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जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां बदलाव से बचने की जरूरत

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  December 04, 2017

ब्रिटेन की चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ी पत्रिका लांसेट ने जून 2017 में भारत के 15 राज्यों में मधुमेह के प्रसार के बारे में एक अध्ययन रिपोर्ट प्रकाशित की। चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों के एक समूह ने यह अध्ययन किया और इसके लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने वित्त की व्यवस्था की। इसके आंकड़े चौंकाने वाले हैं। अध्ययन के मुताबिक भारत में 7 फीसदी लोग (15 राज्यों के आंकड़ों के आधार पर) मधुमेह के शिकार हैं और 10 से 15 फीसदी लोग मधुमेह से पहले की स्थिति (शुरुआती लक्षण खासकर ब्लड शुगर का बढ़ा स्तर) से ग्रसित हैं। एक गरीब देश पर यह कोई छोटा मोटा स्वास्थ्य बोझ नहीं है।

 
अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि हम एक महामारी की ओर बढ़ रहे हैं। गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और चंडीगढ़ जैसे उच्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वाले राज्यों में मधुमेह का प्रसार ज्यादा है जबकि बिहार और झारखंड जैसे गरीब राज्यों में यह कम है। उच्च आय स्तर वाले राज्यों दिल्ली और गोवा के नमूनों का अभी इंतजार है। शहरी इलाकों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में मधुमेह की दर कम है। लेकिन इस अध्ययन में सबसे बड़ी चिंता की बात यह सामने आई है कि समृद्घ राज्यों के शहरों में अमीरों की तुलना में गरीबों में मधुमेह के प्रसार की समस्या ज्यादा है। दूसरे शब्दों में कहें तो समृद्घ शहरों में अमीरों ने खाने पीने की अच्छी आदतें सीख ली हैं।
 
लेकिन अब गरीब लोगों को स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह भोजन की आदत लग रही है। अध्ययन में पाया गया कि ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक-आर्थिक रूप से संपन्न लोग मधुमेह की चपेट में आ रहे हैं। अध्ययन में कहा गया, 'यह एक महामारी है जो संक्रमण की स्थिति में है।' शहरी इलाकों में मधुमेह की चपेट में आए गरीबों और ग्रामीण इलाकों में इसकी शिकार संपन्न आबादी के मद्देनजर यह स्थिति आसानी से बेकाबू हो सकती है। स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह भोजन की वजह से हम भोजन की कमी या कुपोषण की स्थिति से जरूरत से अधिक पोषण की तरफ जा रहे हैं। यह ऐसा बदलाव है जिससे हर हाल में बचा जाना चाहिए। 
 
डाउन टु अर्थ के ताजा प्रकाशन बॉडी बर्डन: लाइफस्टाइल डिजीजेज में इस पर चर्चा की गई है। सच्चाई यह है कि भारत को केवल बीमारियों का दोहरा बोझ कहा जा सकता है। हमारे यहां कुपोषण से लेकर हैजा तक गरीबों की सभी बीमारियां हैं। लेकिन साथ ही हमारे पास कैंसर और मधुमेह जैसी संपन्न लोगों की बीमारियां भी मौजूद है। आईसीएमआर अध्ययन से पता चलता है कि गरीबों को अमीरों वाली बीमारियां हो रही हैं लेकिन दु:खद बात यह है कि वे इलाज का खर्च वहन करने की स्थिति में नहीं हैं।
 
रोकथाम की नीति शुरू करने का यही सबसे उपयुक्त समय है। हम जानते हैं कि गैर संचारी कही जाने वाली ये बीमारियां हमारी जीवनशैली से जुड़ी हैं। यानी हम जो खाते हैं, जिस हवा में सांस लेते हैं और जिस माहौल में रहते हैं, उनसे इन बीमारियां का सीधा संबंध है। यह विषाक्त पदार्थों के विकास के पैकेज का हिस्सा है। यह विकास का ऐसा मॉडल है जहां हम पहले प्रदूषण फैलाते हैं और फिर इसकी सफाई के बारे में सोचते हैं, ऐसा मॉडल जहां हम अपने भोजन में औद्योगिक-रसायन मिलाते हैं, स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह भोजन खाते हैं और फिर कसरत करने के लिए जिम जाने या फिर जैविक भोजन खाने के बारे में सोचते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम इस बदलाव से बच नहीं सकते हैं?
 
क्या हम गरीब लेकिन अस्वस्थ समाज से संपन्न और स्वस्थ समाज की तरफ नहीं जा सकते? हमें एक ऐसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों को क्यों हासिल करना चाहिए जिसे छोड़ा जा सकता है? इसमें ही बदलाव की दरकार है। हमें अपने स्वास्थ्य और पर्यावरण के स्वास्थ्य के बीच अहम संबंध बनाने की जरूरत है। आज प्रदूषित जल के कारण हमारी नदियां मर रही हैं और यह देश में बच्चों की मौत के प्रमुख कारणों में से एक है। महिलाओं के लिए घरों में स्वच्छ ऊर्जा का अभाव है जिससे उन्हें जैव ईंधन में खाना बनाना पड़ रहा है। इससे वे सांस की गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रही हैं। साथ ही यह वायु प्रदूषण के लिए भी जिम्मेदार है जिससे हवा में जहर घुल रहा है। इसलिए स्वास्थ्य पर्यावरण का एक सूचक है। 
 
अच्छी बात यह है कि हमारा स्वास्थ्य ही पर्यावरण संरक्षण के लिए कदम उठाने का वास्तविक उत्प्रेरक है। हम तभी पर्यावरण में सुधार के लिए कदम उठाएंगे जब हमें लगेगा कि इससे सीधे तौर पर हमें नुकसान हो रहा है। उदाहरण के लिए आज दिल्ली में वायु प्रदूषण के खिलाफ लोगों में रोष है। इसका कारण है कि 2017-18 की सर्दियों में जन स्वास्थ्य की आपात स्थिति (जब प्रदूषण का स्तर बेकाबू हो गया) ने विषाक्त पदार्थों और हमारे शरीर के बीच संबंध को एक तरह से स्पष्टï कर दिया है। यह बदलाव को गति देगा। 
 
संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) में बच्चों को केंद्र में रखने की जरूरत है। इसके तहत 2030 तक दुनिया के लिए 13 लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। हर लक्ष्य का बच्चों से संबंध है और हर लक्ष्य का बच्चे के स्वास्थ्य और इस तरह धरती के स्वास्थ्य से संबंध है। यह सतत विकास लक्ष्यों का मानवीय चेहरा है जो हमारी सफलता या असफलता को परिभाषित करेगा। हमारे बच्चों के स्वास्थ्य को हमारी धरती के स्वास्थ्य के केंद्र में रखा जाना चाहिए। इनमें कोई एकदूसरे के बिना अपना अस्तित्व कायम नहीं रख सकता है। 
 
(लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट से संबद्ध हैं)
Keyword: pharma, medicine, britain,,
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