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भारतीय सिनेमा की सशक्त पटकथा में पद्मावती प्रकरण

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  November 26, 2017

क्या जाने भी दो यारों (1983), सुजाता (1959), मुगल-ए-आजम (1960) या बॉम्बे (1995) जैसी फिल्म आज के भारत में बन सकती थी? आखिर भारतीय फिल्म उद्योग विरोध से निपटने में इतना बेअसर क्यों साबित होता है? पिछले कुछ हफ्तों की घटनाओं के बाद ऐसे सवाल खड़े होने लाजिमी हैं। वायकॉम18 स्टूडियो की नई फिल्म पद्मावती को लेकर हंगामा बरपा हुआ है। विरोधियों का कहना है कि एक 'काल्पनिक' रानी की कहानी उनकी भावनाओं को आहत कर सकती है। नेता भी फिल्म को देखे बगैर ही इसकी मुखालफत कर रहे हैं। 

 
ब्राह्मïणों के एक संगठन ने राष्ट्रीय पुरस्कार-प्राप्त मराठी फिल्म दशक्रिया पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी लेकिन बंबई उच्च न्यायालय ने उसकी याचिका खारिज कर दी है। ब्राह्मïणों का कहना था कि इस फिल्म में उन्हें गलत तरीके से पेश किया गया है। इसी तरह भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के ठीक पहले एस दुर्गा और न्यूड फिल्मों के प्रदर्शन पर रोक का फरमान सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की तरफ से जारी किया गया। इस आदेश से नाराज तीन ज्यूरी सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया।
 
अत्यधिक रूढि़वादिता के चलते मची आपाधापी से फिल्म स्टूडियो अब परेशान हो चले हैं। फिल्म उद्योग का 14,230 करोड़ रुपये का आकार उसे टेलीविजन उद्योग की तुलना में चौथाई स्थान पर ला खड़ा करता है। फिल्म उद्योग के पास न तो गोलबंदी और न ही दूसरों पर दबाव डालने की ताकत है और उसकी छवि भी काफी 'नरम' रही है। हरेक फिल्म के निर्माण में 200 से लेकर करीब 400 लोगों को सीधे तौर पर रोजगार मिलता है। फिल्मों के प्रदर्शन से हजारों करोड़ रुपये का राजस्व भी मिलता है। हालांकि अर्थव्यवस्था, समाज और लोकतंत्र में फिल्मों के योगदान के बारे में कोई विधिवत अध्ययन नहीं हुआ है। किसी उभरती अर्थव्यवस्था में फिल्मों की सॉफ्ट पावर को हासिल बढ़त पर भी गौर नहीं किया गया है। इसी तरह किसी ने इसका अध्ययन नहीं किया है कि चीन में 3ईडियट्स और दंगल फिल्मों ने वहां की नौकरशाही को किस कदर परेशानी में डाला था। मोशन पिक्चर एसोसिएशन ऑफ अमेरिका या ब्रिटेन की क्रिएटिव इंडस्ट्रीज काउंसिल विदेशों में अपनी फिल्मों के असर के बारे में पर्याप्त जानकारी रखती हैं। ऐसी स्थिति में भारतीय फिल्म उद्योग अचंभित होने के लिए मजबूर है। उसके पास तर्कशील बातें करने वाले चुनिंदा लोगों पर आश्रित रहने के सिवाय कोई विकल्प नहीं रह जाता है।
 
