बिजनेस स्टैंडर्ड - छतों पर सौर ऊर्जा की योजना को डिस्कॉम का पलीता
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छतों पर सौर ऊर्जा की योजना को डिस्कॉम का पलीता

ज्योति मुकुल /  November 26, 2017

छतों पर सौर ऊर्जा पैदा करने की योजना ने भले ही उन लोगों को आकर्षित किया है जिनके पास जगह की कमी नहीं है। लेकिन केंद्र और राज्यों सरकारों के प्रयासों के बावजूद उन उपभोक्ताओं को कई तरह की चुनौतियां का सामना करना पड़ रहा है जिन्होंने नेट मीटरों के जरिये अपनी इकाई को ग्रिड से जोडऩा चाहते हैं। भारत ने 2022 तक 175 गीगावाट अक्षय ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा है जिसमें से करीब 23 फीसदी छतों पर सौर पैनलों से पैदा की जानी है। सरकार इस तरह की बिजली के आवासीय और संस्थागत उपभोक्ताओं को 30 फीसदी सब्सिडी दे रही है। राज्यवार लक्ष्य भी तय किए गए हैं जबकि भारतीय सौर ऊर्जा निगम (एसईसीआई) ने इस संबंध में कंपनियों को राज्यों की निविदाएं भी जारी की हैं। इन निविदाओं में टैरिफ को बेहद आकर्षक रखा गया है। मसलन उत्तर प्रदेश के लिए 3.6 रुपये प्रति यूनिट और महाराष्टï्र के लिए 3.62 रुपये प्रति यूनिट की दर रखी गई है। 

 
अलबत्ता नेट मीटरिंग की अवधारणा को न तो समझना आसान है और न ही इसे लागू करना। इतना ही नहीं ऐसे मीटर लगाने की अनुमति उसी संस्था से लेनी होती है जिसके कारोबार पर इसके कारण खतरा मंडरा रहा है। जब घर में सौर ऊर्जा पैदा की जाती है तो इस बिजली का इस्तेमाल न केवल घर के लिए किया जाता है बल्कि इसे ग्रिड के जरिये वितरण कंपनियां इसे खरीद भी रही हैं। यही वितरण कंपनियां नेट मीटर लगाने की अनुमति दे रही हैं। 
 
इसलिए नेट मीटर लगाना अपने आप में एक बड़ी चुनौती बन जाता है। क्लीनमैक्स सोलर के संस्थापक और प्रबंध निदेशक कुलदीप जैन कहते हैं, 'कई मामलों में नेट मीटर लगाने के लिए जरूरी मंजूरियां हासिल करने में 9 से 12 महीने का समय लग जाता है। साथ ही वितरण कंपनियों की अस्थायी मांगें होती हैं जिनसे परिचालन की समस्या आती है और परियोजनाओं तथा सेवाओं में देरी होती है।' वारबर्ग द्वारा समर्थित क्लीनमैक्स सोलर देश की सबसे बड़ी ऑन साइट बिजली मुहैया कराती है। कंपनी की बाजार हिस्सेदारी 24 फीसदी है और उसकी 200 परियोजनाओं की संयुक्त ऑन साइट क्षमता 85 मेगावाट से अधिक है। उन्होंने साथ ही कहा कि राज्यों ने नेट मीटरों पर आधा मेगावाट या फिर एक मेगावाट की कृत्रिम क्षमता पाबंदी लगाई है। इस पाबंदी के कारण विश्वविद्यालय और रक्षा प्रतिष्ठïान जैसे बड़े उपभोक्ता अपनी व्यापक जगह का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। 
 
मध्य प्रदेश सरकार में अक्षय ऊर्जा के प्रधान सचिव मनु श्रीवास्तव का कहना है कि कनेक्शन के लिए मंजूर की गई क्षमता को छतों पर स्थापित अक्षय ऊर्जा प्रणाली की क्षमता के लिए सीमा का काम नहीं करना चाहिए। उपभोक्ताओं को अपनी मर्जी और क्षमता के मुताबिक बिजली उत्पादन की अनुमति दी जानी चाहिए क्योंकि वे जो भी बिजली ग्रिड को देंगे उसे वितरण कंपनी की ट्रांसफॉर्मर क्षमता सीमित कर सकती है। 
 
राज्य सरकार ने केंद्र को भेजी अपने सुझाव में कहा है कि उपभोक्ताओं को छतों पर स्थापित सोलर पीवी (फोटोवॉल्टिक) सेल की अनुबंध से अधिक क्षमता को इंटरकनेक्ट करने की अनुमति दी जानी चाहिए, बशर्ते यह प्रणाली उस परिसर से ही जुड़ी हो। श्रीवास्तव ने कहा कि मध्य प्रदेश में इस तरह की कोई पाबंदी नहीं है। मध्य प्रदेश सरकार ने साथ ही केंद्र को यह भी कहा है कि नेट मीटर सिस्टम के लिए पहुंच और संपर्क उपभोक्ता का अधिकार होना चाहिए, बशर्ते कि इसके लिए बाकी शुल्क और फीस दी गई हो।  
 
