बिजनेस स्टैंडर्ड - जीडीपी दर की सही समझ होना बहस से ज्यादा जरूरी
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जीडीपी दर की सही समझ होना बहस से ज्यादा जरूरी

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  December 06, 2017

पिछले सप्ताह जब सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के नए आंकड़े जारी किए गए तो टेलीविजन चैनलों पर हमेशा की तरह बहस-मुबाहिसे छिड़ गए। तमाम तरह के लोग अर्थव्यवस्था की स्थिति पर बहस करने सामने आए। परंतु उनमें से कुछ ही लोगों को पता था कि दरअसल यह मुद्दा क्या है।  इस बात को समझा जा सकता है क्योंकि जीडीपी की वृद्धि दर का आकलन तकनीकी मामला ही नहीं बल्कि यह अनुमानित भी होता है। उदाहरण के तौर पर 6.3, 5.7, 8.4 या जो भी वृद्धि दर हासिल होती है वह केवल यही बताती है कि अर्थव्यवस्था में तमाम चीजों का उत्पादन कुल मिलाकर इसी आंकड़े के इर्दगिर्द रहा। इसे लेकर बहुत उत्साहित होने का अर्थ है कुछ ऐसी चीजों को लेकर उत्साहित होना जिन चीजों से हमारा कोई सीधा वास्ता प्राय: नहीं रहता। यह कुछ वैसा ही है कि मानो इस बात पर जिरह करना कि किसी रॉकेट के पृथ्वी की कक्षा से बाहर जाने की गति क्या थी। इससे भला क्या लेना देना? क्या इतना काफी नहीं कि रॉकेट पृथ्वी की कक्षा से बाहर चला गया। 

 
इसी तरह आम आदमी के लिए इस बात का कोई महत्त्व नहीं कि तिमाही जीडीपी वृद्धि दर कितनी थी। कुछ मामूली प्रतिशत का अंत देश की 99.9 फीसदी आबादी की जिंदगी पर कोई असर नहीं डालता। यही वजह है कि इस विषय पर टेलीविजन चैनल पर चर्चा करना बेमानी है। कम से कम ऐसे लोगों को इस विषय पर बहस नहीं करनी चाहिए जिन्हें  आंकड़ों के विश्लेषण का समुचित ज्ञान नहीं है। इसके बावजूद हर तीन महीने पर इन्हें लेकर बहस शुरू हो जाती है जिससे न किसी का ज्ञान बढ़ता है और न किसी का भला होता है।
 
इस बात को जरा समझते हैं। जीडीपी वृद्धि दर के साथ इस किस्म का जुड़ाव सन 1945 के बाद आरंभ हुआ। शुरुआत के तकरीबन 40 सालों तक यह अमेरिका और सोवियत संघ के बीच बौद्धिकता का एक दिखावा बना रहा। दोनों एक दूसरे को नीचा दिखाने और अपनी व्यवस्था को बेहतर दिखाने के लिए इसका इस्तेमाल करते थे। सन 1980 के दशक के मध्य तक यह स्पष्ट हो गया कि सोवियत संघ की व्यवस्था अनुपयोगी थी। इस बीच अमेरिका का ध्यान बॉन्ड बाजार की ओर गया जिनके पास बहुत फंड था और जो उसका इस्तेमाल करना चाहते थे। 
 
इस तरह जीडीपी वृद्धि दर एक वांछित चीज बन गई। अगर यह ऊंची होती और बढ़ रही होती तो इसका मतलब यह होता कि बॉन्ड बाजार बेहतर हालात में है। यानी ब्याज दरें कम होतीं। इसका उलटा भी इतना ही सच था। सन 1990 के दशक में चीन की अर्थव्यवस्था और निवेश को आकर्षित करने वाली उसकी नीतियां सामने आईं। अमेरिकी पूंजी चीन जाने लगी और इसलिए चीन के जीडीपी का निरंतर आकलन करना एक जरूरत बन गया। चीन विदेश निवेश की आवक जारी रखने के लिए इसे बढ़ाचढ़ाकर पेश करता रहा।
 
सन 1990 के दशक के अंत तक निजी पूंजी में खूब इजाफा होने लगा था और तब तक जीडीपी वृद्धि दर काफी हद तक वैसी हो चुकी थी जैसा कि चिकित्सकों और मरीजों के लिए शरीर का तापमान। यानी इसके आधार पर किसी अत्यंत जटिल समस्या का मोटा-मोटा अनुमान लगाया जाता। इसकी जटिलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उत्पादन में कोई भी इजाफा किए बिना केवल बाजार मूल्य पर करों को दोगुना करके जीडीपी को दो गुना बढ़ाया जा सकता है। इसकी वजह यह है कि बाजार मूल्य पर जीडीपी में सरकार की आय और सब्सिडी घटाकर निकला राजस्व शामिल होता है। शुद्ध राजस्व जितनी तेजी से बढ़ता है, जीडीपी में भी उतनी ही तेजी से इजाफा देखने को मिलेगा।
 
एक और बात है। अगर आप किसी रेस्तरां में जाते हैं और सरकार द्वारा निर्धारित 100 रुपये का प्रवेश शुल्क देते हैं लेकिन आप वहां बिना कुछ खाए वापस आ जाते हैं तो इसका मतलब यह हुआ कि आपने कोई सेवा नहीं ली। यानी सरकार को बिना कुछ किए ही 100 रुपये मिल गए। अगले वर्ष अगर सरकार कर बढ़ाकर 110 रुपये कर देती है और दोबारा यही होता है यानी आप बिना खाए वापस आ जाते हैं तो बिना किसी उत्पादन के अर्थव्यवस्था में 10 फीसदी का इजाफा हो जाता है। 
 
आखिर में, जीडीपी वृद्धि दर का आकलन कच्चे माल की लागत और उत्पादन मूल्य के अंतर के आधार पर भी किया जाता है। अगर कच्चे माल पर 100 रुपये व्यय किए जाते हैं और उत्पादित वस्तु को 100.10 रुपये मूल्य पर बेचा जाता है तो वृद्धि दर में इजाफा होता है। इसका उलट भी उतना ही सच है। इससे एक विडंबना निर्मित होती है। अगर वैश्विक स्तर पर कीमतें बढऩी शुरू होती हैं। मान लेते हैं कि अगर तेल की कीमत बढ़ती है तो भारत की जीडीपी वृद्धि दर कम होगी। जब तक आम आदमी को ये पहेलियां समझ में नहीं आती हैं तब तक टेलीविजन पर प्राइम टाइम में होने वाली बहसों में जीडीपी पर चर्चा करने का कोई औचित्य नहीं है। इतना ही नहीं सरकार को भी इसे लेकर अपनी तारीफ करना और विपक्ष का उसको नीचा दिखाना बंद कर दिया जाना चाहिए।
Keyword: GDP, growth,,
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