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दिवालिया संहिता से जुड़ी दिक्कतें सुलझाना बहस से ज्यादा जरूरी

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  November 29, 2017

इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंगक्रप्टसी कोड, 2016 (आईबीसी) में अध्यादेश के जरिये संशोधन कर जानबूझकर देनदारी चूकने वालों तथा उनसे जुड़े अन्य लोगों को दिवालिया प्रक्रिया के अयोग्य ठहराने को लेकर छिड़ी बहस द्विपक्षीय और बांटने वाली हो गई है। टेलीविजन चैनलों पर इसे लेकर अलग-अलग विचार सामने आ रहे हैं। इस समाचार पत्र समेत तमाम जगहों पर प्रकाशित आलेखों और स्तंभों में इसके औचित्य पर लगातार बात हो रही है।

 
अध्यादेश को लेकर जो चर्चा चल रही है उसमें डर इस बात का है कि कहीं उससे जुड़ी असली समस्या अनसुलझी न रह जाए। वह समस्या आईबीसी के प्रभाव को ही कमजोर कर सकती है। सबसे पहले उन बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए जिन्हें अयोग्यता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अध्यादेश में ऐसे लोगों की कई श्रेणियां दी गई हैं जो निस्तारण प्रक्रिया में शामिल नहीं हो पाएंगे। इनके अलावा ऐसे अयोग्य व्यक्ति का कोई प्रवर्तक या उससे जुड़ा कोई भी अन्य व्यक्ति प्रक्रिया में शामिल नहीं हो सकेगा। यहां संबंधित व्यक्ति में तमाम संबंधित पक्ष और अयोग्य व्यक्ति के सहयोगी शामिल हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो अगर कोई व्यक्ति एक बार अयोग्य घोषित कर दिया गया तो उसे इसकी महंगी कीमत चुकानी होगी।
 
अयोग्यता की जो तीन श्रेणियां बताई गई हैं उन पर आसानी से यह आरोप लग सकता है कि उन्हें बिना इसके परिणामों के बारे में ठीक से सोचे विचारे तैयार किया गया है। पहली है ऐसे कर्जदार की अयोग्यता जो गैर निष्पादित परिसंपत्ति में वर्गीकृत हो और एक साल से इस श्रेणी में हो। पहली नजर में यह तार्किक लगता है कि भला जो अपना कर्ज नहीं चुका पा रहा है वह किसी अन्य दिवालिया प्रक्रिया में कैसे शिरकत करेगा। बहरहाल, ऐसे व्यक्ति या संस्थान का हर संबंधित पक्ष या हर सहयोगी स्वत: अयोग्य हो जाएगा।
 
आईबीसी की परिभाषा के मुताबिक 2 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाली कंपनी भी संबंधित पक्ष कहलाएगी। सहयोगी शब्द तो और अधिक दिक्कतभरा है। यानी अगर कोई कारोबार किसी भी वजह से नाकाम रहता है तो उस कारोबार का हर प्रवर्तक या हर संबंधित पक्ष और सहयोगी दिवालिया निस्तारण प्रक्रिया में भाग लेने के नाकाबिल हो जाएगा। यह भी नहीं कि केवल अयोग्य व्यक्ति का निस्तारण ही रोका जाएगा बल्कि आईबीसी के अधीन होने वाली किसी निस्तारण प्रक्रिया में उनकी हिस्सेदारी नहीं होगी। यह अतिवाद है और इससे निस्तारण योजना प्रभावित हो सकती है।
 