अलबत्ता जैक्सन ग्रुप के उपाध्यक्ष और प्रबंध निदेशक सुदीप गुप्ता कहते हैं कि छतों पर स्थापित की गई अधिकांश सौर परियोजनाएं 250 किलोवाट से अधिक की नहीं हैं और जो भी क्षमता वापस प्रणाली में आती है वह बहुत कम होती है और निर्धारित सीमाओं के दायरे में होती है। निजी क्षेत्र द्वारा संचालित टाटा पावर दिल्ली डिस्ट्रिब्यूशन ने एक स्कूल का हवाला दिया जो गर्मियों की छुट्टिïयों और सप्ताहांत के दौरान कंपनी के ग्रिड को बिजली फीड करता है। कंपनी ने 2016-17 के दौरान नेट मीटरिंग के तहत 5 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जिसका मूल्य 3.33 करोड़ रुपये बैठता है। कंपनी ने व्यावसायिक कारणों से इस स्कूल के नाम का खुलासा नहीं किया। इस वर्ष कुल मिलाकर कंपनी के इलाके में छतों पर 13 मेगावाट की सोलर पैनल क्षमता स्थापित होगी जिसका मूल्य 13.31 करोड़ रुपये होगी। 
 
टाटा पावर-डीडीएल के मुख्य कार्याधिकारी और प्रबंध निदेशक प्रवीर सिन्हा कहते हैं, 'हमें यह समझने की जरूरत है कि वितरण कंपनियों का कारोबार एक पास थ्रू मैकेनिज्म पर निर्भर है जहां लागत से टैरिफ बनाया जाता है। आज देश में अधिकांश वितरण कंपनियां बिजली की कमी वाले राज्यों में हैं और उन्हें कम बिजली खरीदनी होगी क्योंकि छतों से ज्यादा बिजली पैदा होगी। इतना ही नहीं, उत्पादन का वितरण स्रोत होने के कारण सौर ऊर्जा से वितरण नुकसान को कम करने में मदद मिलेगी। आज देश में वितरण नुकसान ही चिंता की सबसे बड़ी वजह है।'
 
सिन्हा सुझाव देते हैं कि वितरण कंपनियों को अपने इलाके में छतों पर सौर ऊर्जा उत्पादन की संभावनाओं को देखने के बाद ही बिजली उत्पादक कंपनियों के साथ दीर्घकालिक बिजली खरीद समझौते करने चाहिए। सरकार को भी मौजूदा बिजली खरीद समझौतों में संशोधन के लिए प्रयास करना चाहिए ताकि वितरण कंपनियां अपने इलाके में नेट मीटरिंग को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित कर सकें।
 
गुप्ता के मुताबिक यह स्वाभाविक बात है कि सरकारी वितरण कंपनियां नेट मीटरिंग की मंजूरी देने की इच्छुक नहीं हैं और इसमें देरी कर रही हैं क्योंकि यह उनके कारोबार के लिए खतरा है। अलबत्ता श्रीवास्तव ने कहा कि उपभोक्ता के नेट मीटरिंग कनेक्शन के लिए आवेदन करने से लेकर सिस्टम से उत्पादन शुरू होने की प्रक्रिया समयबद्घ होनी चाहिए और डिस्ट्रिब्यूशन ट्रांसफॉर्मरों की क्षमता के बारे में वेबसाइट पर नियमित जानकारी मिलनी चाहिए।
 
जैन कहते हैं कि सुदृढ़ नेट मीटरिंग नीति से निगम और संस्थान इसे तेजी से अपनाएंगे क्योंकि इसमें उनको अपना फायदा नजर आएगा और ऊर्जा दक्ष होने से उनकी परिचालन लागत में भी कमी आएगी। हमारे पास जर्मनी का उदाहरण है जहां पवन ऊर्जा और सौर ऊर्जा उत्पादन को वरीयता दी गई है। हवा वाले और धूप वाले दिनों में बाजार में बिजली की बहुतायत हो जाती है जिससे परमाणु, कोयला और गैस आधारित संयंत्रों से कम उत्पादन किया जाता है। जर्मनी में वितरण कंपनियों का मुनाफा घटने के लिए अक्षय ऊर्जा उत्पादन को ही जिम्मेदार माना जाता है।
 
भारत में 26 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेश पुद्दुचेरी की सरकारी बिजली कंपनियों का कुल घाटा इस साल मार्च तक 40,295 करोड़ रुपये पहुंच चुका था। इन कंपनियों पर नेट मीटरिंग का भी असर पड़ रहा है। बड़े परिसरों वाले सब्सिडीयुक्त सौर ऊर्जा उत्पादकों के कारण छोटे परिसरों वाले घरेलू उपभोक्ताओं के लिए क्रॉस सब्सिडी में कमी हो सकती है और टैरिफ बढ़ सकता है।
Keyword: power, electric, solar,,
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