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बच्चे के बेहतर कल के लिए वक्त पर शुरू करें बचत

तिनेश भसीन /  November 26, 2017

आजकल ऐसे विज्ञापनों की भरमार दिखती है, जिनमें आपसे बच्चों की खातिर निवेश करने, बचत करने और बीमा पॉलिसी खरीदने के लिए कहा जाता है। बच्चों पर केंद्रित निवेश योजनाओं में हमेशा भावनात्मक पहलू जुड़ा होता है और बच्चों की बात हो तो लोग अपना निवेश लंबे समय तक निवेश बरकरार रखते हैं क्योंकि उससे उन्हें बेहतर प्रतिफल हासिल होता है। दूसरी ओर फंड प्रबंधक भी लंबे समय के लिए निवेश करने की बात करते हैं। टाटा ऐसेट मैनेजमेंट के उत्पाद प्रमुख प्रशांत जोशी कहते हैं, 'अगर आप किसी योजना को चाइल्ड फंड का नाम दे देते हैं तो इस बात की अधिक संभावना होती है कि उसे लंबे समय तक चलाया जाए क्योंकि अभिभावक बच्चों के लिए बचाकर रखी गई रकम या निवेश योजना को खर्च करना पसंद नहीं करते। जरूरत पड़ती है तो वे दूसरे स्रोतों से रकम निकालकर काम चला लेते हैं।'

 
लॉक-इन, एक्जिट लोड का रखें ध्यान
 
फंड कंपनियों के पास आम तौर पर चाइल्ड प्लान की दो श्रेणियां होती हैं - मासिक आय योजना (एमआईपी) और बैलेंस्ड फंड। एमआईपी में 15 से 25 फीसदी निवेश इक्विटी में किया जाता है और बाकी रकम डेट में लगाई जाती है। बैलेंस्ड फंड में जो भी चाइल्ड प्लान हैं, उनमें इक्विटी पर जोर दिया जाता है। इसलिए उनमें 65 फीसदी रकम और ये शेयरों में या तो प्रत्यक्ष रूप से या वायदा एवं विकल्प के जरिये 65 फीसदी निवेश करते हैं।
 
बैलेंस्ड फंड उनके लिए अच्छे होते हैं, जो लंबी अवधि (सात साल से अधिक) के लिए निवेश करते हैं कयोंकि ये फंड बाजार की स्थिति के मुताबिक पोर्टफोलियो में खुद ही फेरबदल कर लेते हैं। जब शेयर चढऩे लगते हैं तब वे उधर रकम लगा देते हैं और जब गिरावट आती है तो रकम निकाल लेते हैं। अगर छोटी अवधि के लिए निवेश करना है तो एमआईपी बचत में भी मददगार हो जाते हैं। एमआईपी मुख्य रूप से डेट में ही रकम लगाते हैं और बमुश्किल 15 से 25 फीसदी रकम शेयरों में लगाई जाती है।
 
इनमें से कुछ योजनाओं को भुनाने पर भी कुछ प्रतिबंध लगे होते हैं। आप ऐसी योजना चुन सकते हैं, जो तब तक भुनाई नहीं जा सकती, जब तक बच्चा 18 साल का नहीं हो जाता या योजना में निवेश को 3 साल पूरे नहीं हो जाते।  इनमें से कुछ योजनाओं में रिडम्पशन सीमित होता है। आप ऐसी योजना का चयन कर सकते हैं जिन्हें बच्चे के 18 साल का होने या निवेश के तीन साल पूरे होने से पहले नहीं भुनाया जा सकता हो। बच्चा जब वयस्क हो जाता है तो निवेश को सबसे पहले उसके नाम करना होगा और उसके बाद ही उसे निकाला जा सकेगा। कुछ योजनाएं 1 से 3 प्रतिशत तक एक्जिट लोड रखती हैं ताकि निवेशक वक्त से पहले रकम नहीं निकालें।
 
सुझाव:  लॉक-इन से यह दिक्कत आती है कि फंड का प्रदर्शन अच्छा नहीं होने पर भी निवेश को बदला नहीं जा सकता। दीर्घावधि इक्विटी योजनाओं में निवेश जैसे-जैसे लक्ष्य के नजदीक पहुंचता जाता है, वैसे-वैसे उसे अपनी रकम को इक्विटी से हटाकर डेट फंड में डालना शुरू कर देना चाहिए। लेकिन अगर आप सात साल या उससे कम अवधि के लिए निवेश कर रहे हैं और लॉक-इन का पचड़ा है तो आपके लिए रकम को डेट में डालना मुमकिन नहीं होगा।
 
लचीला मगर महंगा
 
बीमा में निवेश की योजनाएं म्युचुअल फंड के मुकाबले ऊंचे शुल्क वसूलती हैं, जिससे आपको मिलने वाले प्रतिफल में कमी आ जाती है। लेकिन जब चाइल्ड प्लान की बात आती है तो बीमा योजनाओं में काफी लचीलापन दिखता है। पीएनबी मेटलाइफ इंश्योरेंस में उत्पाद प्रबंधन के प्रमुख खालिद अहमद कहते हैं, 'बीमा क्षेत्र में चाइल्ड प्लान उन कमियों की भरपाई करते हैं, जिन्हें दूसरी वित्तीय योजनाएं नहीं कर पातीं। जिस व्यक्ति का बीमा किया गया है, वह अपने परिवार की जरूरतों के हिसाब से उनको भुगतान करने की बात कह सकता है।'
 
