बिजनेस स्टैंडर्ड - रक्षा आधुनिकीकरण के लिए जोखिम जरूरी
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रक्षा आधुनिकीकरण के लिए जोखिम जरूरी

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  November 24, 2017

बोफोर्स विश्व इतिहास की शायद इकलौती ऐसी तोप होगी जिसके दम पर एक चुनाव जीता गया। इस तोप के पीछे विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसा प्रभावशाली व्यक्तित्व था।  उन्होंने सन 1988 में इलाहाबाद उपचुनाव के साथ राजीव गांधी को खत्म कर देने की चुनौती दी थी। सिंह ने ग्रामीण इलाहाबाद के मैदानी इलाकों में मोटरसाइकिल से घूम-घूम कर प्रचार किया था। वह गांवों में रुकते, बात करते और आगे बढ़ जाते। 

 
उनका संदेश एकदम साफ था। आपके घर में सेंध लगाई गई है। कैसे? जब आप एक पैकेट बीड़ी या माचिस खरीदते हैं तो आप जो पैसे देते हैं उसका कुछ हिस्सा कर के रूप में सरकार के पास जाता है। उसी कर से सरकार अस्पताल और स्कूल चलाती है, सेना के लिए हथियार आदि खरीदती है। ऐसे में अगर कोई आपके पैसे का कुछ हिस्सा चुराता है तो आप इसे अपने घर में सेंधमारी नहीं तो और क्या कहेंगे?
 
यहां तक सबकुछ बहुत बढिय़ा था लेकिन उन्होंने इसमें दो और चीजें जोड़ दीं। पहली, वह कहते कि बोफोर्स के चोरों के नाम मेरे कुर्ते की जेब में हैं और मेरे सत्ता में आने का इंतजार कीजिए।  दूसरा, जवान इस बात को लेकर स्तब्ध हैं कि उनको ऐसी तोप दी गई है उलटा फायर कर शत्रु के बजाय उन्हें मार डालती है। इससे कोई मूर्ख बनता हो या नहीं लेकिन भीड़ का मनोरंजन होता था।
 
उस बात को तीन दशक बीत चुके हैं। बोफोर्स मामले में न तो कोई गिरफ्तारी हुई न किसी को सजा हुई। उस वक्त जितने भी लोगों पर जांच में या किस्से कहावतों में आरोप लगाया गया था वे अब जीवित नहीं हैं। बोफोर्स तोप का प्रदर्शन शानदार रहा है। उसने करगिल में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। आज भी यह हमारी सैन्य क्षमता का अहम हिस्सा है। 
 
तब से 30 साल के वक्त में न तो किसी नई तोप का ऑर्डर किया गया न ही देश में तोप बनाई गई। हालांकि धनुष नामक तोप के कुछ प्रारूप जरूर बने। संक्षेप में कहें तो तब से हमारे पास कोई नई बोफोर्स नहीं आई है। इस मसले में कोई अवैध लेनदेन साबित नहीं हुआ है और न ही कोई जेल गया है।
 
भारत का रक्षा खरीद का रिकॉर्ड गांव के उस मूर्ख की कहानी जैसा है जो प्याज चुराता पकड़ा गया था। पंचायत ने उससे कहा कि 100 जूते खाए या 100 प्याज। मूर्ख ने प्याज का खाने का फैस्ला किया। 10 प्याज खाने के बाद ही वह उकता गया। उसने कहा कि अब वह जूते ही खाना चाहता है लेकिन वह 10 जूते भी नहीं झेल पाया और दोबारा प्याज पर आ गया। सन 1977 के बाद देश की रक्षा खरीद को समझने के लिए यह सबसे अच्छा उदाहरण है। हम उस वर्ष को आधार बना रहे हैं क्योंकि उसी साल देश में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी और तभी सोवियत संघ से हथियार खरीदने की प्रक्रिया से विचलन देखने को मिला था।
 
जनता सरकार ने जो पहली गुंजाइश तलाशी वह थी एंग्लो-फ्रेंच जगुआर। प्रतिद्वंद्वी एजेंटों ने पत्रकारों के बीच खबरें भेजनी शुरू कर दीं और रिश्वत का शोर मचने लगा। जगुआर का मामला भी विवादित हुआ। बाद की सरकारों ने उसे भी रद्दी में डाल दिया और वह कभी पूर्ववर्ती स्तर पर नहीं पहुंच सका। जहां तक उसकी क्षमता की बात है तो 40 वर्ष बाद भी वायुसेना 100 से अधिक जगुआरों की सेवा ले रही है। इसे उड़ता ताबूत जैसे नामों से भी नवाजा गया। 
 
