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दर्शकों की बाट जोहता रेवाड़ी रेल संग्रहालय

विवेक देवराय /  December 05, 2017

देश में भाप के 16 इंजन चालू हालत में हैं। उनमें से 11 रेवाड़ी में हैं। परंतु तमाम आकर्षण के बावजूद रेवाड़ी वाणिज्यिक दृष्टिï से व्यवहार्य नहीं साबित हो रहा है। विस्तार से बता रहे हैं विवेक देवराय

 
कुछ सप्ताह पहले एक खबर आई थी। रेवाड़ी रेलवे हेरिटेज म्यूजियम जिसे पहले रेवाड़ी स्टीम लोकोमोटिव शेड के नाम से जाना जाता था, वहां एक स्टीम (भाप से चलने वाला) इंजन पटरी से उतर गया। यह अकबर (डब्ल्यूपी 7161) नामक एक जाना माना इंजन था जिसे चितरंजन लोकोमोटिव वक्र्स (सीएलडब्ल्यू) ने सन 1965 में बनाया था। डीजल और इलेक्ट्रिक इंजन के आगमन से बहुत पहले सन 1960 और 1970 के दशक में यही भाप इंजन भारतीय रेल की रीढ़ हुआ करते थे। शुरुआती डब्ल्यूपी इंजन बॉल्डविन लोकोमोटिव वक्र्स (फिलाडेल्फिया) द्वारा तैयार किए जाते थे। बाद में कनाडा, पोलैंड और ऑस्ट्रिया में इनका निर्माण होने लगा। चितरंजन में बहुत बाद तक इनका उत्पादन हुआ। तमाम डब्ल्यूपी इंजनों की नाक कोन की तरह होती थी जिस पर एक सितारा टंका रहता था। अगर पूछा जाए कि भारत का आखिरी भाप इंजन कब बना तो इसका उत्तर गेज पर निर्भर करता है। अगर ब्रॉड गेज को ध्यान में रखें तो ऐसा आखिरी इंजन सन 1970 में बना था। इसे 'अंतिम सितारा' नाम दिया गया था जिसे समझा जा सकता है। लंबे समय तक हम भाप इंजन समेत अपनी रेलवे विरासत को सहेजने को लेकर सुनिश्चित नहीं थे। परंतु 'अंतिम सितारा' को सीएलडब्ल्यू में सहेज कर रखा गया है हालांकि यह चलने की स्थिति में नहीं है। 'अंतिम सितारा' एक बढिय़ा भाप इंजन था। अकबर भी आखिरी दिनों में बना भाप इंजन था। ऐसा अंतिम इंजन सन 1967 में बनाया गया था। यह सिलिगुड़ी में था और बाद में उसे रेवाड़ी लाकर दोबारा खड़ा किया गया। यह कई फिल्मों में दिखाया जा चुका है और अपेक्षाकृत प्रसिद्घ इंजन है।
 
अभी 16 भाप इंजन चालू हालत में हैं और उनमें से 11 रेवाड़ी में रखे हुए हैं। काम कर रहे सबसे पुराने भाप इंजनों में से एक ट्विंस एक्सप्रेस पेरंबूर में और दूसरा फेयरी क्वीन रेवाड़ी में है। इसका निर्माण 1855 में हुआ था। इससे पहले फेयरी क्वीन का इस्तेमाल अक्टूबर से मार्च तक दिल्ली और अलवर के बीच परिचालन में होता था। इसे स्टीम एक्सप्रेस का नाम दिया गया था और बाद में इसे अकबर के सहारे खींचा जाता था। 
 
कुछ वर्ष पहले मेरी पत्नी और मैं इसके सफर पर थे जहां हमें शानदार अनुभव हुआ। जाहिर सी बात है बाजार इन चीजों के बारे में नहीं सोचता है। दिल्ली-अलवर-दिल्ली की यह यात्रा व्यावसायिक रूप से अव्यावहारिक हो चली थी और इसे बंद करना पड़ा। अब दिल्ली से रेवाड़ी के बीच एक स्टीम एक्सप्रेस चलती है। अलवर वाली ट्रेन सप्ताहांत पर चलती थी जबकि रेवाड़ी वाली दिन में चलती है। यह ट्रेन दिल्ली कैंट से सुबह निकलती है और शाम को वापस आती है। रेवाड़ी जाते समय फेयरी क्वीन का इस्तेमाल होता है जबकि वापसी में एक डीजल लोकोमोटिव का प्रयोग किया जाता है। अलवर की यात्रा की तरह इस ट्रेन में खानेपीने की व्यवस्था नहीं है। यह हर दूसरे शनिवार को जाती है और अगर कुल 60 में से 50 फीसदी से अधिक सीटें भर जाएं तो चौथे शनिवार को भी। 
 
