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जीडीपी आंकड़ों से बंधी उम्मीद मगर सालाना लक्ष्य नहीं आसान

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  December 03, 2017

अगर भारतीय अर्थव्यवस्था को विभिन्न एजेंसियों के वृद्धि के पूर्वानुमानों के आसपास पहुंचना है तो उसे बाकी दो तिमाहियों के दौरान प्रत्येक में कम से कम 7.5 फीसदी वृद्धि हासिल करनी होगी। नीति-निर्माता केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) द्वारा गुरुवार को जारी जुलाई-सितंबर 2017 के आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों की व्याख्या में इस बात की अनदेखी नहीं कर सकते। 

 
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने इस साल 4 अक्टूबर को अपनी पिछली मौद्रिक नीति समीक्षा में 2017-18 के अपने वृद्धि के अनुमान को 7.3 फीसदी से घटाकर 6.7 फीसदी कर दिया है। इसके कुछ दिनों बाद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी भारत की वृद्धि का अपना अनुमान 7.2 फीसदी से घटाकर 6.7 फीसदी कर दिया। इससे पहले केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने भी वृद्धि के अपने मूल अनुमान 6.75-7.50 फीसदी में गिरावट के आसार जताए थे। 
 
चालू वित्त वर्ष की पहली दो तिमाहियों के दौरान भारत का मूल कीमतों पर सकल मूल्य संवर्धन (जीवीए) 5.83 फीसदी बढ़ा है। यह पहली तिमाही में 5.56 फीसदी और दूसरी तिमाही में 6.1 फीसदी रहा। इसलिए पूरे वर्ष में कम से कम 6.7 फीसदी वृद्धि हासिल करने के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था को अक्टूबर-दिसंबर 2017 और जनवरी-मार्च 2018 तिमाही में कम से कम 7.57 फीसदी की दर से बढऩा होगा। मोटे रूप से देखते हैं तो ऐसा लगता है कि शेष दो तिमाहियों के दौरान प्रत्येक में 7.5 फीसदी वृद्धि का लक्ष्य मुश्किल नहीं है। लेकिन इसका बारीक विश्लेषण करते हैं तो पता चलता है कि इसे हासिल करना इतना आसान भी नहीं होगा। 
 
विनिर्माण क्षेत्र को ही लेते हैं, जिसका वृद्धि पैमाने में 15 फीसदी भारांश है। चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में यह क्षेत्र 7 फीसदी बढ़ा है और ऐसा लगता है कि लगातार दो तिमाहियों तक कमजोर वृद्धि के बाद यह उबर आया है। लेकिन विनिर्माण क्षेत्र में ऊंची वृद्धि दरें और अर्थव्यवस्था में कुल जीवीए में बढ़ोतरी के बीच सकारात्मक सहसंबंध नीति-निर्माताओं की चिंता बढ़ा सकता है। पिछली 14 तिमाहियों के दौरान हर तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि 9 फीसदी से अधिक रही है, जबकि पूरी अर्थव्यवस्था का सकल मूल्य संवर्धन भी 7 फीसदी से अधिक बढ़ा है। दूसरे शब्दों में 9 फीसदी से अधिक विनिर्माण वृद्धि दर से बाकी दो तिमाहियों में आर्थिक वृद्धि को बढ़ाना आसान हो सकता है। बड़ा सवाल यह है कि क्या विनिर्माण क्षेत्र वर्तमान हालत में इतनी ताकत रखता है कि वह लगातार दो तिमाहियों तक 9 फीसदी से अधिक वृद्धि दर हासिल कर सकता है। पिछली 14 तिमाहियों में विनिर्माण क्षेत्र केवल 6 तिमाहियों में 9 फीसदी से अधिक बढ़ा है। सरकारी व्यय एवं सार्वजनिक प्रशासन का वृद्धि मापदंड में 13 फीसदी भारांश है और यह भी नीति-निर्माताओं की चिंता बढ़ा सकता है। सरकार के अपने राजकोषीय घाटे को काबू में रखने के लिए खर्च को कम रखने लिए बाध्य हो सकती है, इसलिए मूल्य संवर्धन वृद्धि को इस क्षेत्र से कम सहारा मिलेगा। 
 
चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही के दौरान सरकारी व्यय पहले ही घटकर 6 फीसदी पर आ चुका है, जो पहली तिमाही में 9.4 फीसदी था। इससे चालू वित्त वर्ष की बाकी दो तिमाहियों में फिर से बढऩे की संभावना नहीं है, जिसका कुल आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। वित्त वर्ष 2016-17 की अंतिम दो तिमाहियों में सरकारी खर्च का ऊंचा आधार प्रभाव भी इस साल के लिए नकारात्मक रहेगा। 
 
कृषि क्षेत्र भी चिंता की वजह रहेगा। खरीफ फसलों के उत्पादन में गिरावट से कृषि वृद्धि को पटरी पर बनाए रखने का जिम्मा डेयरी, बागवानी, वानिकी, पशुपालन जैसे गैर-फसल खंडों पर रहेगा। लेकिन वित्त वर्ष 2016-17 की अंतिम दो तिमाहियों का ऊंचा आधार प्रभाव कृषि क्षेत्र की वृद्धि के सुधरने के लिए चुनौतीपूर्ण होगा। कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में महज 2 फीसदी रही है। 
 
निर्माण क्षेत्र में भी सुधार के कोई संकेत दिखाई नहीं दे रहे हैं। इसकी वृद्धि दर चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में महज 2.12 फीसदी रही है, जिससे आगे अच्छी वृद्धि की संभावना नजर नहीं आती है। हालांकि अब नोटबंदी का असर खत्म हो गया है। ऐसा लगता है कि निर्माण क्षेत्र आंतरिक दिक्कतों का शिकार है, जिन्हें पहचानकर दूर किया जाना जरूरी है। इसलिए प्रमुख योगदान सेवा क्षेत्र देगा, जिसका कुल भारांश 46 फीसदी है। इसमें व्यापार, होटल, परिवहन, संचार, वित्तीय सेवाएं, रियल एस्टेट, पेशेवर और अन्य सेवाएं शामिल हैं। निर्यात के आंकड़े लगातार कमजोर बने हुए हैं, इसलिए इस बात पर सवालिया निशान लगा हुआ है कि क्या सेवा क्षेत्र शेष दो तिमाहियों में पहली छमाही की 8 फीसदी वृद्धि से काफी ज्यादा वृद्धि दर्ज कर सकता है। 
 
खनन और विद्युत क्षेत्रों के प्रदर्शन से कुछ उम्मीद बंधी है। ऐसा लगता है कि इन दोनों क्षेत्रों में सुधार आया है और तेजी से बढ़ रहे हैं। खनन क्षेत्र की वृद्धि दर जुलाई-सितंबर 2017 तिमाही में 5.5 फीसदी रही है, जबकि इससे पिछली तिमाही में इसकी वृद्धि सपाट रही थी। बिजली क्षेत्र भी लगातार वृद्धि दर्ज कर रहा है। यह चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में 7.6 फीसदी बढ़ा है, जबकि पहली तिमाही में वृद्धि 6.56 फीसदी रही थी। 
 
हालांकि लंबी अवधि की चिंता निवेश दर को लेकर है, जो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के एक हिस्से के रूप में लगातार घट रही है। चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में सकल स्थायी पूंजी निर्माण 4 फीसदी से थोड़ा अधिक बढ़ा है, लेकिन जीडीपी के एक हिस्से के रूप में इसमें लगातार गिरावट आ रही है। यह रुझान जुलाई-सितंबर 2016 तिमाही से बना हुआ है। दीर्घकालीन अनवरत वृद्धि के लिए नीति-निर्माताओं को न केवल जीवीए में कुल वृद्धि बल्कि निवेश दर के रुझान में पलटाव पर ध्यान देना चाहिए। 
Keyword: india, economy, IIP, GDP,,
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