बिजनेस स्टैंडर्ड - तेल कीमतों को लेकर हम कितने चिंतित हों
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तेल कीमतों को लेकर हम कितने चिंतित हों

अभीक बरुआ /  November 26, 2017

भारतीय नीति निर्माताओं को तेल क्षेत्र पर चौकस नजर रखनी चाहिए लेकिन बहुत अधिक भयभीत होने की कोई वजह नहीं है। इस संबंध में विस्तार से बता रहे हैं अभीक बरुआ

 
भले ही क्रेडिट रेटिंग में सुधार हो रहा हो लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजारों ने हाल ही में हम पर जो नई गुगली फेंकी है वह चिंता के लिए पर्याप्त वजह देती है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी देखने को मिली है। देश में तेल की जरूरत का 80 फीसदी आयात करना होता है और साहसी से साहसी नीति निर्माता या अर्थशास्त्री भी यह मानेगा कि जून से तेल कीमतों में आई 40 फीसदी की समेकित वृद्घि हमारी अर्थव्यवस्था को अवश्य प्रभावित करेगी। अगर कच्चे तेल की कीमतों में प्रति बैरल 10 डॉलर तक की बढ़ोतरी होती है तो चालू खाते के मौजूदा स्तर में 4-45 आधार अंकों का इजाफा हो सकता है। मुद्रास्फीति 45 आधार अंक तक ऊपर जा सकती है। इसके अलावा भी असर पड़ सकता है। हमें तेल कीमतों में  गिरावट का काफी लाभ मिला है। वर्ष 2014 से 2016 के बीच हमारी अर्थव्यवस्था को इसका काफी लाभ मिला है। अब हमें उस लाभ के सहारे आगे बढऩा होगा। 
 
ऐसे में यह देखना उपयोगी हो सकता है कि तेल के दामों में तेजी हमें कितना नुकसान पहुंचा सकती है? यह बात दो बातों पर निर्भर करती है। पहला नुकसान का आकलन पहले ही किया जा चुका है और दूसरा अतिरिक्त नुकसान इस बात पर निर्भर करेगा कि तेल किस हद तक ऊपर जाता है? अब जरा दूसरे मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करते हैं। अतिरिक्त नुकसान इस बात पर निर्भर करेगा कि यहां से कीमतें कितनी ऊपर जाकर स्थिर होंगी? क्या हम अगले एक साल तक 100 डॉलर प्रति बैरल की दर पर खरीद करेंगे या 65-70 डॉलर। 
 
तेल के बाजार पर नजर रखने वाली मेरी सहयोगी तन्वी गर्ग कहती हैं कि 65 डॉलर प्रति बैरल की दर मध्यम अवधि की संभावना है। उनकी यह दलील भी है कि तेल बाजार की मांग और आपूर्ति का गणित कहता है कि कीमतें करीब 55 डॉलर के आसपास रह सकती हैं। ऐसे में माना जा सकता है कि अगले छह महीनों तक कच्चे तेल की औसत दर 60 डॉलर प्रति बैरल रहेगी। 
 
तेल कीमतों की सीमा की बात करें तो जून के बाद से इनकी कीमत का रुख एकतरफा तेजी का रहा है। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि तेल निर्यातक देशों के संगठन द्वारा निर्धारित कटौती की मात्रा का अनुपालन बढ़ा है। उदाहरण के लिए जून में वास्तविक कटौती उस कटौती का 80 फीसदी रही जिस पर सहमति बनी थी। अक्टूबर में उत्पादकों ने मिलजुलकर अपनी प्रतिबद्घता से ज्यादा कटौती की। चूंकि ओपेक मूलतौर पर सऊदी अरब के नेतृत्व वाला पश्चिम एशियाई समूह है, ऐसे में इस क्षेत्र में बढ़ते तनाव का असर इस पर देखा जा सकता है। इसके सदस्य देशों की सरकारों पर यह दबाव होगा कि वे अपने नागरिकों को बेहतर स्थिति में रखें। इसमें रोजगार सृजन और बुनियादी विकास से लेकर सामाजिक योजनाओं तक तमाम मानक शामिल हैं। जब उनका राजकोषीय व्यय बढ़ेगा तो उनको भी अतिरिक्त आय की जरूरत होगी जो तेल से आएगी। इन देशों के लिए तेल राजस्व प्राप्ति का बड़ा जरिया है। ऐसे में कीमतों में बढ़ोतरी का अनुमान लगाया जा सकता है। 
 
