बिजनेस स्टैंडर्ड - गलत कदम
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गलत कदम

संपादकीय /  December 12, 2017

अचल संपत्ति क्षेत्र की दिग्गज कंपनी यूनिटेक के मामलों में नया और परेशान करने वाला मोड़ आ गया है। कंपनी संकट से जूझ रही है क्योंकि वह अपने वादों पर कायम नहीं रह सकी है। वह 19,000 फ्लैट बनाकर देने में नाकाम रही है और इसके लिए उसे करीब 2,000 करोड़ रुपये की राशि उपभोक्ताओं को लौटानी है। हालांकि कंपनी पर करोड़ों रुपये की राशि की देनदारी शेष है। इतना ही नहीं इसके अलावा भी उसे कॉर्पोरेट सावधि जमा वाले 51,000 धारकों को 723 करोड़ रुपये की राशि भी चुकानी है। कंपनी का कहना है कि उसके पास अब पैसा नहीं है। इस बीच सरकार और राष्टï्रीय कंपनी लॉ पंचाट (एनसीएलटी) ने कुछ ऐसे निर्णय लिए हैं जो वाकई परेशान करने वाले हैं। 

 
सरकार की बात करें तो कंपनी मामलों के मंत्रालय का यह कहना है कि उसे जनहित में यूनिटेक के प्रबंधन का अधिग्रहण कर लेना चाहिए। एनसीएलटी भी सरकार से सहमत है और इस अधिग्रहण को संभव बनाने के क्रम में उसने 20 दिसंबर तक 10 नामित निदेशकों की सूची मांगी है। इस बीच यूनिटेक के निदेशकों को निलंबित कर दिया गया और उसे किसी भी संपत्ति को बेचने से रोक दिया गया। अब इन निर्णयों का परीक्षण सर्वोच्च अदालत में हो रहा है। यूनिटेक का कहना है कि सरकार के कुछ आदेश विरोधाभासी प्रतीत हो रहे हैं। अगर कोई परिसंपत्ति बेची ही नहीं जाएगी और कंपनी के खाते फ्रीज रहेंगे तो वह भला 700 करोड़ रुपये से अधिक की राशि कैसे लौटाएगी? 
 
यह सवाल उचित ही है। इस पूरे मामले के प्रबंधन में काफी भ्रामक हालात देखने को मिले। सरकार का इसमें दखल देने का निर्णय ठीक नहीं प्रतीत होता। यह ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसमें सरकार को दखल देना चाहिए। उसके पास अचल संपत्ति कंपनी चलाने का कौशल नहीं है। इससे भी बढ़कर यह आशंका है करदाताओं का पैसा एक ऐसी समस्या को हल करने में व्यय किया जाएगा जो दरअसल एक निजी कंपनी की खड़ी की हुई है। 
 
हालांकि सत्यम मामले में सरकार का अधिग्रहण करने का निर्णय सही साबित हुआ परंतु यह भी स्पष्टï था कि वह मामला हल किए जाने लायक था। कंपनी की बौद्घिक क्षमता और उसके मौजूद अनुबंध प्रबंधनयोग्य थे। इस मामले में कई प्रतिस्पर्धी अंशधारक हैं। कर्जदार, सरकार, प्रवर्तक और तमाम फ्लैट खरीदने वाले इसमें पक्षकार हैं। इन तमाम के बीच संतुलन कायम करना आसान नहीं होगा और सरकार पर यह जोखिम बना रहेगा कि वह कहीं लॉबीइंग की शिकार न हो जाए। 
 
फ्लैट मालिकों का एक धड़ा खुद को नुकसान में पा सकता है जबकि राजनीतिक संपर्क वाले फ्लैट मालिकों को फायदा हो सकता है। इतना ही नहीं जिन लोगों का पैसा यूनिटेक में डूब गया उनको उन लोगों पर वरीयता मिल सकती है जिनका पैसा अन्य अचल संपत्ति कंपनियों में डूबा। इनको यह वरीयता क्यों मिलनी चाहिए? दूसरे शब्दों में कहें तो सरकार मनमाने ढंग से यह निर्णय कैसे ले सकती है कि चुनिंदा कंपनियां का जनहित में अधिग्रहण किया जाए और शेष का नहीं। यह एक कार्यकारी फैसला है जिसे मनमाने अंदाज में नहीं लिया जा सकता। 
 
यहां ऐसे न्यायिक कदम की आवश्यकता है जो निष्पक्ष हो। न्याय को छोड़ दिया जाए तो कई अन्य बातों पर भी विचार किया जाना चाहिए। सरकार अगर इस तरह के कदम उठाती है तो इसका एक और नकारात्मक असर हो सकता है। दरअसल सरकार के ऐसे कदम कंपनियों को भी संचालन किफायती अंदाज में करने के लिए कतई प्रोत्साहित नहीं करते। बाजार की दृष्टिï से भी देखें तो इससे गलत संदेश ही जाएगा। 
Keyword: unitec, real estate, NCLT,,
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