बिजनेस स्टैंडर्ड - जीएसटी व्यवस्था और राजस्व निरपेक्षता
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जीएसटी व्यवस्था और राजस्व निरपेक्षता

नीलकंठ मिश्रा /  December 06, 2017

देश के कुल कर राजस्व में 40 फीसदी तक की हिस्सेदारी रखने वाले करों को जीएसटी में समाहित कर दिया गया है। ऐसे में राजस्व निरपेक्षता हासिल करना काफी अहम है। विस्तार से बता रहे हैं नीलकंठ मिश्रा

 
अब ज्यादातर लोगों के सामने यह बात एकदम स्पष्ट हो चुकी है कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की शुरुआत तो कड़ी मेहनत का पहला चरण था और आने वाली कुछ तिमाहियों के दौरान कई मोर्चों पर जबरदस्त कुशलता का परिचय देना होगा। यहां हम राजकोषीय मोर्चे के कुछ बिंदुओं का आकलन करेंगे।  जीएसटी में जिन करों को समाहित किया गया वे देश की कुल कर प्राप्तियों में 40 फीसदी तक हिस्सेदारी रखते हैं। ऐसे में राजस्व निरपेक्ष स्तर हासिल करना बहुत अहम है। यानी इससे इतना कर एकत्रित होना चाहिए जितना कि केंद्र और राज्यों ने पुरानी कर व्यवस्था में आकलित किया था। अगर यह उससे अधिक कर जुटा पाता है तो इससे राजकोषीय सख्ती आ सकती है और अर्थव्यवस्था की गति धीमी हो सकती है क्योंकि सरकारी व्यय में अचानक इजाफा नहीं किया जा सकता है। वहीं अगर कर बजट की तुलना में कम होते हैं तो इसका मतलब होगा राजकोषीय राहत और अर्थव्यवस्था को ऐसा मौद्रिक प्रोत्साहन जिसकी जरूरत नहीं थी। 
 
यहां दो सवाल अहम हैं। एक तो कर संग्रह का राजस्व निरपेक्ष स्तर क्या है और क्या जीएसटी संग्रह के आरंभिक चार महीने जरूरी दर से कर जुटा पाए हैं।  जो लोग सरकार से बाहर हैं उनके लिए तो पहले सवाल का उत्तर भी स्पष्टï नहीं है। क्रेडिट सुइस का अनुमान है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने इस वित्त वर्ष करों का जो अनुमान लगाया था उसमें करीब 10.6 लाख करोड़ रुपये मूल्य के कर जीएसटी में समाहित हो गए हैं।  परंतु इसमें कई अनुमान लगाना भी शामिल हैं। विशेष तौर पर केंद्रीय करों के मामले में जहां कम से कम कुछ बजट अनुमान मौजूद हैं। 
 
राज्यों की बात करें तो राज्यों के बजट के अलग-अलग प्रारूप पर नजर डालनी होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की ओर से राज्यों के बजटों के सार तत्त्व का प्रकाशन बजट प्रस्तुत करने के 15 महीने बाद ही किया जाता है। उसके बावजूद कई बातें सामने नहीं आ पाएंगी। उदाहरण के लिए राज्यों के बिक्री कर अनुमान में पेट्रोल, डीजल और अल्कोहल का क्या आकलन है क्योंकि ये जीएसटी का हिस्सा नहीं हैं। या फिर नगर निकायों द्वारा तय किए गए प्रवेश शुल्क का आकलन।
 
हाल ही में जारी किए गए आंकड़े बताते हैं कि राज्य सरकारों को पहले चार महीनों में 1.55 लाख करोड़ रुपये (सालाना 4.8 लाख करोड़) की प्राप्तियां हुईं। यह राशि राज्य सरकारों के राजस्व निरपेक्ष स्तर के बराबर या उससे ऊपर होनी चाहिए क्योंकि इसमें राजस्व में कमी के हर्जाने को भी शामिल किया गया है। चूंकि केंद्र और राज्यों को सीजीएसटी और एसजीएसटी के चलते बराबर राजस्व मिलना है इसलिए केंद्र का लक्ष्य भी समान होना चाहिए। इस प्रकार कुल राशि करीब 9.6 लाख करोड़ रुपये होती है, जो हमारे अनुमान से एक लाख करोड़ रुपये कम है। जाहिर है इस कवायद में पर्याप्त चुनौतियां हैं।  
 
