरडीआई विधेयक तक उद्यमों को अपना कारोबार बंद करके निकलने के कानून बनाए गए हैं। यह धीमा और कड़ी मेहनत वाला काम है, जो बाजार अर्थव्यवस्था का अहम सांस्थानिक ढांचा है। 
 
भारतीय समाजवाद में ज्यादातर कारोबारी क्षेत्रों में प्रवेश पर पाबंदी थी। इनमें से ज्यादातर पिछले वर्षों के दौरान खत्म हो गए हैं। आम तौर पर वास्तविक क्षेत्र की कंपनी यानी वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करने वाली कंपनी शुरू करना आसान है, लेकिन हम विदेशियों को कुछ प्रकार की कंपनियां शुरू करने की मंजूरी नहीं देते हैं। वित्त में भी म्युचुअल फंड या प्रतिभूति लेनदेन जैसे क्षेत्र खुले हुए हैं। भारत में सबसे ज्यादा बंदिशों वाला कारोबार बैंकिंग है। 
 
हम प्रवेश की पाबंदी वाले समाजवाद से बिना निकासी के कानूनों वाले पूंजीवाद में आए हैं। परिपक्व बाजार अर्थव्यवस्था का लक्ष्य हासिल करने के लिए कारोबार में प्रवेश की बाधाएं खत्म करना जितना अहम है, उतना ही कारोबार से निकलने का ढांचा तैयार करना भी महत्त्वपूर्ण है। कारोबार में प्रवेश की बाधाएं खत्म करने का सुधार सबसे आसान होता है। लेकिन कारोबार से निकलने के ढांचे बनाना दूसरी पीढ़ी के सुधारों का हिस्सा है, जहां सांस्थानिक क्षमता तैयार करनी होगी। 
 
इस दिशा में पहला अहम सुधार सराफेसी, 2002 था, जिसमें यह प्रावधान है कि कर्ज का भुगतान करने में नाकाम रहने पर ऋणदाता गिरवी संपत्ति पर कब्जा कर सकता हैवित्तीय समाधान पर काम जगदीश कपूर की अध्यक्षता में जमा बीमा सुधारों पर गठित आरबीआई सलाहकार समूह के साथ (वर्ष 1999) में शुरू हुआ। न्यायमूर्ति श्रीकृष्णा के वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग (एफएसएलआरसी, 2013) ने गैर-वित्त कंपनियों और कुछ निश्चित वित्तीय कंपनियों (उदाहरण के लिए बैंक और बीमा कंपनियों) के बीच विभाजन का प्रस्ताव रखा था। इसकी वजह यह थी कि बैंक और बीमा कंपनियां ग्राहकों से बड़े वादे करती हैं। इसने तर्क दिया कि गैर-वित्तीय कंपनियों के लिए दिवालिया संहिता बनाना जरूरी है, लेकिन बैंकों एवं बीमा कंपनियों के लिए दिवालिया संहिता के विशेष संस्करण की जरूरत है, जिसका संचालन एक वैधानिक संस्था रेजोल्यूशन कॉरपोरेशन (आरसी) करे। इसका आरबीआई और वित्त मंत्रालय के एक कार्यदल ने वर्ष 2014 में समर्थन किया। वर्ष 2014 में एम दामोदरन ने रेजोल्यूशन कॉरपोरेशन बनाने के लिए एक कार्यबल की अगुआई की। 
 
एक समिति ने एफएसएलआरसी प्रारूप कानून की तर्ज पर वित्तीय समाधान एवं जमा बीमा विधेयक (एफडीआरआई) का प्रारूप तैयार किया। समिति में वित्त मंत्रालय और सभी नियामकों के अधिकारी शामिल थे। इस प्रारूप को जनता के सुझावों के लिए सितंबर, 2016 में प्रकाशित किया गया, जिसे इस साल जून में मंत्रिमंडल ने मंजूरी दी और अगस्त में संसद में रखा गया। संसद के 30 सदस्यों वाली संयुक्त संसदीय समिति विधेयक की जांच कर रही है। एफएसएलआरसी ने तर्क दिया था कि कुछ वित्तीय कंपनियों का आईबीसी द्वारा आसानी से समाधान नहीं हो सकता, इसलिए उन्हें विशेष समाधान व्यवस्था की जरूरत होती है। उदाहरण के लिए बैंक ऋणदाता बहुत से जमाकर्ता होते हैं, इसलिए ऋणदाताओं के सौदेबाजी करने की आईबीसी की प्रक्रिया कारगर साबित नहीं होती है। जमाकर्ताओं की मंशा होती है कि कोई वैधानिक प्राधिकरण तुरंत समाधान करे। इसी तरह व्यवस्थित अहम वित्तीय कंपनियों में आईबीसी की प्रक्रिया काफी धीमी होगी। व्यवस्थित अहम वित्तीय कंपनियों में बैंक, बीमा कंपनी या अन्य वित्तीय संस्थान आते हैं, जिनके असफल होने से वित्तीय संकट खड़ा हो सकता है। 
 
