बिजनेस स्टैंडर्ड - ट्रिलियन या 10 खरब?
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ट्रिलियन या 10 खरब?

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  December 08, 2017

इस वर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार क्या रहा? अगर अमेरिकी डॉलर में आकलन किया जाए तो यह करीब 25 खरब डॉलर है जिसे बोलना और लिखना दोनों आसान है। परंतु अगर इसे रुपये में तब्दील किया जाए तो यह राशि करीब 160 लाख करोड़ रुपये या 1.6 करोड़ करोड़ रुपये होगी। इसे बोलना दुरूह ही नहीं है बल्कि यह अंकों को लिखने के भारतीय तरीके से गलत भी है, जैसा कि एक पाठक ने इंगित किया। भारतीय शैली में शुरुआती तीन अंकों के बाद अल्प विराम होता है और उसके बाद हर दो अंक के पश्चात अल्प विराम लगाया जाता है। इसके उलट अंतरराष्टï्रीय तरीके में हर तीन अंक के बाद अल्पविराम लगाया जाता है। अगर एक लाख करोड़ को अंकों में लिखना हो तो दोनों शैलियों का घालमेल करते हुए 1,00,000,00,00,000 लिखना होगा। यहां दो अंकों और तीन अंकों दोनों के बाद अल्पविराम चिह्नï का प्रयोग है। 

 
हम जानते हैं कि अंकों को रुपये के संदर्भ में उच्चारित करने का एक सामान्य तरीका भी हमेशा मौजूद है। उसके मुताबिक इसे 16 नील कहा जा सकता है यानी 16 के बाद 13 शून्य। दिक्कत यह है कि अब इन्हें कोई इस्तेमाल नहीं करता।  न तो सरकार, न रिजर्व बैंक और न ही कोई अन्य सरकारी या निजी संस्थान इसका प्रयोग करते हैं। कुछ भारतीय प्रकाशन अवश्य अरब (100 करोड़) का इस्तेमाल करते हैं। देसी अंकगणना के साथ यह समस्या शायद इसलिए आई क्योंकि हम अक्सर हजारों करोड़ सुनने के आदी हो गए। उसके बाद लाख करोड़ में बात करना स्वाभाविक ही था और फिर करोड़ों करोड़ की बारी आई। 
 
अधिकांश लोग शायद इस बात से परिचित नहीं हैं कि 8 अंकों से ज्यादा के आंकड़ों के लिए भी भारतीय भाषा में शब्द हैं। मसलन 20,000 करोड़ रुपये को 2 खरब रुपये लिखना ज्यादा सही है। 10 करोड़ करोड़ को एक पद्म लिखा जा सकता है और 100 पद्म का अर्थ होता है एक शंख। अंतरराष्टï्रीय प्रणाली में एक शंख 100 क्वाड्रिलियन होता है।  अब ये आम इस्तेमाल का हिस्सा नहीं हैं। सवाल यह है कि इनका आमतौर पर प्रयोग किया जाना चाहिए या नहीं। अगर मौजूदा मिलेजुले तरीके से गिनती करना छोडऩा हो तो क्या करना चाहिए। समुचित भारतीय तरीके से गिनती की जानी चाहिए या फिर अंतरराष्टï्रीय स्वीकार्यता वाली मिलियन, बिलियन प्रणाली को अपना लेना चाहिए। 
 
मौजूदा दौर को देखें तो वह पारंपरिक भारतीय गणना पद्घति की ओर लौटने पर ही बल देगी। यानी हर दो अंक के बाद एक नया नाम जुड़ता जाएगा। परंतु इससे दूसरे तरह की समस्या खड़ी हो जाएगी।  मौजूदा डिजिटल युग में कंप्यूटर प्रोग्राम अंतरराष्टï्रीय मानक के अनुसार हर तीन अंक के बाद अल्पविराम लगा देते हैं। यही वजह है कि किसी कंपनी के वित्तीय नतीजों में प्रस्तुत सारणी में बिक्री टर्नओवर 1,000,000 लिखा हो सकता है लेकिन ध्यान दीजिए तो सारणी के ऊपर लिखा होगा सभी आंकड़े लाख में। ऐसे में यह समझने के लिए दिमाग लगाना पड़ेगा कि वह आंकड़ा दरअसल 10,000 करोड़ है। 
 
दूसरी दिक्कत यह है कि भारतीय अंक उन बाहरी लोगों के लिए और अधिक दुरूह हो जाएंगे जो पहले ही लाख और करोड़ को समझने में परेशानी का सामना कर रहे हों क्योंकि अब उनको अरब, नील और शंख को भी समझना होगा। अगर देखा जाए तो एक आधुनिक अर्थव्यवस्था जिसके गहरे अंतरराष्टï्रीय आर्थिक संबंध हों, उसे मिलियन, बिलियन वाली व्यवस्था ही चुननी चाहिए। अगर ऐसा है तो एक औसत भारतीय (सरकार, आरबीआई, प्रेस भी) को मानसिक समायोजन करना होगा और लाख-करोड़ की गणना त्यागनी होगी। यह बहुत दिक्कत वाली बात नहीं होगी क्योंकि 16 नील की जगह 160 ट्रिलियन बोलना होगा। 
 
बहरहाल मुद्रा के मामले में भी हम आना पैसा से आगे बढ़ चुके हैं, हमने दशमलव पद्घति अपनाई है। जमीन की माप के मामले में हमने बीघा की जगह हेक्टेयर को मानक बनाया ही है। ऐसे में एक और समायोजन बहुत मुश्किल काम नहीं होना चाहिए। ऐसा होता है तो बड़ी तादाद में भारतीयों को मिलियन और बिलियन को लाख और करोड़ में बदलने के मानसिक श्रम से निजात मिलेगी और इस दौरान होने वाली गलतियों से भी।
Keyword: india, economy, dollar,,
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