दूसरे सवाल का जवाब कहीं अधिक चतुराई की मांग करता है। पहले चार महीनों के संग्रहण को तीन से गुणा करने पर सालाना संग्रहण 10.8 लाख करोड़ रुपये आता है। सामयिक समायोजन के साथ हमें 11.2 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा मिलता है। परंतु शुरुआती चार महीनों में कई अन्य विसंगतियां हैं जिनका समायोजन करना मुश्किल है। शुरुआत करते हैं इन्वेंटरी से यानी ऐसी वस्तुओं  या उत्पादों से जो गोदामों में हैं या किसी प्रक्रिया के अधीन हैं। 
 
उदाहरण के लिए किसी खुदरा गोदाम में रखे साबुन पर लगने वाले कर का 90 फीसदी चुकता होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि 1 जुलाई को जीएसटी लागू होने के बाद जब यह इन्वेंटरी तैयार हुई उस वक्त तक राजस्व दर ज्यादा उल्लिखित रही होगी। वहीं दूसरी ओर जीएसटी एक गतिविधि आधारित कर है। गतिविधि का स्तर अगस्त के मध्य तक धीमा था क्योंकि कारोबारी नई कर व्यवस्था को लेकर सहज होने का प्रयास कर रहे थे। इतना ही नहीं कई कारोबार तो अपनी इनवॉयस पुरानी तिथियों में तैयार कर रहे थे। यानी जुलाई में हुई बिक्री के लिए जून का इनवॉयस। खासतौर पर ऐसा उन श्रेणियों में किया जा रहा था जहां कर दरें बढ़ाई गई थीं। आखिर में रिटर्न दाखिल करने की धीमी गति ने भी संग्रहण को प्रभावित किया। जुलाई और अगस्त में क्रमश: 59-59 लाख रिटर्न दाखिल किए गए। यह आंकड़ा पहली समय सीमा से 50 से 60 फीसदी ज्यादा था। सरकार ने अब तक उन लोगों से अर्जित अतिरिक्त राजस्व का जिक्र नहीं किया है जिन्होंने पहले के महीनों में देरी से रिटर्न दाखिल किए। 
 
इसके बाद अनुपालन का मामला है। इस बात के प्रचुर प्रमाण हैं जिनसे पता चलता है कि इसमें इजाफा हुआ है जबकि आमतौर पर दुनिया के किसी भी देश में पहले साल में अनुपालन अक्सर कम होता है और वह धीरे-धीरे स्थिर होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अधिकारियों को व्यवस्था की कमियां दूर करने में वक्त लगता है। परंतु जागरूक करदाता प्राय: खामियों का पता लगाकर उनका फायदा उठाते हैं। 
 
सरकार की हालिया प्रेस विज्ञप्तियों को देखें तो जीएसटी को लेकर उनमें कहा जा रहा है कि यह एक स्वघोषित कर है जहां इनवॅायस के मिलान, रिवर्स चार्ज या ईवे बिलिंग के रूप में कोई जांच परख नहीं है। इन सब को एक साल के लिए टाल दिया गया है। ऐसे में अभी यह स्पष्टï करना जरूरी है कि आम धारणा के उलट अधिकांश कारोबारी शुद्घ कर चुकाते हैं। वे सकल कर चुकाकर क्रेडिट की प्रतीक्षा नहीं करते। केवल निर्यातक ही उन चंद लोगों में शामिल हैं जिनको रिफंड की प्रतीक्षा करनी पड़ रही है। 
 
देखा जाए तो कुल जीएसटी संग्रह राजस्व निरपेक्षता से ऊपर प्रतीत होता है और आने वाले दिनों में जीएसटी परिषद दरों में और कटौती की घोषणा कर सकती है। ऐसे में कुछ सवाल हैं जिनके जवाब हमें तलाश करने होंगे। मसलन, राजस्व निरपेक्षता की सीमा क्या होगी?  क्या बड़ा और अनावंटित आईजीएसटी (नवंबर के अंत तक करीब 1.2 लाख करोड़ रुपये), सीजीएसटी और एसजीएसटी की चुनौतियों को दिखाता है? क्या इस कर का इस्तेमाल केंद्र सरकार द्वारा इस साल के बजट में किया जा सकता है? पारदर्शिता बरकरार रखने के लिए और बॉन्ड बाजार में अवांछित अस्थिरता दूर रखने के लिए इन मुद्दों पर स्पष्टïता आनी जरूरी है। अगले वित्त वर्ष के बजट को अंतिम रूप देने से पहले ऐसा किया जाना चाहिए। 
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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