आरसी का वित्त पोषण उन वित्तीय कंपनियों पर शुल्क लगाकर किया जाएगा, जो उसके दायरे में आएंगी। लेकिन इसे सरकार से भी धन मिल सकता है। इस विधेयक में जमा बीमा के लिए बैंकों को शामिल किया गया है। समाधान के लिए इसके दायरे में बैंक, बीमा कंपनियां, भुगतान कंपनियां, वित्तीय बाजार का बुनियादी ढांचा और व्यवस्थित वित्तीय कंपनियां शामिल होंगी। शेष वित्तीय कंपनियां आईबीसी के दायरे में आएंगी। 
 
विधेयक में कहा गया है कि वित्तीय कंपनियों की निगरानी, उनकी वित्तीय हैसियत के हिसाब से उनका वर्गीकरण और असफल कंपनियों का उचित समाधान आरसी द्वारा किया जाएगा। जब तक कंपनी का प्रदर्शन ठीक बना रहेगा, तब तक वह नियामक के दायरे में होगी। लेकिन जब कंपनी असफल हो जाएगी तो वह आरसी के अधीन चली जाएगी। आरसी उस कंपनी का समाधान करेगा। जब कंपनी असफल होने के कगार पर है, तब आरसी को आसानी से समाधान सुनिश्चित करने के लिए कुछ निश्चित ताकत मिलेगी। 
 
समाधान कई उपायों का इस्तेमाल करके किया जा सकता है। सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला उपाय उस कंपनी का प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के जरिये चुनी गई स्वस्थ कंपनी के साथ विलय है। यह भी संभव है कि देनदारी की राशि के बराबर कुछ संपत्तियों की किसी स्वस्थ कंपनी को बिक्री की जाए ताकि खरीदने वाली कंपनी ग्राहकों को सेवा देती रहे और शेष संपत्तियों का समापन (लिक्विडेशन) किया जा सकता है। 
 
एक उपाय बेल-इन में काफी दिलचस्पी है। किसी कर्ज में फंसे बैंक की देनदारी उसकी संपत्तियों से अधिक होती है। किसी ने किसी को यह घाटा वहन करना ही होती है। हाल में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में फिर से पूंजी डालने के लिए सरकार ने यह घाटा खुद वहन करने का फैसला किया है। एफआरडीआई विधेयक लागू होने के बाद भी सरकार के पास ऐसा करने का विकल्प बना रहेगा। एक विकल्प बेल-इन है, जिसमें हिस्सेदारों और ऋणदाताओं को अपने दावे कम कर नुकसान वहन करना होता है। बेल-इन कठोर कानून लगता है, लेकिन कभी-कभी इसकी जरूरत पड़ती है। 
 
विधेयक में सुरक्षा के कई प्रावधान किए गए हैं। इसमें पहले बनाए गए नियमनों में यह जिक्र होगा कि किस श्रेणी की देनदारी बेल-इन के लिए पात्र होंगी। बीमित जमाएं और सुरक्षित ऋण जैसी कुछ देनदारी को बेल-इन से छूट होगी। बेल-इन में दावों के पदानुक्रम का पालन किया जाना चाहिए। केवल वे देनदारी रद्द की जा सकती हैं, जहां इसे सृजित करने वाले इंस्ट्रुमेंट में प्रावधान होगा कि पक्ष बेल-इन के लिए पात्र देनदारी पर सहमत हैं। कोई भी ऋणदाता (जमाकर्ता सहित) उससे बदतर स्थिति में नहीं छोड़ा जाना चाहिए, जिसमें वे कंपनी के लिक्विडेशन की स्थिति में होते और अगर ऐसा नहीं होता है तो उन्हें आरसी द्वारा हर्जाना दिया जाएगा। आरसी भारतीय रिजर्व बैंक के साथ विचार-विमर्श करके ही बेल-इन की ताकत का इस्तेमाल कर सकता है। आरसी को केंद्र सरकार के पास बेल-इन का इंस्ट्रुमेंट भेजना होगा। इसके साथ ही एक रिपोर्ट भी भेजनी होगी, जिसमें यह वजह बताई जाएगी कि बेल-इन की जरूरत क्यों पड़ी। इस रिपोर्ट की एक प्रति संसद में रखी जाएगी। 
 
बीते वर्षों में भारत में हमने वित्तीय कंपनी के असफल होने को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया है। हमने एक दिवालिया कानून की जगह दूसरे में केवल सुधार किया है। पुराने की जगह नए कानून को मंजूरी न देने की लागत बहुत बड़ी है। अगर एफआरडीआई विधेयक को ठीक से लागू किया गया तो इसके तहत बनाई गई व्यवस्था भारतीय वित्तीय तंत्र में पूंजी के आवंटन को ज्यादा कुशल बनाएगी। इससे ग्राहकों को कोई नुकसान नहीं होगा और वित्तीय कंपनियों के स्थायित्व पर भी कोई जोखिम पैदा नहीं होगा। 
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