इस यात्रा में आने-जाने का टिकट करीब 6,500 रुपये का पड़ता है लेकिन आधी कीमत देकर आप एक तरफ का टिकट भी खरीद सकते हैं। हाल ही में मैंने और मेरी पत्नी ने इसमें सफर किया। जाते वक्त तो कुछ मुसाफिर थे लेकिन वापसी में यह लगभग खाली थी। हमें बताया गया कि विदेशी यात्रियों के मौसम में तस्वीर दूसरी होती है। हालांकि मुझे इस बात में संदेह है और लगता है कि यह भी किराये के चलते अव्यवहार्य साबित होगी और बंद हो जाएगी।
 
रेवाड़ी में अकबर का एक साथी भाप इंजन भी है डब्ल्यूपी 7200। यह कहीं अधिक पुराना है और इसे सन 1947 में बॉल्डविन लोकोमोटिव वक्र्स ने बनाया था। यह पहले हावड़ा में था हालांकि इसका ऐतिहासिक मोल है। इसे 15 अगस्त 1947 को भारतीय रेल को तोहफे में दिया गया था। हालांकि यह अक्टूबर 1947 में भारत पहुंचा। हालांकि शुरुआत में इसे शहंशाह का नाम दिया गया था लेकिन आखिरकार यह आजाद कहलाया। रेवाड़ी में जो 11 भाप इंजन हैं उनमें से 7 ब्रॉड गेज के और 4 मीटर गेज के हैं। इन सभी को सन 1950 और 1960 के दशक में टेल्को ने बनाया। मीटरगेज के हर इंजन की अपनी कहानी है। बहरहाल, ज्यादातर लोग ब्रॉड गेज से कहीं अधिक जुड़ाव महसूस करते हैं। फेयरी क्वीन, अकबर, आजाद और विराट आदि इसके उदाहरण हैं। विराट का निर्माण भी सन 1943 में बॉल्डविन ने किया था। शेर ए पंजाब (डब्ल्यूएल 15005) के साथ भी इतिहास जुड़ा है। इसका निर्माण सन 1955 में वल्कान फाउंड्री ने किया था। 6 दिसंबर 1995 को यह आखिरी बार फिरोजपुर और लोहिया खास के बीच एक ट्रेन में चला। परंतु सेवानिवृत्ति के बाद भी इतिहास के साथ इसका जुड़ाव खत्म नहीं हुआ है। यह पैलेस ऑन व्हील्स को खींच रहा था। उस समय ट्रेन में कोई यात्री तो नहीं था लेकिन इसके बॉयलर में खराबी आ गई। ट्रेन चालक और एक निरीक्षक का निधन हो गया। पुलिस ने इस इंजन को जब्त कर लिया और अदालती हस्तक्षेप के बाद ही इसे दोबारा हासिल किया जा सका। 
 
सन 1893 में बना रेवाड़ी स्टीम लोकोमोटिव शेड भी काफी पुराना है। यह मीटर गेज शेड था। दिल्ली और रेवाड़ी के बीच मीटर गेज लाइन 1873 में बिछाई गई। मीटर गेज के उस जमाने में रेवाड़ी एक बड़ा स्टेशन था। वहां से राजस्थान, गुजरात और पंजाब की ओर लाइन जाती थी। दिल्ली से इनमें से किसी भी दिशा में जाने वाली ट्रेन को रेवाड़ी से गुजरना होता था। गेज बदलने के बाद भी इसका महत्त्व बना रहा लेकिन मीटर गेज शेड अप्रासंगिक हो गया। 
 
शताब्दी आयोजन के बाद शेड को स्टीम लोकोमोटिव शेड के रूप में बंद कर दिया गया। कुछ वर्ष तक यह मीटर गेज डीजल लोकोमोटिव के रखरखाव का केंद्र रहा। परंतु स्टीम के बाद मीटर गेज का भी अंत निकट था। वर्ष 2002 में कहा गया कि रेवाड़ी स्टीम लोकोमोटिव शेड को रेवाड़ी रेलवे हेरिटेज म्यूजियम में तब्दील किया जाएगा। शेड में मीटर गेज के अलावा ब्रॉड गेज लाइन भी बिछाई गई। वर्ष 2010 के बाद धीरे-धीरे उपरोक्त इंजन यहां लाए गए और उन पर काम किया गया। दुर्भाग्य की बात है कि ज्यादा लोग इस संग्रहालय में नहीं जाते। 
 
(लेखक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के प्रमुख हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: railway, रेल station,,
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