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उज्जीवन-इक्विटास, निवेशक निराश

हंसिनी कार्तिक /  December 03, 2017

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अक्टूबर 2015 में लघु वित्त बैंक (एसएफसी) के लिए जब पात्र गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) की सूची जारी की थी तो उस समय सबको खासी उत्सुकता जगी थी। हालांकि अब दो साल बाद जब निवेशक इनके प्रदर्शन खासकर इक्विटास और उज्जीवन के काम-काज पर नजर डालते हैं तो उन्हें निराशा होती है और ऐसा होना जायज भी है। सबसे पहले इक्विटास होल्डिंग्स ने अप्रैल 2016 में बाजार में दस्तक दी थी। जब उसने अपना सार्वजनिक निर्गम पेश किया था तो उसकी सूक्ष्म वित्त ऋण में हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से कहीं अधिक थी। लेकिन तब से प्रबंधन के अधीन कुल परिसंपत्तियों में सूक्ष्म वित्त ऋण की हिस्सेदारी सितंबर 2017 में घटकर 36 प्रतिशत रह गई। 

 
दिसंबर 2016 की तिमाही में सूक्ष्म वित्त खंड को आवंटित ऋण पर लागत बढ़ कर 3.6 प्रतिशत हो गई। कंपनी को  नोटबंदी से अपनी प्रबंधनाधीन परिसंपत्तयों में विविधता लाने के प्रयास में मदद मिली। इस समय गैर-सूक्ष्म वित्त बहीखाता कारोबारी ऋण, कृषि क्षेत्र को आवंटित ऋण और कॉर्पोरेट ऋण में विभाजित हैं। गैर-सूक्ष्म वित्त में ऋण वृद्धि दर सूक्ष्म वित्त क्षेत्र से अधिक है और इक्विटास वित्त वर्ष 2019 तक सूक्ष्म वित्त पर निर्भरता कम कर 25 प्रतिशत तक करना चाहती है। हालांकि, इन सभी के लिए कुछ कीमत चुकानी पड़ती है। अपना कारोबार एसएफबी मॉडल के साथ जोडऩे में इसका प्रतिफल अनुपात गड़बड़ा गया। जून 2016 में जहां इक्विटी पर रिटर्न (आरओई) 14 फीसदी था, जो वित्त वर्ष 2018 की दूसरी तिमाही में कम होकर महज 2 प्रतिशत रह गया। 
 
दूसरी तिमाही में इसने सूक्ष्म वित्त खंड का बहीखाता कम कर दिया, जिससे प्रबंनाधीन परिसंपत्तियों में भी सालाना वृद्धि महज 3.5 प्रतिशत रह गई। हालांकि अब नोटबंदी का असर लगभग खत्म हो चुका है, ऐसे में एडिलवाइस के विश्लेषकों का मानना है कि क्रियान्वयन जोखिम से निपटने के लिए इक्विटास के पास पर्याप्त पूंजी है। विश्लेषकों ने कहा, 'फ्रैंचाइजी में निवेश, बढ़ी लागत एवं प्रावधान से वित्त वर्ष 2018 में आय में कमी आएगी, लेकिन वित्त वर्ष 2019 से लाभ मिलना शुरू हो जाएगा।'
 
उज्जीवन फाइनैंशियल सर्विसेस ने जो राह चुनी है, वह भी बहुत अलग नहीं है, हालांकि गैर-सूक्ष्म वित्त पोर्टफोलियो बढ़ाने में इसने उतनी जल्दबाजी नहीं दिखाई है। नतीजा यह हुआ कि नोटबंदी से इस पर खासा असर हुआ और इसकी ऋण लागत, यहां तक कि सूक्ष्म वित्त पोर्टफोलियो के लिए भी, वित्त वर्ष 2018 की दूसरी तिमाही में 4.8 प्रतिशत के ऊंचे स्तर पर रही। इस घटना से इसके लिए प्रबंधनाधीन परिसपंत्तियों में विविधता लाने की रफ्तार भी कम हो गई। इसका नतीजा यह हुआ कि उज्जीवन अब भी अपनी प्रबंधनाधीन परिसंपत्ति का 85 प्रतिशत हिस्सा सूक्ष्म वित्त ऋण से हासिल करती है, जबकि शेष हिस्से में असुरक्षित ऋण, आवासीय ऋण और लघु एवं मझोले उद्यमों को दिए गए ऋण शामिल हैं। इसके ऋण खाते में सूक्ष्म वित्त पोर्टफोलिया की हिस्सेदारी अधिक होने से पिछले एक साल में इसका रिटर्न रेशियो बुरी तरह प्रभावित हुआ है। हालांकि कुछ सकारात्मक बातें भी हैं। ऐक्सिस कैपिटल के विश्लेषकों के अनुसार नोटबंदी के बाद उज्जीवन के परिचालन में तेजी से सुधार हुआ है और उनके अनुसार वित्त वर्ष 2019 तक यह सामान्य स्थिति में आ जाएगा।
 
कम से कम कारोबार के शुरुआती दिनों में एसएफबी कारोबार के लिए रिटर्न में कुछ कमी आना लगभग तय लग रहा है। हाल में इस कारोबार में आई एयू स्मॉल फाइनैंस बैंक को भी दूसरी तिमाही में कोई रियायत नहीं मिली। विदेशी ब्रोकरेज कंपनी मॉर्गन स्टैनली के अनुसार इसका इक्विटी पर रिटर्न वित्त वर्ष 2017 के 20.4 प्रतिशत से कम होकर वित्त वर्ष 2018 में 12.4 प्रतिशत रह सकता है। 
 
आखिर रिटर्न रेशियो गिरने की स्थिति में निवेशकों को इन शेयरों के प्रति क्या रुख रखना चाहिए? इक्विटास का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है और पिछला एक साल इसके खराब वित्तीय आंकड़े दर्शाता है। दूसरी ओर उज्जीवन अपनी बुनियादी मजबूती से जुड़ी चिंताओं को पूरी तरह दूर नहीं कर सका है। इसके ऋण खाते में विविधता लाने से मध्यम अवधि में लागत अधिक बढ़ सकती है। इसे देखते हुए निवेशक यह देखने की कोशिश करेंगे कि लघु वित्त बैंक किसी तरह अगले 6 से 12 महीनों में अपने वादे पूरे करते है या नहींं। हालांकि दीर्घ अवधि में ये निवेश के लिए आकर्षक साबित होंगे। 
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