अन्य वित्तीय योजनाओं में पॉलिसीधारक की मौत के बाद सारी रकम उसकी पत्नी, कानूनी वारिसों या नॉमिनी को मिलती है। हो सकता है कि जिस व्यक्ति को रकम मिले, वह परिवार की आगे की जरूरतों के हिसाब से रकम को संभल ही नहीं पाए। बीमा क्षेत्र में जिस व्यक्ति के लिए चाइल्ड प्लान लिया जाता है, उसे यह चुनने का विकल्प मिलता है कि रकम कब दी जाए और कितनी किस्तों में दी जाए। पॉलिसीधारक की मौत होने पर परिवार को एकमुश्त रकम मिल जाती है और आगे का पूरा प्रीमियम माफ कर दिया जाता है। पॉलिसीधारक की ओर से खुद बीमा कंपनी यह रकम जमा करती रहती है। भविष्य में बच्चे को पॉलिसी के तहत तय किए गए अंतराल पर रकम मिलती रहती है।
 
चाइल्ड प्लान में दो विकल्प मिलते हैं। पहला विकल्प यूनिट लिंक्ड बीमा पॉलिसी (यूलिप) का है और दूसरा पारंपरिक पॉलिसी का है। यूलिप में जिस व्यक्ति का बीमा किया जाता है, वह तय कर सकता है कि कितनी रकम इक्विटी में डाली जाए और कितनी डेट में। इस तरह वह बाजार से जुड़ा प्रतिफल हासिल कर सकता है। लेकिन पारंपरिक पॉलिसी में अवधि खत्म होने पर गारंटीशुदा प्रतिफल ही मिलता है।
 
सुझाव: अगर आप लचीलेपन की चाहत में चाइल्ड प्लान लेना चाहते हैं तो पारंपरिक योजनाओं से परहेज ही करिए। उनमें पारदर्शिता का अभाव होता है और प्रतिफल भी कम होता है। पॉलिसीबाजार डॉटकॉम में जीवन बीमा के प्रमुख संतोष अग्रवाल कहते हैं, 'कई ऐसी यूलिप योजनाएं भी हैं जिनमें लागत काफी कम है। इनमें योजना संचालित करने का और प्रीमियम आवंटन का शुल्क या तो होता नहीं है या बहुत कम होता है। इस कारण बच्चों के लिए अन्य वित्तीय योजनाओं को ये कड़ी टक्कर देती हैं।'
 
कम प्रतिफल, लेकिन सुरक्षित
 
माता-पिता अपने बच्चों के लिए बैंक सावधि जमा (एफडी) या सार्वजनिक भविष्य निधि (पीपीएफ) जैसे परंपरागत निवेश साधनों पर भी भरोसा कर सकते हैं। बच्चे के नाम पर एफडी पारंपरिक एफडी से बहुत अलग नहीं है। जब तक बच्चा 18 साल का नहीं हो जाता, उसकी एफडी को अभिभावक ही चलाता है। इलाहाबाद बैंक जैसे कुछ बैंक शिशु मंगल जमा योजना जैसी योजनाएं भी चलाते हैं। यह योजना आवर्ती जमा (आरडी) की तरह है और छह साल के लिए शुरू की जाती है। जब बच्चा 21 साल का हो जाता है तो यह अपने-आप रुक जाती है।
 
माता-पिता बच्चे के नाम पीपीएफ खाता भी खोल सकते हैं। लेकिन इस खाते में अधिक से अधिक 1.5 लाख रुपये का निवेश ही किया जा सकता है। अगर बच्चे की ओर से माता-पिता ही खाता चलाते हैं तो उन्हें 1.5 लाख रुपये की इस रकम को अपने और बच्चे के खातों में बांटना पड़ेगा। अगर पीपीएफ के परिपक्व होने के बाद यानी 15 साल बाद भी आपका बच्चा 18 साल का नहीं हो पाया है और आप इस खाते को आगे नहीं चलाना चाहते हैं तो पूरी रकम आपको सौंप दी जाएगी और इस पर किसी तरह का कर भी नहीं वसूला जाएगा। लड़कियों के लिए सुकन्या समृद्घि खाता भी है, जिसे बच्ची के जन्म से लेकर उसकी उम्र 10 वर्ष होने तक किसी भी समय खोला जा सकता है। 
 
माता-पिता को इस खाते में जमा की गई रकम पर धारा 80 सी के तहत कर में छूट भी मिलती है। खाता 21 साल तक चलता रहेगा या तब तक चलता रहेगा, जब तक कन्या का ब्याह नहीं हो जाता। लेकिन ब्याह के लिए उसकी उम्र कम से कम 18 साल होनी चाहिए। जब लड़की 18 साल की हो जाती है तो उसकी शिक्षा के लिए इस खाते में से 50 फीसदी तक रकम निकाली जा सकती है। 
 
सुझाव:  इन योजनाओं में निवेश करते समय यह ध्यान रखें कि ये डेट में आपके कुल आवंटन का ही हिस्सा हों। 
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