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ट्रंप की फिसली जुबान, लफ्जों के जरिये कर बैठे अपमान

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  December 07, 2017

अमेरिका के राष्ट्रपति का पद संभालने के बाद से ही डॉनल्ड ट्रंप प्राय: कोई न कोई बखेड़ा खड़ा कर ही देते हैं। इसका ताजा उदाहरण है पिछले सप्ताह सम्मान समारोह के लिए व्हाइट हाउस आए नावहो (मूल अमेरिकी) समुदाय के एक प्रतिनिधिमंडल के समक्ष अमेरिकी संसद के एक सदस्य को 'पोकाहॉन्टास' कहकर पुकारना। उनका इशारा मैसाच्युसेट्स की डेमोक्रेट सीनेटर इलिजाबेथ वारेन की ओर था। दरअसल वारेन का यह दावा है कि वह अमेरिका के मूलनिवासियों की संतति हैं लेकिन उनका यह दावा संदेह के घेरे में है। एक डेमोक्रेट सांसद का अपमान करने की हड़बड़ी में अमेरिकी राष्ट्रपति उन लोगों का अपमान कर बैठे जिन्हें द्वितीय विश्वयुद्घ में योगदान के लिए सम्मानित करने के लिए आमंत्रित किया गया था। 

 
'पोकाहॉन्टास' एक नस्लवादी शब्द है। इसका तात्पर्य अमेरिका की मूल आबादी से है जिसके खात्मे की तमाम कोशिश श्वेतों ने की। 'पोकाहॉन्टास' शब्द उतना ही अपमानजनक है जितना कि किसी अफ्रीकी अमेरिकी को 'नीग्रो' कहना या भारत के संदर्भ में कहें तो किसी हिंदुत्ववादी को चड्ढïी, पूर्वोत्तर के किसी व्यक्ति को चिंकी-चिंका या किसी नेपाली को बहादुर कहना। अमेरिका के मूल निवासियों के लिए 'पोकाहॉन्टास' 'अंकल टॉम' का समानार्थी है। अंकल टॉम एक ऐसा चरित्र है जो अश्वेत है लेकिन गोरों का मददगार है। 
 
पोकाहॉन्टास एक अश्वेत अमेरिकी स्त्री थी जिसका वर्जीनिया में श्वेतों ने अपहरण कर लिया था। उसे जब वापस लौटने का अवसर दिया गया तो उसने अंग्रेजों के साथ रहना चुना। उसने ईसाई धर्म अपना लिया और एक अंग्रेज से विवाह कर लिया। 17वीं सदी के अंग्रेजी समाज ने उसने सभ्य बनाए गए गंवार के रूप में चित्रित किया।  वारेन ने ट्रंप के निजी हमले पर प्रतिक्रिया तो दी लेकिन उन्होंने उन लोगों के साथ जोड़कर किए गए अपमान के बारे में कुछ नहीं कहा जिनके साथ उनका पुरातन रिश्ते का दावा है। 
 
दूसरे विश्वयुद्घ के दौरान पैसिफिक अभियानों के दौरान नावहो के कोड टॉकर (कूट भाषी) दल ने संवाद में अहम भूमिका निभाई थी। राष्ट्रपति से मुलाकात के दौरान रंगीन कपड़ों में सजेधजे इन लोगों ने इस अपमान को साफ तौर पर महसूस किया। टेलीविजन फुटेज में उनके चेहरों पर अपमान को साफ महसूस किया जा सकता है। उनके प्रतिनिधियों ने बाद में राष्ट्रपति की मूल अमेरिकियों के इस अपमान और अनदेखी के लिए तीखी आलोचना की।  
 
