बिजनेस स्टैंडर्ड - गुजरात चुनाव और भाजपा की घबराहट
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गुजरात चुनाव और भाजपा की घबराहट

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  December 08, 2017

इन दिनों आमतौर पर मुझे ऐसे सवाल सुनने को मिलते हैं कि क्या मैं गुजरात गया? वहां मुझे क्या जमीनी माहौल दिखा? हवा में क्या महसूस हो रहा है? क्या बदलाव आएगा?  पहले सवाल का उत्तर मेरे लिए आसान है कि मैं इस चुनावी दौर में अब तक गुजरात नहीं गया। मेरे पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है कि मैं हवा में कुछ महसूस कर सकूं।

 
परंतु मैं राजनीतिक गतिविधियों, प्रतिक्रियाओं, चेहरों, कही गई बातों, तौर तरीकों और नीतियों, निशानों, प्रचार अभियान की भाषा और उसके व्याकरण तथा बदलते नियम कायदों को देख सकता हूं और उनका विश्लेषण कर सकता हूं। उनसे ही मुझे अंदाजा लगेगा कि वहां हवा में बदलाव है या नहीं। 18 दिसंबर को आने वाले नतीजे से इतर इस समय भाजपा में वह घबराहट नजर आ रही है जो 2014 से नहीं दिख रही थी। 
 
गुजरात में भाजपा चिंतित है। राहुल गांधी के नए जोश, आकर्षण और प्रतिबद्घता ने उसे चकित कर दिया है। भाजपा को युवाओं का गुस्सा भी महसूस हो रहा है। युवाओं को रंज है कि भाजपा ने अपने ही जातीय समीकरण को बिगाड़ लिया है, खासतौर पर पटेलों के साथ। स्थानीय नेतृत्व के नाकारेपन को लेकर शिकायतें हैं। हमने सन 2013 में भाजपा की राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जीत के बाद से ऐसा कभी नहीं देखा। 
 
भाजपा में कोई यह कहता या स्वीकार करता नहीं दिखता कि पार्टी हार सकती है लेकिन उनकी बातों में नकारात्मक आत्म-आश्वस्ति नजर आती है। वे कहते हैं कि गुजरात किसी कीमत पर नहीं हारा जा सकता। क्या आपको लगता है कि मोदी जी और अमित भाई ऐसी विपदा आने देंगे? देखिए नरेंद्र भाई कैसे प्रचार कर रहे हैं और अगर मान लिया जाए कि 22 साल के शासन के बाद सत्ता विरोधी माहौल है तो क्या कांग्रेस में यह क्षमता है कि मतदाताओं को अपनी ओर कर सके? बूथ की लड़ाई में जीत अमित भाई की होगी। उनकी मशीनरी को तो देखिए। 
 
ये सारी बातें बड़े भरोसे से कही जाती हैं। परंतु ध्यान से सुनें और पढ़ें तो पाएंगे कि किसी बाहरी की शंका को दूर करने के बजाय यह खुद को समझाने की कोशिश है। यह घबराहट में आश्वस्ति तलाशने का प्रयास है।  गुजरात चुनाव और मोदी शाह की जोड़ी के नेतृत्व में लड़े गए अन्य चुनावों में एक बड़ा अंतर है। इस चुनाव में वे सत्ताधारी हैं और सबसे आगे माने जा रहे हैं, इसके बावजूद घबराहट दिख रही है। अगर 2013 के मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को छोड़ दिया जाए तो शेष चुनावों में वह सत्ताधारी दलों को चुनौती दे रहा था। मैं पंजाब और गोवा की बात नहीं कर रहा क्योंकि एक में भाजपा सरकार का हिस्सा थी तो दूसरे का आकार बहुत छोटा है। 
 
वहीं गुजरात चुनाव की बात करें तो केंद्र और राज्य में भाजपा का शासन तो है ही, पार्टी पर भी इन्हीं दोनों नेताओं का ही निर्णायक असर है। भाजपा नेता कह सकते हैं कि यह आज की हकीकत है कि हर भाजपाशासित राज्य पर गुजरात की तरह ही आला कमान का नियंत्रण है। परंतु यह पूरा सच नहीं है। प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष दोनों गुजरात के हैं। गुजरात में करीब ढाई दशक के प्रदर्शन से पूरे देश के मतदाताओं को चौंका रखा है। यह उनका सबसे उल्लेखनीय और प्रदर्शनयोग्य काम है। राज्य में इतना सख्त शासन रहा मानो वहां राष्टï्रपति शासन लागू हो। 
 
जाहिर सी बात है चीजें उनके मुताबिक नहीं रहीं। आला कमान के सीधे नियंत्रण के बावजूद तीन साल के भीतर राज्य रास्ते से भटक गया। इस अवधि में वहां दो मुख्यमंत्री बने और दोनों ही अलोकप्रिय और निष्प्रभावी। दूसरे मुख्यमंत्री तो पहली से भी खराब साबित हुए। राज्य की फलती-फूलती अर्थव्यवस्था थम गई। युवाओं का असंतोष समझा जा सकता है।  पुरानी छवि से अलग युवा गुजराती राजनीतिक रूप से जागरूक हैं। आपातकाल से पहले यहां नवनिर्माण आंदोलन ने जोर पकड़ा था। सन 1985 में मंडल आयोग की रिपोर्ट जमा होने के बाद शुरुआती विरोध यहीं हुआ। राज्य में अपने पहले दौरे पर मैंने इससे संबंधित खबर लिखी थी। जैसा कि गुजरात में होता रहा है। जातीय दंगों ने जल्दी ही सांप्रदायिक स्वरूप ले लिया। 
 
