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बढ़ेगा बैंकों के प्रावधान का बोझ

अभिजित लेले / मुंबई November 27, 2017

आक्रामक प्रावधान के साथ खाते-बही को दुरुस्त करने के लिए वाणिज्यिक बैंकों ने जुलाई-सितंबर 2017 की तिमाही में करीब 35,000 करोड़ रुपये बट्टे खाते में डाले और इस तरह से मौजूदा वित्त वर्ष की पहली छमाही में कुल 65,800 करोड़ रुपये बट्टे खाते में डाले गए। रेटिंग एजेंसी इक्रा के मुताबिक, पुराने एनपीए के लिए प्रावधान और एनसीएलटी पहुंचे मामलों की लागत से प्रावधान कवरेज अनुपात वित्त वर्ष 2018 के आखिर में 58-60 फीसदी पर पहुंच जाएगा, जो मार्च 2017 के आखिर में 44.3 फीसदी रहा था।
 
बैंकों का प्रावधान वित्त वर्ष 2018 की दूसरी तिमाही में बढ़कर 64,500 करोड़ रुपये पर पहुंच गया और क्रमिक तौर पर इसमें 40 फीसदी की जबकि साल दर साल के हिसाब से इसमें 30 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। वित्त वर्ष 2018 के अप्रैल-सितंबर के दौरान कुल प्रावधान साल दर साल के हिसाब से 17 फीसदी बढ़ककर 1.1 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। दिवालिया संहिता के तहत कुल 3 लाख करोड़ रुपये के कर्ज का समाधान निकल सकता है। और वित्त वर्ष 2018 के लिए कुल प्रावधान 2.4-2.6 लाख करोड़ रुपये हो सकता है, जो वित्त्त वर्ष 2017 में दो लाख करोड़ रुपये रहा था। इसमें से पहली व दूसरी सूची में दर्ज कंपनियों में से एनसीएलटी पहुंची कंपनियों के लिए मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में 45,000-60,000 करोड़ रुपये के प्रावधान की दरकार होगी। इसमेंं से ज्यादातर बोझ सरकारी बैंकों पर पड़ेगा। इसकी वजह से सरकारी बैंकों के लिए कर पूर्व नुकसान वित्त वर्ष 2018 में 30,000-40,000 करोड़ रुपये पर पहुंच सकता है।
 
वित्त वर्ष 2018 की दूसरी तिमाही में एनपीए में शामिल हुए नए मामले सालाना आधार पर 3.9 फीसदी रहे और यह आरबीआई की तरफ से संपत्ति गुणवत्ता समीक्षा शुरू किए जाने के बाद से अब तक सबसे कम है। यह कवायद वित्त वर्ष 2016 की तीसरी तिमाही में शुरू की गई थी। इसके अलावा तिमाही के दौरान 80 फीसदी नए मामले मानक पुनर्गठित कर्ज से बाहर वाले थे। वित्त वर्ष 2018 की पहली तिमाही में फंसे कर्ज का अनुपात सालाना आधार पर 5.3 फीसदी था जबकि वित्त वर्ष 2017 में यह 5.5 फीसदी था।
 
इक्रा ने कहा कि संपत्ति गुणवत्ता का दर्द अल्पावधि में जारी रह सकता है। सकल गैर-निष्पादित आस्तियां वित्त वर्ष 2018 के आखिर तक 8.8-9 लाख करोड़ रुपये के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच सकती है जबकि 31 मार्च 2017 में समाप्त वर्ष में यह 7.65 लाख करोड़ रुपये यानी 9.5 फीसदी रही थी।
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