यह उचित ही था क्योंकि ट्रंप ने उनकी उपलब्धियों का बहुत सीमित उल्लेख किया। नावहो कोड टॉकर कौन थे और उनको क्यों सम्मानित किया जा रहा था? अमेरिका ने पूरे प्रशांत महासागर में विभिन्न द्वीपों पर कब्जे का जो अभियान छेड़ा था उनमें इनकी अहम भूमिका थी। घने जंगलों में जापानी सैनिकों की गोलाबारी के बीच संवाद ही उनका बचाव कर सकता था लेकिन दिक्कत यह थी कि अनेक जापानियों ने अमेरिकी विश्वविद्यालयों में शिक्षा ली थी और वे अच्छी अंग्रेजी समझते थे। ऐसे में युद्घ क्षेत्र के बारे में दी जाने वाली तमाम सूचनाएं उनके हाथ लग जाती थीं। ऐसे में एक प्रोटेस्टैंट मिशनरी के बेटे और इंजीनियर फिलिप जॉनस्टन ने नावहो की मदद से संवाद करने का विचार प्रस्तुत किया। 
 
वह एरिजोना में नावहो बहुल इलाके में पले बढ़े थे और उनकी भाषा से परिचित थे। एरिजोना के सबसे बड़े मूल अमेरिकी समुदायों में से एक नावहो की भाषा ऐसी है जो न तो एशियाई और न ही किसी यूरोपीय भाषा समूह से मेल खाती है। जॉनस्टन ने कहा कि यह भाषा ऐसे कोड की तरह काम कर सकती है जिसे तोड़ा न जा सके। हर बटालियन के साथ एक जोड़ा नावहो रेडियो ऑपरेटर के रूप में तैनात किए जा सकते हैं ताकि सुरक्षित संवाद हो सके। नावहो का चयन इसलिए भी किया गया क्योंकि अन्य आदिवासी जहां अंग्रेजी के संपर्क में थे, वहीं नावहो तक न तो अंग्रेजी और न ही जर्मन छात्र पहुंच सके थे। गौरतलब है कि जर्मन छात्र जानबूझकर मूल निवासियों की भाषाओं और रिवाजों का अध्ययन करते थे। 
 
जैसा कि सिमॉन सिंह ने सन 1999 में आई अपनी पुस्तक द कोड बुक : द सीक्रेट हिस्ट्री ऑफ कोड्स ऐंड कोड ब्रेकिंग में लिखा है, एक अन्य समस्या यह थी कि नावहो की भाषा में आधुनिक सैन्य चीजों को परिभाषित करना मुश्किल था। ऐसे में नौसैनिक टुकड़ी ने नावहो शब्दकोष से ऐसे शब्द निकाले जो अन्यथा न समझे जाने लायक अंग्रेजी शब्दों को परिभाषित करें। लड़ाकू विमानों को हमिंगबर्ड का नाम दिया गया और बमवर्षक विमानों को बाज, बमों को अंडे, पनडुब्बियों को लोहे की मछली आदि नाम दिया गया। विभिन्न देशों को भी नावहो नाम दिए जाने थे और ब्रिटेन को जल से बंधा नाम दिया गया तो चीन को लटों वाले बाल का नाम दिया गया। 
 
ये नाम याद करना उन लोगों के लिए आसान था क्योंकि उनमें मौखिक इतिहास और लोक कथाओं की किस्सागोई की परंपरा रही है। कठोर परिस्थितियों में रहने और कमतर समझे जाने के बाद बावजूद नावहो जनजातीय परिषद ने इस प्रयास में मदद की सहमति दी। अगस्त 1942 में गुआदलकनाल में पहले कूट भाषी नावहो तैनात कर दिए गए। सिंह लिखते हैं कि नावहो को सभी छह नौसैनिक टुकडिय़ों की मदद करनी थी और कुछ अन्य अमेरिकी सेनाओं ने भी उनकी मदद की। इस जंग ने नावहो को हीरो बना दिया। वह लिखते हैं कि सैनिक उनकी राइफलें और रेडियो उठाने की पेशकश करते थे। कुछ के साथ तो व्यक्तिगत अंगरक्षक तैनात किए गए ताकि उनको कहीं गलती से अमेरिकी सैनिक उनको जापानी न समझ बैठें।  बहरहाल, ट्रंप के दादा-दादी, नाना-नानी और यहां तक कि उनकी मां भी अमेरिका में नहीं जन्मे थे। उनको यह समझना चाहिए कि तमाम अफ्रीकी-अमेरिकियों की तरह नावहो ने भी अमेरिकी राष्ट्र के निर्माण में बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। 
Keyword: america, donald trum, white house,,
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