दूसरा, आईबीसी के अधीन दिवालिया होने वाले के ऋण के गारंटर को भी अयोग्य ठहराया गया है। इसे समझना मुश्किल है। किसी कंपनी के ऋण का गारंटर वह व्यक्ति होता है जिसे ऋण लेने वाले पर भरोसा होता है और वह उसके वादे पर गारंटर बनता है। जब निस्तारण प्रक्रिया तैयार की जाती है तो गारंटर परिसंपत्तियों के मूल्य के लिए उचित कीमत या योजना प्रस्तुत कर सकता है क्योंकि वह इससे जुड़ा होता है और इसे बेहतर समझता है। ऐसे व्यक्ति को निस्तारण प्रक्रिया से दूर रखना अपने आप में निस्तारण प्रक्रिया के लिए ही ठीक नहीं है। निश्चित तौर पर हर संबंधित पक्ष और ऐसे हर गारंटर से जुड़े लोगों को निस्तारण प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया है।
 
तीसरी बात, किसी ऐसे व्यक्ति और उसके सहयोगियों या संबद्ध पक्ष की अयोग्यता जिसे पूंजी बाजार नियामक ने प्रतिभूति बाजार में कारोबार न करने का निर्देश दे रखा हो। इसके लिए किसी समय सीमा का उल्लेख नहीं किया गया है। बाजार नियामक को अतीत में अपनी शक्तियों के लापरवाह इस्तेमाल के लिए जाना जाता रहा है। उसने कई बार ऐसे निर्णय एकपक्षीय भी दिए हैं। कानून की दिशा निर्धारित करने का कोई विज्ञान नहीं है। अदालतें इसका निर्धारण मानवीय समझ और सामने आए मामले के आधार पर करती हैं। अयोग्य ठहराए जाने का यह पैमाना दिवालिया निस्तारण के क्षेत्र से संबंधित पक्ष, सहयोगियों आदि कई लोगों को एक झटके में बाहर कर देगा और इसके पीछे कोई समझदारी भरी वजह भी सामने नहीं आ रही है।
 
अयोग्यता के और भी पैमाने हैं। मिसाल के तौर पर दो साल की सजा के कारण अयोग्यता। भले ही यह सजा किसी भी वजह से हुई हो। ऐसे में अगर परिवार के किसी व्यक्ति को दुर्भाग्यवश सजा हुई हो तो उसके हर रिश्तेदार को दिवालिया निस्तारण के अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा। बहरहाल, उपरोक्त तीन उदाहरण यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि कैसे सार्वजनिक बहस अच्छा बनाम बुरा पर केंद्रित है जबकि ये प्रावधान कुछ अलग ही तरह की तासीर लिए हुए हैं। 
 
आईबीसी अध्यादेश इस बात का एक और उदाहरण है कि कैसे एक ऐसी समस्या को हल करने के लिए कानून बनाया जाता है जो सही ढंग से परिभाषित तक नहीं है। अगर समस्या को हल करने के लिए यह तरीका अख्तियार किया गया है कि दिवालियेपन की वजह बनने वालों तथा उनके परिचितों तक को इसकी प्रक्रिया से दूर रखा जाएगा तो कहा जा सकता है कि यह अध्यादेश अपने आप में हल नहीं है। दिवालियेपन की वजह बनने वाले लोगों को चिह्निïत करने की अवधारणा में ही समस्या है क्योंकि इसमें सबको एक ही तराजू पर तौला गया है। यही वजह है कि आईबीसी में साफ तौर पर निस्तारण पेशेवरों और दिवालिया पेशेवरों की सेवा लेने की बात कही गई है। 
 
दिवालिया कंपनियों के निस्तारण की प्रक्रिया की निगरानी का काम इनका ही है। ऐसे में प्रतिभागियों में से गलत का चयन करने का काम इन पेशेवरों और वित्तीय ऋणदाताओं के जिम्मे रहता है। अगर कोई निस्तारण पेशेवर सही ढंग से काम नहीं कर पाता है तो उनका नियामक इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंगक्रप्टसी बोर्ड नियामकीय हस्तक्षेप कर सकता है। इन के प्रदर्शन का अध्ययन करने के बजाय अध्यादेश ने आईबीसी को ही जोखिम में डाल दिया है। अब वक्त आ गया है कि बेजा शोरगुल से ध्यान हटाकर समस्या की गंभीरता पर ध्यान केंद्रित किया जाए।
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