बिजनेस स्टैंडर्ड - चीन का इंटरनेट और भारतीय आईटी उद्योग
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चीन का इंटरनेट और भारतीय आईटी उद्योग

आकाश प्रकाश /  November 29, 2017

बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियां ही नए क्षेत्रों में जगह बनाने के मामले में भारत की एकमात्र उम्मीद हैं। चीन के उदाहरण के साथ विस्तार से समझा रहे हैं आकाश प्रकाश

 
चीन के इंटरनेट क्षेत्र की सफलता की दास्तान अद्भुत है। शून्य से शुरुआत करने वाले चीन के पास आज 70 करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं और वह अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान तीनों के सम्मिलित आंकड़ों से भी ऊपर है। उसने डिजिटल और ई-कॉमर्स कारोबारी मॉडल को भी बखूबी अपनाया है। ऑनलाइन विज्ञापन, ई-कॉमर्स की पहुंच और इंटरनेट पर बिताए समय का लेखाजोखा देखें तो उसने अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है। वर्ष 2017 में 11 नवंबर को महज एक दिन में अलीबाबा ने 2,500 करोड़ डॉलर से अधिक की बिक्री की जो पिछले साल से 50 फीसदी ज्यादा है। यह अमेरिकी उपभोक्ताओं द्वारा की गई खरीदारी से तीन गुना ज्यादा थी। बमुश्किल 24 घंटों में अलीपे ने 148 करोड़ लेनदेन निपटाए। दुनिया में किसी अन्य कंपनी ने एक दिन में इस पैमाने पर कारोबार नहीं किया। अलीबाबा अब प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर चीन के जीडीपी के करीब 5 फीसदी के बराबर धन का नियंत्रण कर रहा है। वहीं एमेजॉन के पास अमेरिकी जीडीपी का बमुश्किल 0.5 फीसदी है। बीते 10 साल में चीन में ऑनलाइन गेमिंग 24 गुना बढ़ी है, ऑनलाइन विज्ञापन 48 गुना और ई-कॉमर्स 150 गुना बढ़े हैं। 
 
शेयरों ने जमकर पैसा कमाया है। तीन शीर्ष चीनी इंटरनेट कंपनियों अलीबाबा, टेंसेंट और बाइदू का बाजार पूंजीकरण 10 साल पहले के 100 करोड़ डॉलर से बढ़कर 10,000 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया है। अलीबाबा और टेंसेंट दुनिया की शीर्ष 10 कंपनियों में शामिल हो चुकी हैं। इस बाजार पूंजीकरण में जेडीडॉटकॉम, सीट्रिप और तमाम अन्य कंपनियों का मूल्य शामिल नहीं है। इसके चलते कई निवेशकों ने अच्छा पैसा बनाया। 
 
व्यापक डिजिटल विश्व में केवल दो महाशक्तिया हैं चीन और अमेरिका। 100 करोड़ डॉलर से अधिक के मूल्यांकन वाली यूनिकॉर्न कंपनियों में से 40 फीसदी चीन की और 40 फीसदी अमेरिका की हैं। शेष विश्व की कुल भागीदारी 20 फीसदी है। अगर हम बाजार पूंजीकरण के हिसाब से शीर्ष 10 सूचीबद्घ प्रौद्योगिकी कंपनियों पर नजर डालें तो वे या तो चीन की हैं या अमेरिका की। दक्षिण कोरियाई कंपनी सैमसंग एकमात्र अपवाद है। ई-कॉमर्स और डिजिटल कंपनियों ने चीन में लाखों रोजगार उत्पन्न किए हैं। चूंकि चीन ने कभी खुदरा क्षेत्र को बहुत विकसित नहीं किया था इसलिए अमेरिका की तरह वहां रोजगार का नुकसान भी ज्यादा नहीं हुआ। चीन में इसकी वजह से रोजगार बढ़े हैं, बजाय कि पुराने रोजगार कम होने के। चीन की बड़ी कंपनियां अब अपना विस्तार कर रही हैं। बाइदू कृत्रिम बुद्धिमता और स्वचालित कार प्रौद्योगिकी में अग्रणी है, टेंसेंट वीचैट को वैश्विक आधार देने के प्रयास में है जबकि अलीबाबा वीडियो, वित्तीय सेवा और अन्य क्षेत्रों में पांव पसार रही है। इन सबने न केवल चीन बल्कि पूरे विश्व में तमाम क्षेत्रों में निवेश किया है। ऐसे में यह सवाल पूछना बनता है कि भारतीय इंटरनेट क्षेत्र में ऐसा क्यों नहीं हुआ?
 