अच्छी खबर यह है कि राजकोषीय नफा-नुकसान से निरपेक्ष कीमत में पिछले कुछ समय में गिरावट आई है। यहां चकित करने वाली बात है कि यह निरपेक्ष स्तर सबसे ज्यादा सऊदी अरब के लिए घटा है। इससे पता चलता है कि सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था ने अपने उत्पादों में तेजी से विविधता उत्पन्न की है। यानी अब उसकी सरकार तेल पर उतनी निर्भर नहीं है जितनी पहले थी। कुछ विश्लेषकों का दावा है कि सऊदी अरब अपने बजट को तेल की 70 डॉलर प्रति बैरल से कम कीमत पर भी संभाल सकता है। वह ऐसा कह भी रहा है। यह मूल्य तात्कालिक जरूरत है क्योंकि वहां की कंपनी सऊदी अरामको को वर्ष 2018 में प्रस्तुत होने वाले आईपीओ में अच्छा मूल्यांकन चाहिए। 
 
सवाल यह है कि तेल कीमतें कहां जाकर स्थिर होंगी? आम समझ कहती है कि कीमतें 65 डॉलर के आसपास रहेंगी। गैर ओपेक बड़े देश मसलन रूस आदि बड़े पैमाने पर आपूर्ति करना शुरू कर देंगे। ईरान की निरपेक्ष दर 55 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है। ऐसे में सुन्नी देशों के साथ तनाव बढऩा तय है।  बहरहाल, अमेरिका इस बाजार को प्रभावित कर सकता है क्योंकि कुछ मौजूदा विसंगतियां जैसे कि मौसम आदि भविष्य में अमेरिकी आपूर्ति के मार्ग में बाधा नहीं रहेंगी। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) का मानना है कि वर्ष 2018 में पारंपरिक अमेरिकी आपूर्ति और शेल गैस की आपूर्ति दोनों स्थिर रहेंगे। शेल गैस का उत्पादन बीते कुछ सालों के दौरान अनिश्चितता के घेरे में आ गया था लेकिन अब इसमें कोई समस्या नहीं है और आने वाले सालों में इसमें सुधार होगा। इससे जुड़ी तमाम आशंकाएं निर्मूल साबित हुई हैं। डलास फेडरल रिजर्व ने गत मार्च में एक रोचक सर्वेक्षण किया जिसमें उसने मौजूदा शेल उत्पादकों तथा संभावित नए कारोबारियों से पूछा कि उनके लिए इस कारोबार में कौन सी दर नफा-नुकसान से निरपेक्ष रहेगी? मौजूदा कारोबारियों ने कहा कि डब्ल्यूटीआई क्रूड के लिए 38 डॉलर प्रति बैरल (ब्रेंट क्रूड के लिए 41 डॉलर) की दर और नए कारोबारियों ने कहा कि इसके लिए 55 डॉलर प्रति बैरल की दर उचित रहेगी। 
 
इससे यही संकेत मिलता है कि तेल कीमतों में गिरावट आ सकती है। बहरहाल, मांग में भी इजाफा हो रहा है। चीन इसमें अहम भूमिका निभाएगा क्योंकि उसकी मांग बहुत ज्यादा है। माना जा रहा है कि भविष्य की मांग वृद्घि में आधी हिस्सेदारी चीन की रहेगी।  लब्बोलुआब यह कि हमारे लिए तेल कीमतें 55 से 65 डॉलर प्रति बैरल के बीच रह सकती हैं यानी औसतन 60 डॉलर प्रति बैरल। बाजार में तेजी के हिमायतियों को नवीकरणीय ऊर्जा बाजार पर नजर रखनी चाहिए। यहां कुछ बातें ध्यान देने लायक हैं। वर्ष 2016 में बिजली क्षमता बढ़ाने के लिए सोलर फोटोवॉल्टिक तकनीक का प्रयोग इस हद तक हुआ कि वह ताप बिजली को पार कर गया। बीते पांच सालों में सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा की नीलामी कीमतें तेजी से कम हुई हैं। ऐसे में यह भी नहीं कहा जा सकता है कि नवीकरणीय ऊर्जा धीरे-धीरे अपनी हिस्सेदारी बढ़ाएगी।
 
(लेखक एचडीएफसी बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री हैं। लेख में प्रस्तुत विचार उनके निजी हैं।) 
Keyword: oil, gas, price, india,,
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