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क्या चीन की कठपुतली बन जाएगा ऑस्ट्रेलिया?

नितिन पई /  December 07, 2017

ऑस्ट्रेलिया के इतिहास में यह पहला मौका है जब उसने इस बात को माना है कि शायद अमेरिका के पास क्षेत्रीय व्यवस्था को बरकरार रखने के लिए इच्छाशक्ति या साधन नहीं है। बता रहे हैं नितिन पई

 
पिछले कुछ महीनों से मेरा ध्यान ऑस्ट्रेलिया में हो रही घटनाओं पर लगा हुआ है। लगभग हर सप्ताह खबरें आ रही हैं कि ऑस्ट्रेलिया की राजनीति और सार्वजनिक जीवन को प्रभावित करने के लिए चीन एक के बाद एक क्या हथकंडे अपना रहा है। आखिरकार इस सप्ताह प्रधानमंत्री मैलकम टर्नबुल की सरकार ने देश में राजनीतिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की विदेशी शक्तियों की कोशिशों को रोकने के लिए एक नए कानून की घोषणा कर दी।
 
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि चीन अपने हितों को साधने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। इसमें लालच देना, भ्रष्टïाचार और डराना धमकाना शामिल है। अलबत्ता जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा चौंकाया वह यह है कि ऑस्ट्रेलिया के कानून के तहत प्रथम दृष्टïया इनमें से कुछ भी गैर कानूनी नहीं है। राजनीतिक दल चीन से जुड़े उद्योगपतियों से चंदा ले सकते हैं। पूर्व कैबिनेट मंत्री चीन के कारोबारियों से जुड़ी कंपनियों और संस्थाओं में मोटी तनख्वाह वाली नौकरियां कर सकते हैं। इन कारोबारियों के धन का स्रोत रहस्यमय है। मौजूदा सांसद अपनी पार्टी के रुख से हटकर विदेश नीति पर चीन की भाषा बोल सकते हैं। छात्र संगठन चीन के वाणिज्य दूतावासों के प्रतिनिधि के रूप में काम कर सकते हैं और चीनी भाषा के सभी ऑस्ट्रेलियाई अखबार चीन की जबान बोल सकते हैं।
 
ऑस्ट्रेलिया में चीन का राजनीतिक प्रभाव सामान्य स्तर को पार कर गया था। यह बात 2015 में उस समय स्पष्टï हो गई जब ऑस्ट्रेलिया के खुफिया विभाग के अधिकारियों ने देश की मुख्य धारा की पार्टियों को इन गतिविधियों के बारे में जानकारी दी। लेकिन इसके बावजूद इसमें कोई बदलाव नहीं आया। चीन से जुड़े एक रहस्यमय कारोबारी से चंदा लेने पर विपक्षी लेबर पार्टी के नेताओं को आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। यहां तक कि सत्तारूढ़ लिबरल पार्टी के एक नेता की प्रचार टीम में एक ऐसा व्यक्ति शामिल है जिसे चीन से जुड़े एक दूसरे रहस्यमय कारोबारी का दाहिना हाथ माना जाता है।
 
इधर चीन खुले तौर पर राजनीतिक प्रभाव खरीद रहा था और उधर ऑस्ट्रेलिया के उप प्रधानमंत्री और चार सांसदों को संसद की सदस्यता के अयोग्य घोषित कर दिया गया। इन लोगों के पास राष्ट्रमंडल देशों की दोहरी नागरिकता थी और कुछ को तो इसकी जानकारी भी नहीं थी। अदालतों ने उन्हें अयोग्य ठहराया। इस तरह 100 साल पुराने कानून ने ऑस्ट्रेलिया को विदेशी प्रभाव से बचा लिया और न्यूजीलैंड, कनाडा और ब्रिटेन की नापाक साजिशों की कलई खोल दी।
 
साफ है कि विदेशी प्रभाव को रोकने के लिए नए नियमों की जरूरत थी। टर्नबुल सरकार अब राजनीतिक दलों को विदेशी चंदे पर प्रतिबंध लगाना चाहती है। साथ ही राजनीतिक प्रभाव की कोशिश कर रहे विदेशियों और घरेलू राजनीतिक दलों के प्रचारकों को पंजीकरण की जरूरत होगी। इसके अलावा जासूसी और देशद्रोह के नियमों को और सख्त बनाया जाएगा। इससे विदेशी शक्तियों का घरेलू राजनीति में दखल तो नहीं रुकेगा लेकिन उनका काम मुश्किल जरूर हो जाएगा और सबसे अहम बात यह है कि ऐसा करना कानून का उल्लंघन होगा।
 
कानूनों के जरिये उस प्रत्यक्ष राजनीतिक प्रभाव को तो कम किया जा सकता है जो नंगी आखों से दिखता है लेकिन ऑस्ट्रेलिया के लिए खुद को उस तरह के ऑनलाइन हथकंडों से बचाना मुश्किल होगा जैसे रूसियों ने कथित तौर पर अमेरिका के राष्ट्रपति चुनावों में अपनाए थे। ऑस्ट्रेलिया का समाज उदार और बहुत ज्यादा आपसी जुड़ाव वाला है। यही वजह है कि इसमें व्यापक पैमाने पर सूचनाओं के प्रसार का खतरा है। ऐसे खुले समाजों में जहां अभिव्यक्ति की आजादी को संरक्षण हासिल है, वहां इस समस्या से निपटना मुश्किल होता है।
 
