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निर्गम विकल्प

संपादकीय /  December 04, 2017

सलिल पारेख को इन्फोसिस का दूसरा गैर संस्थापक मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) बनाया गया है। कंपनी के पहले गैर संस्थापक सीईओ विशाल सिक्का को अत्यंत कटु परिस्थितियों में बाहर जाना पड़ा था। बहरहाल, देश की दूसरी सबसे बड़ी सूचना प्रौद्योगिकी सेवा प्रदाता कंपनी के पास अब अवसर है कि वह अपने सह-संस्थापकों के तीन साल पुराने अनुरोध पर ध्यान दे सके जिसमें उन्होंने बतौर प्रवर्तक अपना दर्जा समाप्त करने की मांग की थी। इससे इन्फोसिस के बोर्ड को यह स्वायत्तता मिलेगी कि वह कंपनी को बिना किसी दबाव के चला सके। वर्ष 2014 में एन आर नारायण मूर्ति द्वारा एक पेशेवर उत्तराधिकारी की नियुक्ति के बाद से ही कंपनी के संस्थापकों का दर्जा अस्पष्टï बना रहा है। 

 
बतौर प्रवर्तक इन्फोसिस के पांच सह-संस्थापकों के पास कानूनी जवाबदेहियां हैं। कंपनी के अधीन और स्टॉक एक्सचेंज के कानूनों के तहत उन पर अंदरूनी व्यक्ति या भेदिया होने की भी जवाबदेही है। परंतु वर्ष 2014 के बाद से जब उन्होंने कंपनी के संचालन की जिम्मेदारी छोड़ दी तो प्रवर्तक के रूप में उनका दर्जा बरकरार रहने का मतलब यह था कि वे प्रबंधन के निर्णयों के लिए कानूनी तौर पर जिम्मेदार बने रहेंगे। यही वजह है कि उन्होंने कंपनी के प्रबंधन से यह अनुरोध किया कि बतौर प्रवर्तक उनका दर्जा समाप्त किया जाए। प्रवर्तक समूह के पास परिवार समेत कंपनी के 12.76 फीसदी शेयर हैं। बोर्ड ने कंपनी के संस्थापकों से अनुरोध किया कि वे प्रवर्तक बने रहें। मोटे तौर पर ऐसा इसलिए किया गया ताकि ग्राहकों और अंशधारकों का भरोसा बना रहे। कंपनी का प्रदर्शन सुधारने के मकसद से सह-संस्थापक डी शिबूलाल के स्थान पर जब सन 2014 में नारायणमूर्ति दोबारा कार्यकारी चेयरमैन बने तो उनकी जो आलोचना हुई शायद उसके चलते ही उन्होंने सिक्का के कमान संभालने के बाद बोर्ड में शामिल होने से इनकार कर दिया। मूर्ति के पास प्रत्यक्ष तौर पर कंपनी के एक फीसदी से भी कम शेयर हैं लेकिन उनके परिवार के पास 3.44 फीसदी हिस्सेदारी है। इस तरह उनका परिवार कंपनी का अकेला सबसे बड़ा अंशधारक बना हुआ है।
 
देखा जाए तो सन 2016 में जब मूर्ति ने 20 करोड़ डॉलर में इजरायली इन्फोटेक कंपनी पनाया की खरीद में अनियमितताओं को लेकर चिंता जताई थी तब वह एकदम सही थे। उस विवाद के चलते ही सिक्का को पद छोडऩा पड़ा। इसमें भी दो राय नहीं है कि एक व्हिसल ब्लोअर के आरोप के बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से जो कुछ कहा उससे कंपनी का कुछ भला नहीं हुआ। फिर भी सौदे के मूल्य को लेकर उनका खुलासे और अधिग्रहण के तत्काल बाद वरिष्ठï कार्याधिकारियों द्वारा पद छोडऩे के फैसले ने कंपनी के बोर्ड को एक स्वतंत्र जांच शुरू करने पर मजबूर किया। यह अच्छा कदम था लेकिन उस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया। बचाव की कोशिश के रूप में नंदन नीलेकणी की वापसी से यही संकेत मिलता है कि इन्फोसिस और उसके प्रवर्तकों को अलग करना मुश्किल है। इससे कंपनी के संचालन मॉडल के स्थायित्व को लेकर गंभीर संदेह उत्पन्न हुए हैं। नीलेकणी ने मोटेतौर पर यही जताया है कि वह कंपनी में अपनी प्रबंधकीय भूमिका निभाने के अनिच्छुक हैं। 
 
यह बात ध्यान देने लायक है कि इन्फोसिस के संस्थापकों द्वारा प्रवर्तक का दर्जा समाप्त किए जाने के अनुरोध के बाद ही भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड ने प्रवर्तकों के लिए नियामकी खाके पर पुनर्विचार शुरू किया। उसके सूचीबद्घता संबंधी दायित्व और खुलासा आवश्यकताओं संबंधी नियम अब प्रवर्तकों को सख्त मानकों के अधीन अवर्गीकृत होने की इजाजत देते हैं। कंपनी के रोजमर्रा के काम में शामिल न होना उनमें से एक है। इससे इन्फोसिस के बोर्ड को भी एक मौका मिलता है कि वह अपने संस्थापकों की सामान्य निवेशक बनाए जाने की गुजारिश पर ध्यान दे। 
Keyword: infosys, आईटी सेवा प्रदाता इन्फोसिस,
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