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राजनीतिक पूंजी का करें सही इस्तेमाल

दीपक लाल /  December 01, 2017

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने विराट बहुमत से मिली राजनीतिक बढ़त का इस्तेमाल अगर नोटबंदी को उचित ठहराने के बजाय श्रम बाजार सुधार में करें तो बेहतर होगा। विस्तार से बता रहे हैं दीपक लाल

 
सन 1341 में मोहम्मद बिन तुगलक को खजाने की तंगी का सामना करना पड़ा। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि पहले राजधानी को दिल्ली से दौलताबाद ले जाने और फिर वहां से वापस लाने में उसने काफी दरियादिली से खर्च किया था। राजधानी को वापस इसलिए लाना पड़ा क्योंकि नई राजधानी में पानी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी। इस राजकोषीय तंगी को दूर करने के लिए सुल्तान ने चांदी और सोने के सिक्कों के स्थान पर पीतल और तांबे के सिक्के चलाने का चर्चित प्रयोग किया। वह यह भूल गया कि इस योजना की सफलता मुद्रा जारी करने पर राज्य के एकाधिकार से संबद्घ है। समकालीन राजनीतिक विचारक जियाउद्दीन बरनी के मुताबिक, 'इस कदम ने हर हिंदू के घर को टकसाल बना दिया और विभिन्न प्रांतों में रहने वाले हिंदुओं ने लाखों करोड़ों तांबे के सिक्के ढाल लिए।' इससे मुद्रा का मूल्य बेहद गिर गया। इससे मची कारोबारी उथलपुथल को संभालने के लिए सुल्तान ने नई व्यवस्था भंग करते हुए कहा कि कोई भी तांबे के सिक्के जमा करके पुराने सिक्के पा सकता है। इससे तांबे के सिक्कों की बाढ़ आ गई और तुगलकाबाद में इनका पहाड़ सा नजर आने लगा। 19वीं सदी के भारतीय मुद्राशास्त्र विशेषज्ञ ई थॉमस के मुताबिक अगर हर असली नकली मामूली मुद्रा के बदले वास्तविक मुद्रा दी गई तो सुल्तान के तात्कालिक ऋण की भरपाई करने में बहुत अधिक व्यय हुआ होगा। मिल्टन फ्रीडमैन ने अपनी किताब मनी मिसचीफ में जो बातें लिखी हैं, यह उनका पहला भारतीय उदाहरण था। 
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर, 2016 को 86 फीसदी प्रचलित मुद्रा को बंद करने और उनकी जगह नए नोट लाने की घोषणा कर दी। परंतु अर्थव्यवस्था में पुनर्नकदीकरण की प्रक्रिया धीमी थी। गोपनीयता के चलते नए नोट घोषणा के पहले छापे नहीं जा सके थे। एक अनुमान के मुताबिक 8 नवंबर के बाद देश की टकसालों में देश की जरूरत भी की नकदी छपने में एक वर्ष का समय लगना था। इससे उस वक्त नकदी की भीषण कमी उत्पन्न हुई जो अब तक पूरी तरह ठीक नहीं हो सकी है। 
 
मिल्टन फ्रीडमैन और एन्ना श्वाट्र्ज की किताब अ मॉनिटरी हिस्ट्री ऑफ द यूनाइटेड स्टेट्स में कहा गया है कि वैश्विक महामंदी के लिए अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा सन 1920 दशक में की गई तगड़ी मौद्रिक कमी उत्तरदायी थी। उसके अलावा जो भी कारण बताए जाते हैं वे सब उस कदर उत्तरदायी नहीं हैं। हाल के दिनों में भारत में वृद्घि में आए धीमेपन को समझने के लिए भी विभिन्न टीकाकार वैसी ही वजहें प्रस्तुत कर रहे हैं। बेन बर्नान्के ने फ्रीडमैन के समक्ष इस बात को माना कि फेडरल रिजर्व ने उनकी और एन्ना श्वाट्र्ज की किताब के सबक को अंगीकृत किया है और वह अमेरिका की व्यापक मौद्रिक आपूर्ति को कभी संकुचित नहीं होने देगा। उन्होंने मंदी के दौर में क्वांटिटेटिव ईजिंग यानी मौद्रिक प्रोत्साहन को अपनाकर ऐसा किया और उसे महामंदी में बदलने से रोका। 
 