कैनबरा के प्रोफेसर क्लाइव हैमिल्टन ने 'साइलेंट इनवेजन: हाउ चाइना इज टर्निंग ऑस्ट्रेलिया इनटू ए पपेट स्टेट' शीर्षक के साथ एक किताब लिखी है लेकिन प्रकाशक इसे छापने में देरी चाहते थे। इसके पीछे कई कारण थे। उनमें एक कारण यह था कि राजनीतिक चंदे से जुड़े विवाद के केंद्र में रहे चीन के रहस्यमय कारोबारियों में से एक ने कानूनी कार्रवाई की धमकी दी है। हैमिल्टन ने लिखा, 'चीन या उसके एजेंटों ने कोई वास्तविक धमकी नहीं दी, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के ऊपर छाए बादल ही पर्याप्त थे। चीनी मूल के लोगों के दिलों में व्याप्त कम्युनिस्ट पार्टी का डर अब ऑस्ट्रेलिया के मुख्य धारा के लोगों में भी फैल गया है। ऐलन ऐंड अनविन ऑस्ट्रेलिया की सबसे प्रशंसनीय प्रकाशक कंपनी है। इसलिए उसका फैसला ऑस्ट्रेलिया के राजनीतिक इतिहास में एक बड़ा अहम मोड़ है। यह इस बात का संकेत है कि एक शक्तिशाली अधिनायकवादी विदेशी सरकार विदेशों में अपनी आलोचना को दबा सकती है और इस देश को अपने दायरे में लाने का उसका मौजूदा प्रचार का रास्ता आसान हो गया है।' कैनबरा विश्वविद्यालय की चाइनीज स्टूडेंट्स ऐंड स्कॉलर्स एसोसिएशन की अध्यक्ष से जब पूछा गया कि अगर चीन के बागी छात्र मानवाधिकार के मुद्दे पर ऑस्ट्रेलिया के कॉलेज परिसरों में प्रदर्शन करते हैं तो क्या वह चीनी दूतावास को अलर्ट करेंगी तो उन्होंने कहा कि वह ऐसा करेंगी। उन्होंने कहा, 'सभी छात्रों की सुरक्षा के लिए निश्चित रूप से मैं ऐसा करूंगी। चीन के लिए भी मैं ऐसा करूंगी।'
 
मैंने खुद विदेशी विश्वविद्यालयों के परिसरों में चीन के छात्रों की दादागीरी देखी है। एक दशक पहले सिंगापुर में मेरे एक प्रोफेसर को विश्वविद्यालय प्रशासन के समक्ष पेशी देनी पड़ी थी। उन्होंने कहा था कि माओ-त्से तुंग की नीतियों के कारण दो करोड़ से अधिक लोग मारे गए थे। कुछ ही दिन बाद उन्हें कुछ छात्रों की भावनाओं को आहत करने के लिए माफी मांगकर शर्मसार होना पड़ा था। मुझे संदेह है कि विश्वविद्यालय ने चीनी दूतावास के कोप से बचने के लिए यह तरीका अपनाया था।
 
उदार लोकतांत्रिक समाजों को अनुदारवाद से निपटने में धर्मसंकट का सामना करना पड़ता है। यह उदारवाद का तकाजा है कि अनुदारवादियों को अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकता है, फिर चाहे वे उदारवाद को ही कमजोर करने पर आमादा क्यों न हों। उदार लोकतंत्र में रहने वाले हम सभी लोगों को भीतर और बाहर इस चुनौती का सामना करना है। 
 
भारत में हमारे लिए यह समझना मुश्किल हो सकता है कि ऑस्ट्रेलिया के लिए चीनी प्रभाव से बचना कितना कठिन है। ऑस्ट्रेलिया में न केवल बड़ी संख्या में चीनी प्रवासी नागरिक हैं और न केवल इसकी अर्थव्यवस्था काफी हद तक चीन पर निर्भर है, बल्कि अपने इतिहास में पहली बार ऑस्ट्रेलिया ने इस बात को माना है कि शायद अमेरिका के पास क्षेत्रीय व्यवस्था को बनाए रखने के लिए इच्छाशक्ति या साधन नहीं है। 
 
पिछले महीने के अंत में ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने विदेश नीति पर एक श्वेत पत्र जारी किया जिसका परोक्ष रूप से क्षेत्र में चीन की ताकत को संतुलित करने के लिए काम करने की प्रतिबद्घता जताई गई थी। कुछ दिन पहले इसके खिलाफ विचार देखने को मिले। लंबे समय से चीन के पक्ष में आवाज उठाने वाले ह्यूज व्हाइट ने अपने लेख 'क्वार्टरली एसे' में दलील दी कि ऑस्ट्रेलिया के पास चीन के साथ जाने के अलावा कोई चारा नहीं है।
 
(लेखक तक्षशिला इंस्टीट्यूशन के सहसंस्थापक और निदेशक हैं।)
Keyword: india, Australia, america, china,
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