पहली बात तो यह कि इंटरनेट उपयोग के तमाम मानकों, ब्रॉडबैंड पहुंच और क्रय शक्ति के मामले में हम चीन से दशक भर पीछे हैं। दूसरा, भारत में गूगल और फेसबुक कारोबार कर रहे हैं। हमने इस क्षेत्र को खुला रखा है इसलिए वैश्विक कंपनियों ने दबदबा कायम किया है। चीन में भाषा और सरकारी नीति की बदौलत देसी कंपनियां हावी रहीं। इस बात पर बहस हो सकती है कि भारत ने वैश्विक कंपनियों को प्रवेश क्यों दिया? हमारे देसी कारोबारी भी विदेशी फंडिंग पर ही निर्भर हैं। अगर विदेशी पूंजी से ही काम होना है तो इससे क्या फर्क पड़ता है कि वह अमेरिकी हेज फंड है या एमेजॉन।
 
जब ये कारोबार खड़े हो रहे थे तब हमारे पास पर्याप्त देसी जोखिम पूंजी नहीं थी। आज देश में कितने कारोबारी ऐसे काम में बड़ा निवेश करना चाहेंगे जिसमें दशक भर नुकसान की आशंका हो? अगर बड़ी कंपनियों की आमद रोक दी जाए और केवल घरेलू कारोबारियों को अवसर दिया जाए तो उपभोक्ता की कीमत पर प्रतिस्पर्धा से समझौता होगा।  अहम बात है कि पूंजी मुहैया कराने वाले की राष्ट्रीयता से इतर अधिकांश ऑनलाइन कारोबार में कारोबार, रोजगार और आर्थिक गतिविधियां पूरी तरह देश के भीतर होती हैं। यह सच है कि हमें घरेलू बाजार के लिए इन वैश्विक इंटरनेट कंपनियों से कुछ खास बुनियादी निवेश प्रतिबद्घताओं की मांग करनी चाहिए थी। मसलन अल्फाबेट से ग्रामीण वाईफाई संचार को फंड करने को कहा जा सकता था या एमेजॉन से कहा जा सकता था कि वह शीतगृह शृंखला तैयार करे। मुझे नहीं लगता कि वर्षों पहले किसी ने यह सोचा होगा कि चीन का इंटरनेट कारोबार इतना बड़ा हो जाएगा और भारत इतना आकर्षक बाजार बनकर सामने आएगा। 
 
एक अन्य मुद्दा है देश की सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों के उन्नत तकनीक में निवेश करने में अनिच्छुक रहने की या अक्षम रहने की। चीन के उलट भारतीय प्रौद्योगिक कंपनियां कृत्रिम बुद्घिमता या डाटा एनालिटिक्स में अग्रणी भूमिका निभाने को प्रतिबद्घ नहीं दिख रही। भारतीय कंपनियों के पास ऐसा करने की नकदी और प्रतिभा है लेकिन इच्छाशक्ति और नवाचारी मानसिकता की कमी नजर आ रही है। 
 
सच यह है कि जून 2013 में देश की शीर्ष सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों का बाजार पूंजीकरण चीन की शीर्ष इंटरनेट कंपनियों के समान ही था। आज चीन की तीन प्रमुख कंपनियों का बाजार पूंजीकरण एक लाख करोड़ डॉलर है जबकि भारत की तीन प्रमुख कंपनियों टीसीएस, इन्फोसिस और विप्रो का पूंजीकरण 1,400 करोड़ डॉलर है। अपने मूल आईटी सेवा क्षेत्र में भी इन कंपनियों ने क्षमता निर्माण में पर्याप्त निवेश नहीं किया। इन कंपनियों की वृद्घि में धीमापन आया है क्योंकि वे नई डिजिटल सेवा की दुनिया में हिस्सेदारी नहीं कर पा रहे। मैं भारतीय कंपनियों को दोष नहीं देता। ये अच्छी कंपनियां हैं लेकिन वे अपने अतीत की सफलता की बंधक बनी हुई हैं। वे भविष्य में निवेश करने की इच्छुक नहीं दिखतीं। संभव है समस्या इन कंपनियों के निवेशक आधार में हो। अगर निवेशक या बोर्ड आपको भविष्य के लिहाज से निवेश नहीं करने दे रहे हों तो क्या केवल प्रबंधन टीम को दोष दिया जा सकता है? निवेशकों को अपने ऊपर भी नजर डालनी चाहिए। क्या इन कंपनियों को अरबों डॉलर की नकदी जमा करके रखने की आवश्यकता है? शेयरों की पुनर्खरीद का काम अल्पावधि में फायदा दे सकता है लेकिन अगर नई तकनीक का प्रयोग सफल हो सका तो यह बहुत भारी मूल्यांकन उत्पन्न कर सकती है। भारतीय कंपनियां कृत्रिम बुद्घिमता में निवेश करने से क्यों बचती हैं? हमें ऐसे निवेशक और बोर्ड चाहिए जो इन कदमों का समर्थन करें। आश्वस्त होने का वक्त नहीं है। ये नई प्रौद्योगिकी बाजार को प्रभावित करेंगी, बढिय़ा संपत्ति बनाएंगी और भारत के लिए तो प्रौद्योगिकी कंपनियां ही इस क्षेत्र में एकमात्र उम्मीद हैं। 
Keyword: india, china, industry,,
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