इस समाचार पत्र ने भी लिखा था कि घरेलू टकसालों में नकदी छपने की धीमी गति के मद्देनजर भारत विदेशी मुद्रणालयों में भी नकदी छापने का काम कर सकता था। सन 1990 के दशक के मध्य में मैं तूरिन में एक इंटरनैशनल सेंटर फॉर इकनॉमिक रिसर्च का फेलो था। उस वक्त बगल वाले ऑफिस में सोमाली केंद्रीय बैंक के पिछले गवर्नर काम करते थे। उसके बाद देश में अफरातफरी मची और वह निर्वासित हो गए। उन्होंने मुझे कानून विहीन हो चुके सोमालिया में मुद्रास्फीति का एक ग्राफ बनाकर दिखाया। उन्होंने बताया कि वह एकदम सपाट है क्योंकि सोमालिया की मुद्रा का मुद्रण स्विट्जरलैंड की फर्म डे ला र्यू करती है और उसे विमान से सोमालिया भेजा जाता है। आखिरी खेप सोमालिया के पतन के ठीक पहले आई थी और वह वहां से निकल भागे। चूंकि आगे की छपाई के पैसे देने और मुद्रित नकदी मंगाने के लिए वहां सरकार ही नहीं थी तो सोमालिया की मुद्रा आपूर्ति ठहर गई और साथ ही मुद्रास्फीति भी। 
 
हम उम्मीद कर सकते हैं कि नोटबंदी के एक साल बाद तक व्याप्त मौद्रिक संकुचन ने नॉमिनल जीडीपी को कम किया होगा। हालांकि, वर्ष 2016-17 की आर्थिक समीक्षा के दूसरे खंड में कहा गया है कि नॉमिनल जीडीपी में बढ़ोतरी देखने को मिली। इसे पहेली बताया गया है जबकि यह कोई पहेली नहीं है। असंगठित क्षेत्र ज्यादातर नकदी पर निर्भर है। उसमें यकीनन संगठित क्षेत्र की तुलना में ज्यादा संकुचन हुआ होगा। परंतु देश के राष्टï्रीय आय के लेखा की व्यवस्था की एक कमी यह है कि इसमें असंगठित क्षेत्र के उत्पादन का भरोसेमंद आकलन केवल एनएसएस के पांचवर्षीय सर्वेक्षण में होता है। जबकि बीच के वर्षों में इसका अनुमान संगठित क्षेत्र की आय के एक तयशुदा हिस्से के रूप में किया जाता है। यानी नॉमिनल जीडीपी पर नोटबंदी के प्रभाव के आकलन का कोई विश्वसनीय तरीका नहीं है। इतना ही नहीं असंगठित क्षेत्र में मासिक या तिमाही रोजगार को लेकर भी कोई दीर्घकालिक सर्वे या आंकड़ा हमारे सामने नहीं है इसलिए नोटबंदी के उस पर असर का आकलन भी संभव नहीं। 
 
दावा किया गया कि नोटबंदी से बड़ा लाभ काले धन पर आधारित अर्थव्यवस्था से निजात के रूप में सामने आया है। कई पर्यवेक्षकों ने कहा कि काले धन के मौजूदा भंडार से तो निपट सकती है लेकिन नए काले धन से नहीं। चुनाव और विनिर्माण गतिविधियां दो ऐसे क्षेत्र हैं जब काले धन की मांग जोरों पर रहती है। चुनाव में काला धन रोकने के लिए राजनीतिक दलों को मिलने वाली दान की प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और लेखायोग्य बनाए रखना है। वहीं विनिर्माण गतिविधियों में काला धन रोकने के लिए अचल संपत्ति से जुड़े लेनदेन में स्टांप शुल्क को समाप्त करना या कम करना शमिल है। ऐसा करने से काले धन के इस्तेमाल को मिलने वाला प्रोत्साहन समाप्त हो जाएगा। 
 
मैंने मोदी के प्रधानमंत्री बनने का स्वागत किया था लेकिन अब मैं निराश हूं। इसलिए क्योंकि भूमि, श्रम और पूंजी के कारक बाजारों में विसंगति बरकरार है। मुझे लगा था कि इनमें सुधार होगा और आर्थिक विकास गति पकड़ेगा। दिवालिया कानून के गठन और बैंकिंग व्यवस्था में व्याप्त फंसे हुए कर्ज से निपटने की प्रक्रिया के रूप में जो पूंजी बाजार सुधार अपनाए गए हैं, मैं उनका स्वागत करता हूं। परंतु इंदिरा गांधी के बैंक राष्टï्रीयकरण को पूरी तरह समाप्त करने की आवश्यकता है। वहीं जो भूमि और श्रम बाजार सुधार पहले अध्यादेश में लाए गए थे उनको राज्य सभा में राजग को बहुमत मिलने के बाद पारित किया जा सकेगा। श्रम बाजार सुधार के लिए संगठित क्षेत्र के भेदियों के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी। यह प्रधानमंत्री की राजनीतिक पूंजी का सही इस्तेमाल होगा बजाय नोटबंदी जैसे आत्मघाती कदम के। अब कहा जा रहा है कि नोटबंदी का लक्ष्य था अर्थव्यवस्था को नकदी रहित बनाना। 
Keyword: narendra modi, development, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,
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