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जनता की कार को होना पड़ा समस्याओं से दो-चार?

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  November 30, 2017

क्या टाटा नैनो की बिक्री में आ रही गिरावट बाजार के सामान्य तौर-तरीके को दर्शाती है या फिर इसकी कोई और वजह है? यह जानना रुचिकर होगा। आइए इस पर एक नजर डालते हैं। सामान्य तौर पर देखें तो नैनो कार की नौ साल की बाजार अवधि ठीकठाक प्रतीत होती है। वाहन उद्योग के पेशेवर भी मानते हैं कि एक छोटी कार की औसत बाजार उम्र एक दशक की होती है। 

 
हालांकि यह अवधि भी कार में निरंतर सुधार और हर पांचवें छठे साल उसे सुधार के साथ पेश करने पर निर्भर होती है। वर्ष 2008 में जब यह कार एक लाख रुपये के मूल्य पर पेश की गई तो अनुमान लगाया गया था कि यह अकेले दम पर देश के कार बाजार को दोगुना कर देगी। परंतु नैनो की शानदार सफलता का दौर केवल दो वित्त वर्षों 2010-11 और 2011-12 में ही चला। इन दोनों सालों के दौरान इस कार की सालाना बिक्री का आंकड़ा 70,000 के पार रहा। हालांकि टाटा मोटर्स को कभी इस कार की बिक्री से मुनाफा नहीं हुआ।
 
वर्ष 2012 के बाद से नैनो की बिक्री में गिरावट देखने को मिली और चालू वित्त वर्ष की मई-अक्टूबर छमाही में बमुश्किल 1,500 नैनो बिकीं। कंपनी ने दिल्ली ऑटो एक्सपो में सालाना 10 लाख कारों की बिक्री का लक्ष्य तय किया था जिससे यह निहायत कम है। ध्यान रहे कि रॉयटर्स ने उस आयोजन को किसी पॉप कंसर्ट या ऑस्कर समारोह के अनुरूप बताया था। नैनो को आम जनता की कार के रूप में पेश किया गया था लेकिन अगर आम जनता की एक और पसंद मारुति 800 से तुलना की जाए तो नैनो कहीं नहीं ठहरती। मारुति 800 ने सीमित प्रतिस्पर्धा के बीच तीन दशक तक शानदार सफलता हासिल की। उसके बाद ऑल्टो के रूप में उसका उन्नत संस्करण पेश किया गया। हुंडई की सैंट्रो ने भी 16 साल तक सफलतापूर्वक बाजार में कारोबार किया और उसे भी बाद में सैंट्रो जिंग से बदला गया।
 
रतन टाटा ने फाइनैंशियल टाइम्स में नैनो के निर्माण की घोषणा की थी और पूरे विश्व का ध्यान इसकी ओर गया था। परंतु नैनो अन्य शीर्ष आम कारों की तुलना में काफी पीछे साबित हुई। पहली सस्ती कार के रूप में पेश की गई फोर्ड मोटर्स की मॉडल टी कार की बिक्री और प्रचार में सबसे अधिक जोर इस बात पर होता था कि यह आम लोगों द्वारा आसानी से खरीदी जा सकती है बल्कि जो लोग इस कार को बनाते हैं वे भी इसे खरीद सकते हैं। सन 1908 में बाजार में आई यह कार अगले दो दशक तक बिकती रही। यह वाहन उद्योग के इतिहास में सबसे लंबे समय तक उत्पादित होने वाली कारों में से एक थी। 
 
बाद में सन 1970 के दशक में फोक्सवैगन बीटल ने इसका स्थान लिया। नैनो का निर्माण होने के पहले मितव्ययी इंजीनियरिंग का प्रतिरूप बताया जा रहा था। परंतु, उसे सिंगूर से बाहर निकलने के लिए भी खूब चर्चा मिली। पश्चिम बंगाल की मौजूदा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उस वक्त इसके खिलाफ आंदोलन छेड़ा और टाटा नैनो परियोजना को सिंगूर से गुजरात के साणंद ले जाना पड़ा। उस घटना को नरेंद्र मोदी के भारतीय प्रधानमंत्री पद की ओर बढ़ते कदम से जोड़कर भी देखा जाता है। 
 
ममता बनर्जी के उद्योग विरोधी और मोदी के उद्योग समर्थक रुख की अवधारणा तब थोड़ी बदली जब यह स्पष्टï हुआ कि बंगाल हो या गुजरात, जनता की कार के लिए पैसे तो आम करदाताओं की जेब से ही जाने हैं। ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में जिस वाम मोर्चा को पराजित किया उसने टाटा समूह को बेहद रियायती दर पर 900 एकड़ जमीन और कर्ज मुहैया कराया था। इसके अलावा तमाम तरह की कर रियायतें, बिजली में छूट आदि की व्यवस्था भी की गई थी। गुजरात की तत्कालीन मोदी सरकार तो और आगे निकल गई। उसने नैनो संयंत्र के लिए जो रियायतें दीं उनसे एक रिपोर्ट के मुताबिक टाटा समूह को 20 साल में 30,000 करोड़ रुपये की रियायत मिली। 
 
इसमें बहुत अजीब कुछ नहीं है क्योंकि सस्ती कारों का सपना बिना सरकारी मदद के साकार हो ही नहीं सकता। सुजूकी के आगमन तक मारुति एक सरकारी कंपनी हुआ करती थी। सैंट्रो को छोड़ दिया जाए तो देवू की मटीज तथा रेनो और बजाज की लोगान बहुत जल्दी बाजार से बाहर हो गईं। 20वीं सदी के आरंभ में मॉडल टी ही आम जनता की पहली कार रही। अगर एडोल्फ हिटलर की नीतियों का समर्थन नहीं होता और लोगों को कार खरीदने के लिए सस्ता ऋण नहीं दिया जाता तो शायद फोक्सवैगन कभी अपनी सस्ती कार बाजार में नहीं लाती। 
 
यहां तक कि सबसे उदार सरकारी सब्सिडी भी बाजार को गलत समझने की भरपाई नहीं कर सकती। सस्ते और कम लागत के बीच एक मामूली फर्क है। परंतु पहली बार कार खरीदने वाले भारत के किसी व्यक्ति से बेहतर इसे कोई नहीं समझ सकता। सुरक्षा से जुड़े शुबहों और कम उत्पादन मूल्य की बात करें तो शुरुआती नैनो में ये दोनों बातें थीं। दुनिया की सबसे सस्ती कार इन मोर्चो पर कतई खरी नहीं उतरी। 
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