हम शायद केवल हिंदी प्रदेश को राजनीतिक रूप से अस्थिर मानकर गलती करते हैं क्योंकि गुजरात ने दो मजबूत नेताओं चिमनभाई पटेल और नरेंद्र मोदी के अधीन स्थिरता का लंबा दौर देखा। हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर जैसे युवा जातीय नेताओं का उदय अतीत में गुजरात में घटित दृश्य का दोहराव मात्र है।  मोदी और शाह के दिल्ली जाने के बाद इन नेताओं ने अपनी जगह बनाई। गुजरातियों की दो पीढिय़ां दो मजबूत नेताओं के नेतृत्व में रहीं और फली फूलीं। उन्हें उसकी कमी खलती है। मोदी के रूप में उन्हें ऐसा मुख्यमंत्री मिला था जिसे पार्टी आला कमान किसी भी निर्णय के पहले याद करता था। लालकृष्ण आडवाणी जैसे दिग्गज अपनी लोकसभा सीट के लिए उस पर निर्भर थे। उन्हें अब ऐसे मुख्यमंत्री की आदत ही नहीं रही जो हर बात के लिए दिल्ली की बाट जोहता हो। वैसे भी यह भाजपा का नहीं बल्कि कांग्रेस का मॉडल है। पार्टी के सत्ता केंद्र में यह बदलाव राज्य पर भारी पड़ा। आश्चर्य नहीं कि वहां तमाम समूहों और प्रतिद्वंद्वियों के रूप में बंटवारा दिख रहा है। यह घबराहट बिना वजह नहीं है। 
 
वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी  'गुजरात मॉडल के नारों और वादों के साथ ही सत्ता में आए थे। उनके शासनकाल में उद्योगों, कृषि और बुनियादी ढांचे में अप्रत्याशित सुधार हुआ। तमाम प्रशासनिक सुधार और नए प्रयोग भी हुए, विशेष रूप से बिजली और सिंचाई के क्षेत्रों में। मोदी को उद्यमियों की प्रशंसा और समर्थन मिला। आखिरकार संकटग्रस्त संप्रग के पांच साल के बेकार शासन के बाद देश की जनता ने उन्हें प्रधानमंत्री चुन लिया। जनता ने 2002 की याद को भुलाकर मोदी की 'विकास पुरुष' की नई ब्रांडिंग स्वीकार कर ली। यह बात अलग है कि विपक्ष उन्हें 'विनाश पुरुष' कहता था। 
 
गुजरात में उनके और भाजपा के चुनाव प्रचार में 'विकास' का जिक्र नहीं मिल रहा। 'गुजरात मॉडल' ने उन्हें वह बहुमत दिलाया जो तीन दशक से कोई नहीं ला सका। परंतु, यह उनके इस गुजरात प्रचार अभियान के एजेंडा का हिस्सा नहीं है। उनके चुनावी अभियान में राहुल गांधी और उनकी भूलें, पहचान की राजनीति, औरंगजेब, खिलजी, नेहरू और सोमनाथ मंदिर, राहुल ने किस रजिस्टर पर हस्ताक्षर किए, कपिल सिब्बल उच्चतम न्यायालय में बाबरी/अयोध्या पर क्या कह रहे हैं, आदि शामिल हैं। अचानक रहस्यमय पाकिस्तानी जनरल चैनलों पर नजर आने लगे हैं जहां वे कांग्रेस पार्टी और अहमद पटेल का बतौर मुख्यमंत्री समर्थन करते हैं। चुनाव प्रचार अल्पसंख्यक विरोध, पहचान की राजनीति, गांधी परिवार के ढर्रे पर लौट आया है। यह काफी कुछ 2002 की याद दिलाता है। 
 
हमारी चुनावी राजनीति में सत्ताविरोधी लहर का अहम स्थान है। यह दुर्लभ अवसर है जब 22 साल से राज्य में और अब केंद्र में बहुमत से सत्तारूढ़ एक दल जूझ रहा है और कांग्रेस सत्ताधारी नजर आ रही है। कांग्रेस भले तीन दशक से वहां हार रही है लेकिन उसके पास हमेशा 40 फीसदी मत रहे हैं। अगर 2007, 2012 और 2014 के प्रचार अभियान को देखें तो पता चलता है कि प्रचार विरोधियों से मोदी की उपलब्धियों पर केंद्रित होता गया। 
 
आर्थिक चूकों, कमजोर स्थानीय नेतृत्व, और दिल्ली से शासन चला पाने में नाकामी ने आसान जीत वाले राज्य में भाजपा की राह कठिन कर दी है। 18 दिसंबर को चाहे जो नतीजा निकले। राहुल गांधी सफल हो चुके हैं। उन्होंने भाजपा को मजबूर कर दिया कि वह उन्हें गंभीरता से ले। भाजपा जैसे रसूखदार दल को आज अपना पूरा समय ऐसे नेता पर हमले करने में बिताना पड़ रहा है जिसके दल के पास लोकसभा में केवल 46 सीटें हैं। भाजपा ने यह पटकथा नहीं लिखी थी। घबराहट की वजह भी यही है।
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