भारतीय फिल्म उद्योग की तारीफ न सिर्फ उसकी चमक-दमक के चलते की जानी चाहिए बल्कि लचीलेपन के लिए भी अहमियत मिलनी चाहिए। सरकारी मदद या संस्थागत फंडिंग न होते हुए भी फिल्म उद्योग हॉलीवुड के वर्चस्व वाले मनोरंजन जगत में पिछले 100 वर्षों से अपनी दमदार मौजूदगी बनाए हुए है। अगर मुखर राष्ट्रवाद मौजूदा दौर की परिपाटी बना है तो भारतीय फिल्म उद्योग ने भी इसमें बेहतरीन भूमिका निभाई है। इसने भारतीय दर्शकों को भारत में बनी फिल्मों से जोड़कर रखने का काम किया है और किसी आयात कोटा, सरकारी संरक्षण या तरजीही उपाय के बगैर ऐसा हुआ है। यही वजह है कि भारत की अपनी जमीन से जुड़ी कहानियां दिखाने की आजादी को बनाए रखना जरूरी है। अगर हम भारतीय फिल्मकारों को उनके पसंदीदा विषय पर फिल्म बनाने की इजाजत नहीं देंगे तो जल्द ही हम पाकिस्तान बन जाएंगे जहां कोई फिल्म उद्योग ही नहीं बचा है। या फिर हमारी हालत चीन जैसी हो जाएगी जो हॉलीवुड की गिरफ्त में आ चुका है। 
 
भारतीय सिनेमा ने हमेशा उन तस्वीरों को पेश करने का काम किया है जिनसे होकर देश गुजर रहा होता है। मसलन 1950 और  1960 के दशक में प्रगतिशील सोच के प्रभाव के चलते हमें कुछ शानदार फिल्में देखने को मिली थीं। यह सोचकर अचरज होता है कि उस समय उन फिल्मों के प्रदर्शन की अनुमति मिल गई थी। विमल रॉय की फिल्म सुजाता (1959) में एक अछूत कन्या की कहानी पेश की गई है जिसकी परवरिश एक ब्राह्मण दंपती करता है। उस समय निचली जाति की एक लड़की के ब्राह्मण युवक से शादी करते हुए दिखाने पर भी भला कोई हंगामा क्यों नहीं हुआ था? इसी तरह यश चोपड़ा की फिल्म धर्मपुत्र (1960) एक ऐसे उन्मादी युवक की कहानी है जो विभाजन के दौरान मुस्लिमों को मारने पर उतारू हो जाता है। लेकिन उसके पिता बताते हैं कि वह असल में उनका दत्तक पुत्र है और एक मुस्लिम परिवार में ही उसका जन्म हुआ था। हालांकि धर्मपुत्र की रिलीज के बाद कुछ नारेबाजी हुई थी लेकिन सुजाता की तरह यह फिल्म भी कई पुरस्कार जीतने में कामयाब रही थी। नव-स्वाधीन देश की सरकार ने भी इन फिल्मों को अपना पूरा समर्थन दिया था।
 
संदेश एकदम साफ था। भारत एक प्रगतिशील देश बनने की राह पर चल रहा था और जाति एवं धर्म जैसे पश्चवर्ती प्रभावों को जन्म देने वाले कारकों को दूर देने के लिए प्रतिबद्ध था। आम तौर पर सभी सरकारें इस अवधारणा का ही पालन करती रही हैं। वर्ष 2003 में आई फिल्म 'पांच' जरूर इसका अपवाद रही जो कभी रिलीज नहीं हो पाई। सामान्य तौर पर अच्छी, बुरी और औसत सभी तरह की फिल्में सिनेमाघरों का मुंह देखने में सफल रहीं। संजय लीला भंसाली की पिछली फिल्म बाजीराव मस्तानी (2015) की तरह पद्मावती भी निरर्थक हो सकती है लेकिन उसे रिलीज होने का अधिकार तो है ही। सेंसर बोर्ड की मंजूरी मिल जाने पर लोगों के पास इसे देखने या न देखने की आजादी होगी।
 
अच्छी-बुरी हर तरह की भारतीय फिल्में भाषाओं, विचारों और विश्वासों की विविधता को पेश करती हैं। नया दौर और मदर इंडिया (1957) से लेकर अनारकली ऑफ आरा (2017), पिंक (2016) या बजरंगी भाईजान (2015) तक हमने हर उस आवाज को पूरी गंभीरता से सुना है जो भारत देश के निर्माण में लगी रही है। चलिए, हम उस राह पर कायम रहें।
 
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