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साल-डेढ़ साल में फिर रफ्तार पकड़ लेगी अर्थव्यवस्था

बीएस संवाददाता /  11 28, 2017

बीएस बातचीत

मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने बिजनेस स्टैंडर्ड के संवाददाताओं और संपादकों के साथ जीडीपी विकास दर से लेकर राजकोषीय मजबूती और जीएसटी जैसे कई पहलुओं पर बात की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश :

नोटबंदी और जीएसटी के बाद अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालत पर आप क्या कहेंगे और आगे किस तरह की संभावनाएं हैं? 

अगले 12 से 18 महीनों में अर्थव्यवस्था दोबारा रफ्तार पकड़ेगी। वैश्विक स्तर पर निर्यात में तेजी आई है और भारत भी इसका एक हिस्सा हो सकता है। नई पूंजी देने और एनपीए के समाधान से बही-खाता संबंधी दोहरी परेशानी से हम निपट पाएंगे। जीएसटी क्रियान्वयन को अब स्थिरता देने की जरूरत है। दूसरी तिमाही में जीडीपी के आंकड़ों पर काफी कुछ निर्भर करेगा। इससे आगे की तस्वीर साफ हो पाएगी। 

दूसरी तिमाही के आंकड़े से आपको कितनी उम्मीदें हैं?

पहली तिमाही के मुकाबले दूसरी तिमाही में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक बेहतर रहा था। अगर आप आंकड़ों पर निगाह डालें तो कुछ बेहतर रहें हैं तो कुछ थोड़े निराश करने वाले हैं। सरकार की ओर से होने वाला व्यय एक बड़ा कारक होगा। फिलहाल हमें इंतजार करना होगा। 

जीएसटी में कैसे बदलाव की जरूरत हैï?

सबसे पहले तो हमें लघु एवं मझोले उद्यमों के लिए जीएसटी को सरल बनाना होगा। मुझे लगता है कि बिजली और जो चीजें जीएसटी से बाहर रखी गई हैं, उन्हें नई कर प्रणाली के तहत लाया जाएगा। इसके बाद एक बार फिर हमें दरों को थोड़ा लचीला बनाना होगा।  

जीएसटी में हुए बदलावों से छोटे उद्यम उलझन में नहीं फंस गए हैं?

जीएसटी लागू होने के बाद जिस तरह के सुझाव एवं प्रतिक्रियाएं मिली हैं, उनके आधार पर जीएसटी में बदलाव हुए हैं। सरकार ने सुझावों के प्रति खासी गंभीरता दिखाई है।

दरों में आगे कैसे बदलाव होंगे?

शुरुआती चरणों में दरों पर भले ही अधिक गतिविधियां दिखी हों, लेकिन अब मामला स्थिर हो रहा है और आगे भी बढ़ रहा है। गुवाहाटी में जीएसटी परिषद की बैठक के बाद हम देखेंगे कि  राजस्व की क्या स्थिति रहती है। दरों में लगातार बदलाव से यथासंभव परहेज करेंगे। 

नोटबंदी-जीएसटी के बाद देश में उत्पादकता प्रभावित हुई है?

जहां तक नोटबंदी की बात है तो मुझे नहीं पता कि उत्पादकता प्रभावित हुई है या नहीं, लेकिन जीएसटी से असर हुआ है। अपने विश्लेषण में एकरूपता बनाए रखने के लिए अगर मैं यह सोचता हूं कि जीएसटी से उत्पादकता पर नकारात्मक असर हुआ है, हालांकि यह अस्थायी असर है। 

तेल कीमतें बढऩे, निर्यात घटने से चालू खाते का घाटा नियंत्रित करना मुश्किल नहीं होगा?

हमारा आकलन था कि तेल बाजार में संरचनात्मक बदलाव आए हैं और लगा कि शेल अधिक मात्रा में उपलब्ध होने से कीमतें 55-60 डॉलर प्रति बैरल रहेंगी। अब कच्चे तेल के मौजूदा स्तर को देखते हुए हमारी माथापच्ची बढ़ गई है। अभी कहना थोड़ी जल्दबाजी होगी, लेकिन तेल कीमतें लंबी अवधि के लिए 60-65 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से अधिक रहेंगी तो मुझे मानना है कि मेरा विश्लेषण पहले सटीक नहीं था। शेल बाजार में उपलब्ध है और इससे पहले सभी ने कहा था कि शेल कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रित रखेगा। मैं थोड़ा इंतजार करूंगा और देखूंगा कि कीमतें निचले स्तर पर आती हैं या नहीं। हालांकि यह सच है कि जब तक तेल 60-70 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहेगी तब तक चालू खाते का घाटा नियंत्रण से बाहर नहीं होगा।

निर्यात कम होने पर क्या कहेंगे?

यह कहना सही नहीं कि निर्यात कम हो रहा है। अगर पिछले तीन महीनों के दौरान विनिर्माण निर्यात में तेजी देखें तो निर्यात 9 प्रतिशत की अधिक दर से बढ़ रहा है। यह पहली तिमाही में थोड़ा अधिक था, पर  9 फीसदी दर अब भी 2016 या पिछले साल से बेहतर है। 

लेकिन अक्टूबर में तो निर्यात कम रहा है। विश्व व्यापार संगठन ने भी भारत के लिए व्यापार अनुमान कर दिया है।

केवल एक महीने के आंकड़ों पर राय बनाना अच्छी बात नहीं है। विनिर्माण निर्यात लगातार 9 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। अर्थव्यवस्था के लिए यह एक सकारात्मक संकेत है। यह तेजी ऐसे समय में शुरू हुई जब करीब 2-3 तिमाही पहले वैश्विक अर्थव्यवस्था में भी तेजी दिखनी शुरू हुई। अब हम यह देखने की कोशिश कर रहे हैं कि यह तेजी दूसरे आर्थिक बाजारों से मेल खाती है या नहीं क्योंकि चीन, जापान और कोरिया में निर्यात तेजी से बढ़ा है।  

सरकार का अगला कदम?

तीन से चार खंड हैं ऐसे हैं जहां काम करने की जरूरत है। खासकर स्वास्थ्य एवं शिक्षा में सुधार की जरूरत है।
Keyword: india, economy, arvind subrahmanyan,,
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