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एफआरडीआई विधेयक गलत और अप्रासंगिक

भारतीय संदर्भ में देखा जाए तो एफआरडीआई विधेयक की कोई आवश्यकता ही नहीं है, यह पूरी तरह अप्रासंगिक है
देवाशिष बसु /  December 11, 2017

भारतीय न्याय व्यवस्था प्राय: हमें विचित्र किस्म के हलों से दो चार होने का अवसर देती रही है लेकिन अब तक हमारा पाला किसी ऐसे न्यायाधीश से नहीं पड़ा है जिसने आकर किसी विफल बीमा कंपनी के ऋण देने वाले से कहा हो कि अपना पैसा भूल जाओ और बदले में कंपनी के कुछ शेयर ले लो। न ही किसी नाकाम बैंक के जमाकर्ता से किसी ने यह कहा होगा कि आपने अपनी गाढ़ी कमाई के जो पैसे बैंक में जमा किए थे उन्हें भूल जाइए और बदले में दिवालिया हुए बैंक के कुछ शेयर रख लीजिए। अगर इन शेयरों की कीमत सुधरती है तो आपको अपना पैसा वापस मिल जाएगा।

परंतु आने वाले दिनों में अदालतें ऐसे निर्णय दे सकती हैं क्योंकि कानून बनने जा रहे एक नए विधेयक में काफी कुछ ऐसी ही बातों का उल्लेख है। इस विधेयक का नाम है फाइनैंशियल रेजॉल्युशन ऐंड डिपॉजिट इंश्योरेंस बिल (एफआरडीआई)।

आमतौर पर ऐसा नहीं होता कि कोई देश दूसरे देशों में आ रहे संकट से निपटने की कोशिश में अपने यहां एक नया कानून बना डाले। परंतु भारत एफआरडीआई बनाकर एकदम यही कर रहा है। यह विधेयक इस बात की तैयारी है कि अगर हम वर्ष 2008 में अमेरिका और यूरोप में आए संकट जैसे हालात में फंस जाएं तो क्या करें। उस वक्त उन देशों के शेयर बाजार ध्वस्त हो गए थे और कुछ बैंक तथा बीमा कंपनियां दिवालिया हो गए थे। उस संकट से निपटने और उसे थामने के लिए यूरोप और अमेरिका ने बड़े और अप्रत्याशित कदम उठाए थे। इसमें अधिग्रहण, पूरी गारंटी, नकदी बहाल करना और निजी बैंकों तथा बीमा कंपनियों के जमा बीमा में विस्तार करना शामिल हैं।

वर्ष 2008 में निस्तारण प्रक्रिया कुछ ऐसी थी कि सरकारी क्षेत्र के ऋण जोखिम में बहुत अधिक इजाफा हो गया था और यह वैश्विक जीडीपी के एक तिहाई के बराबर था। इसने वित्तीय बाजारों को अस्थिर कर दिया। यह बात एफआरडीआई विधेयक के लिए जमीनी काम करने वाले रिजर्व बैंक के उस कार्य समूह ने कही है जो वित्तीय संस्थानों की निस्तारण व्यवस्था के लिए निर्मित है। ऐसे संकट से निपटने के लिए भारी भरकम राहत पैकेज से काम नहीं चलना था। खासतौर पर यह देखते हुए कि वैश्विक वित्तीय संस्थानों का आकार अब बहुत बड़ा हो चुका है और उनके कारोबार काफी जटिल हैं। उनकी मौजूदगी एक साथ दुनिया के तमाम देशों में है। इससे एक साथ तमाम देशों की स्थिरता खतरे में पड़ जाती है। कार्य समूह ने इसका हल सुझाते हुए कहा है कि करदाताओं को इन विशालकाय संस्थानों की विफलता के असर से बचाए जाने की आवश्यकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो निवेशकों, बैंकरों और बाजार के बिचौलियों तथा नियामकों की कमजोर निगरानी के कारण होने वाले संभावित नुकसान के भुगतान के लिए नया आदमी तलाश करना। इसके लिए वित्तीय स्थिरता बोर्ड (एफएसबी) नामक वैश्विक संस्थान ने प्रमुख गुणों को अंगीकृत किया जिसे जी 20 देशों का समर्थन हासिल था। एफएसबी की स्थापना अप्रैल 2009 में जी20 देशों की लंदन शिखर बैठक के बाद की गई। जी20 देशों में शामिल होने के कारण भारत ने भी 12 गुणों को अपनाया। मौजूदा हालात में कोई भी निम्र प्रश्न पूछेगा:

* इन तमाम बातों का हम पर क्या असर हुआ? हमें बस यही दिखा कि एक म्युचुअल फंड का दूसरे ने सहजता से अधिग्रहण कर लिया और शेयर बाजार में गिरावट आई जिसने देश के वित्तीय तंत्र के मामूली हिस्से को नुकसान पहुंचाया। कुलमिलाकर ज्यादातर क्षेत्र अप्रभावित रहा।

* पश्चिम में ज्यादा दिक्कत हुई क्योंकि उनके तंत्र का वह हिस्सा प्रभावित हुआ जो सीधे तौर पर लोगों से जुड़ा हुआ था यानी बड़े बैंक। ब्रिटेन में पांच बड़े बैंकों की कुल संपत्ति सकल घरेलू उत्पाद के 446 फीसदी के बराबर थी। हमारे यहां ऐसा नहीं था। हमारे यहां बड़े वित्तीय संस्थानों का कोई सीमापार जोखिम भी नहीं था। 

* इसके अतिरिक्त पश्चिमी देशों ने इन बैंकों को अलग करने के लिए कोई उपाय भी नहीं अपनाया, जबकि ये वर्ष 2008 के घटनाक्रम के प्रमुख आरोपी थे। सवाल यह है कि हमें अपने देश में पश्चिमी बीमारी के इलाज की क्या आवश्यकता है जबकि हमारे यहां वह समस्या है ही नहीं। दूसरी बात यह कि पश्चिम खुद उस समस्या को हल करने की कोशिश नहीं कर रहा।
* चाहे जो भी हो लेकिन सामान्य समझ कहती है कि बचाव करना इलाज से बेहतर है। बचाव का एक तरीका है अपनी दायित्व ठीक से नहीं निभा पाने वाले संस्थानों और नियामकों को दंडित करना। परंतु सामान्य तथ्य यह है कि अमेरिका जैसे देश में भी अपेक्षाकृत छोटे जुर्म के लिए केवल एक बैंकर को जेल हुई। ऐसे मामलों में सभी बच जाते हैं। अमेरिकी बैंकों में फिर वही सिलसिला शुरू हो गया है जिसने 2008 के संकट को जन्म दिया था।

वर्ष 2007-08 में भी आसन्न वित्तीय खतरे को लेकर तमाम तरह की चेतावनी दी जा रही थीं। आलेख, भाषण, सार्वजनिक बहस और यहां तक कि वित्तीय नियामकों और वरिष्ठ नेताओं के आपसी संवाद में भी इसका लगातार उल्लेख हो रहा था। मैडॉफ स्कैंडल के सामने आने के एक दशक पहले तमाम लोग उसके बारे में जानते थे और बात भी करते थे। अमेरिकी बाजार नियामक ने उसकी परवाह नहीं की। सीजन कैपिटल नामक एक छोटा सा हेज फंड चलाने वाले डॉ. माइकल बरी ने 160 करोड़ डॉलर का दांव सबप्राइम मॉर्गेज पर खेला था। वर्ष 2008 के मामले से दोषमुक्त होने के बाद उन्होंने नियामकों को समझाने की पेशकश की कि कैसे उन्हें लगा कि आवास क्षेत्र में जबरन की उछाल है जो जल्दी ही बुलबुले की तरह फूट जाएगा। उस वक्त किसी ने इसमें रुचि नहीं ली और किसी नियामक को कभी दोषी नहीं ठहराया गया।

एफआरडीआई ऋणदाताओं और जमाकर्ताओं का एक सीमा से अधिक पैसा जब्त करना चाहता है ताकि वित्तीय संकट में फंसने पर बैंक या बीमा कंपनियां उसका इस्तेमाल कर सकें। बार-बार यह बात सामने आ रही है कि सारी गड़बड़ी नियामकों और रेटिंग एजेंसियों की है। वे अपनी जवाबदेही निभाने में नाकाम रहे हैं जबकि उनको संकट की चेतावनी दी जाती रही। ऐसे में तार्किक तो यही होता कि पहले उनसे कहा जाता कि वे जमाकर्ताओं के बजाय अपने भविष्य निधि के पैसे से संस्थान को उबारने का प्रयास करें। परंतु एफआरडीआई विधेयक या कोई अन्य कानून उनको पूरी तरह बचा लेते हैं। यह विधेयक अप्रासंगिक, गलत और पक्षपाती विधेयक है। इसे खारिज किया जाना चाहिए। 
Keyword: FRDI, Bank, Income, Saving, एफआरडीआई, विधेयक, बैंक, ऋण,
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