इसके बाद इंदिरा गांधी की वापसी हुई और हमने दोबारा सोवियत संघ का रुख किया। राजीव ने इस व्यवस्था को बदल दिया। इन दिनों यह कहना कोई अच्छी बात नहीं है। मैं लोगों की नाराजगी का जोखिम मोल लेते हुए कहना चाहूंगा कि देश के इतिहास में तीनों सेनाओं के आधुनिकीकरण की दिशा में काम करने वाले इकलौते नेता राजीव गांधी थे। वह रक्षा बजट को जीडीपी के 4 फीसदी के ऊपर ले गए जबकि इससे पहले यह दो फीसदी तक रहता था। उन्होंने फ्रांस से मिराज 2000 खरीदे। नौसेना के लिए ब्रिटेन से हैरियर खरीदे, स्वीडन से बोफोर्स तोप, फ्रांस से मिलान और मात्रा मिसाइल, जर्मनी से टाइप 209 पनडुब्बियां खरीदीं। इन सबके साथ घोटाले उछाले गए। इसलिए ये सभी शुरुआती खरीद स्तर पर ठहर गए। तकनीक का हस्तांतरण, सह उत्पादन आदि कुछ नहीं हो सका। 
 
उन्होंने भी बड़े पैमाने पर सोवियत हथियार खरीदे। इनमें बीएमपी सशस्त्र लड़ाकू वाहन, नई किलो पनडुब्बियां शामिल थीं। एक परमाणु क्षमता संपन्न पनडुब्बी लीज पर ली गई। इसकी कीमत उन्होंने सत्ता गंवाकर चुकाई। इसमें रिश्वत और घोटाले शामिल रहे होंगे लेकिन कटु सत्य यही है कि अगर आज भी हमें जंग में उतरना पड़े तो ज्यादातर वही हथियार काम आएंगे जो राजीव गांधी या उनके बाद नरसिंह राव ने खरीदे। 
 
रक्षा खरीद में भाजपा सरकारों का प्रदर्शन निराशाजनक है। वाजपेयी सरकार ताबूत घोटाले (झूठा) की जद में थी और युद्घ जैसी परिस्थितियां बनने पर ही उसने थोड़ी बहुत ही खरीद की। मोदी सरकार से जरूर उम्मीद थी लेकिन अब तक उसने केवल 36 राफेल विमानों का ऑर्डर दिया है। पिछली सरकार ने 126 विमानों के सौदे की बात की थी। उसके अलावा तो पिछली सरकार के सौदे ही आगे बढ़ रहे हैं। मेक इन इंडिया समेत तमाम बातें हो रही हैं लेकिन काम कुछ नहीं। मजेदार बात है कि हथियार खरीद को लेकर बोफोर्स जैसा डर ही भाजपा को रोके हुए है। 
 
नरेंद्र मोदी के प्रचार अभियान में हथियार खरीद के मोर्चे पर समझौता न करना अहम था। साढ़े तीन साल बाद इस मोर्चे पर उनके हाथ कुछ नहीं है। भय, अनिर्णय और ध्यान की कमी को इस बात से समझा जा सकता है कि मोदी सरकार में अब तक चार रक्षा मंत्री बन चुके हैं। इसके अलावा रेल मंत्रालय में भी चार मंत्री रहे। दोनों की हालत छिपी नहीं है। 
 
राफेल सौदा हुआ लेकिन अब वह भी निशाने पर है। यह मोदी की परीक्षा है। क्या उनमें यह कहने का साहस है कि मैं और मेरी सरकार ने कुछ भी गलत नहीं किया है, और क्या वह इस सौदे को आगे बढ़ाएंगे? गौरतलब है कि राजीव गांधी ने कहा था कि उन्होंने या उनके परिवार ने कुछ गलत नहीं किया है। 
 
इस सौदे के बिना वायुसेना की ताकत बहुत क्षीण हो जाएगी। सुखोई 30 भी अब दो दशक पुराना हो चुका है। अगर मोदी कुछ नहीं कर पाए तो इतिहास उनका आकलन केवल बयानबाजी करने वाले के रूप में करेगा। राफेल को लेकर वही पुरानी बातें दोहराई जाने लगी हैं। इस बहस का एक हिस्सा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण से जुड़ा है। 
 
एचएएल और अन्य सरकारी रक्षा उपकमों ने बीते छह दशक में कई आयातित उपकरण प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के जरिए बनाए लेकिन उनमें शायद ही कुछ काम का साबित हुआ। हम अब भी ऑर्डर करने, रद्द करने, दो बारा ऑर्डर करने की अंतहीन प्रक्रिया में लगे हुए हैं। प्रौद्योगिकी हस्तांतरण दशकों से एक उलझन भर बना हुआ है। क्या मोदी में यह हिम्मत है कि वह सुनिश्चित कर सकें कि भारत वह खरीद सके जिसकी उसे आवश्यकता है। या तो वह राजीव की तरह जोखिम उठाकर रक्षा आधुनिकीकरण का बीड़ा उठाएं या फिर शी चिनफिंग और जनरल कमर बाजवा से चर्चा कर कश्मीर और अरुणाचल का मसला निपटा लें, अमेरिका/नाटो के साथ संधि कर भारत की रक्षा सुनिश्चित करें। ठीक वैसे जैसे जापान ने दूसरे विश्वयुद्घ के बाद किया। वह देश के रक्षा बजट को जीडीपी के एक फीसदी तक सीमित कर सकते हैं। वह भी इसलिए क्योंकि माओवादियों से निपटने के लिए इसकी जरूरत होगी। गणतंत्र दिवस की परेड और सैन्य अड्डïों पर मंत्रियों की तस्वीरें खिंचाने में भी यह काम आएगा।
Keyword: defense, military,,
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