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भारतमाला के लिए जरूरी निजी क्षेत्र की भागीदारी

विनायक चटर्जी /  November 23, 2017

विशाल सड़क परियोजना भारतमाला के साथ कई अन्य मुद्दे जुड़े हुए हैं। इस विषय पर विस्तार से नजर डाल रहे हैं विनायक चटर्जी 

 
गत 24 अक्टूबर को देश के समक्ष एक ऐतिहासिक सड़क निर्माण कार्यक्रम पेश किया गया जिसका नाम है भारतमाला। इस कार्यक्रम के तहत अगले पांच सालों के दौरान 83,677 किलोमीटर सड़कों का निर्माण होना है। इसमें 6.90 लाख करोड़ रुपये का निवेश होगा। इस योजना में आर्थिक महत्त्व की तमाम प्रमुख बातों, सीमा सड़कों, तटवर्ती सड़कों, बंदरगाह संचार और नए एक्सप्रेसवे आदि पर ध्यान दिया जाना है। 
 
यह देखना सुखद है कि देश की सार्वजनिक प्रणाली परियोजना से कार्यक्रम की मंजिल तय कर रही है। जाहिर सी बात है कि इसका शुरुआती लाभ सड़क निर्माण कंपनियों और विनिर्माण उपकरण बनाने वाली कंपनियों को होगा। शेयर बाजार ने पहले ही इन कंपनियों को बेहतरी का संकेत दे रखा है। यह स्पष्टï है कि भारतमाला परियोजना की सफलता काफी हद तक इस बात पर भी निर्भर होगी कि निजी क्षेत्र से कितनी पूंजी जुटाई जा सकती है। निजी क्षेत्र की विनिर्माण कंपनियों की मजबूत और उत्साहपूर्ण भागीदारी भी आवश्यक है। 
 
इसके क्रियान्वयन के लिए अब 46 किमी प्रति दिन की गति से निर्माण कार्य करना होगा जबकि फिलहाल यह गति 25 से 28 किमी प्रति दिन है। यानी इसे सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के 41 किमी प्रति दिन सड़क निर्माण के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य को भी पार करना होगा।  यहां जरूरत है कि हम सरकारी और निजी क्षेत्र के बीच विश्वास और भरोसा पैदा करें। इन दोनों के बीच रिश्ते काफी समय से अस्थिर रहे हैं और हाल ही में भारतीय राष्टï्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) द्वारा कई बड़ी विनिर्माण कंपनियों को भविष्य में निविदा में भागीदारी करने से रोकने की योजना हालात को और कठिन बना सकती है। विनिर्माण क्षेत्र को इस वक्त मदद की आवश्यकता है और बीते समय में अनुबंध प्रबंधन और विवाद निस्तारण प्रक्रियाओं को लेकर कई सुझाव दिए गए हैं। जरूरत यह है कि अब इस क्षेत्र को लेकर नौकर-मालिक जैसी धारणाएं त्यागी जाएं और आपस में परस्पर सम्मान का रिश्ता रखा जाए। 
 
अगर इसे आधिकारिक तौर पर यह स्थिति प्रदान नहीं की जाती है तो भारतमाला को एक किस्म का छोटा प्रोत्साहन मान लिया जाएगा। इस परियोजना के दौरान अगले पांच साल तक हर कार्य दिवस पर 14.2 करोड़ रोजगार तैयार होने की उम्मीद है। इसके अलावा इसके अन्य कारकों की मदद से भी अर्थव्यवस्था पर असर होगा। सवाल यह उठता है कि यह छोटा प्रोत्साहन आखिर कितना बड़ा होगा? 
 
क्रिसिल की एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि भारत अगले पांच साल में बुनियादी विकास पर करीब 50 लाख रुपये खर्च करेगा। अगर 13वीं पंचवर्षीय योजना होती तो माना जा सकता है कि इसमें वर्ष 2017-2022 के लिए 75 लाख करोड़ रुपये का न्यूनतम लक्ष्य होता। यह राशि 12वीं योजना के 56 लाख करोड़ रुपये की राशि से करीब 14 फीसदी ज्यादा होती। हम बीच का रास्ता अपनाते हुए अगले पांच वर्ष के लिए 63 लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य रखते हैं। तब यह 7 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी कुल संभावित बुनियादी व्यय का 11 फीसदी होगी। यह राशि उतनी नाटकीय नहीं प्रतीत होती। यह मानना होगा कि कुल बुनियादी व्यय में सड़क की हिस्सेदारी बढ़ रही है। इसका श्रेय इस मंत्रालय के नेतृत्व का भी दिया जा सकता है।
 
यह आवंटन सड़क और रेल के मिलेजुले मसले भी उठाता है और यह भी कि क्या भारत सड़क निर्माण को रेलवे की कीमत पर बढ़ावा देते हुए अमेरिका की राह पर बढ़ रहा है। सुरेश प्रभु जब रेल मंत्री थे तो उन्होंने पांच वर्ष की वित्तपोषण योजना पेश की थी। इसमें पांच साल के लिए 8.56 लाख करोड़ रुपये या सालाना 1.71 लाख करोड़ रुपये के आवंटन की बात कही गई थी। 
 
भारतमाला योजना में पांच साल के लिए 6.90 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है यानी सालाना 1.38 लाख करोड़ रुपये। इसमें अगर ग्रामीण तथा अन्य सड़कों को शामिल कर दिया जाए जो अब तक शामिल नहीं हैं तो हम और अधिक रोचक निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि भारत अपनी सड़कों और रेल नेटवर्क दोनों पर समान राशि व्यय प्रस्तावित कर रहा है। इससे सड़क और रेल यात्रियों और माल ढुलाई पर क्या असर होगा इसका जवाब अलहदा जांच का विषय होना चाहिए।
 
एक अन्य सवाल यह उत्पन्न होता है कि क्या भारत में इस बात की पर्याप्त संस्थागत क्षमता है कि वह इतने व्यापक कार्यक्रम का क्रियान्वयन कर सके। यह याद रखें कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा घोषित मूल स्वर्णिम चतुर्भुज योजना 15,000 किमी की थी। अच्छी बात यह है कि सड़क क्षेत्र में देश के पास सार्वजनिक संस्थान हैं जो इसे संभाल सकें। इसमें एनएचएआई, राष्टï्रीय राजमार्ग और बुनियादी विकास निगम लिमिटेड, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय तथा अन्य लोक निर्माण विभाग शामिल हैं। यह महत्त्वपूर्ण क्षमता है और निजी क्षेत्र की विनिर्माण कंपनियों का साथ तो है ही। इन कंपनियों के पास वक्त भी है और उन्होंने खुद को साबित करके भी दिखाया है।
 
भारतमाला में 800 किमी एक्सप्रेसवे को शामिल किए जाने पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो अब तक नीति यही रही है कि मौजूदा मार्गों को चरणबद्घ ढंग से विकसित करते हुए नए जमीन अधिग्रहण से बचा जा सके। उत्तर प्रदेश सरकार ने नए लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे को 36 महीनों में पूरा कर दिखाया। इससे केंद्रीय प्रतिष्ठïान सकते में आ गया क्योंकि उसके पारंपरिक तौर तरीकों के चलते पहले ही काफी देरी हो रही थी। 
 
सबसे बड़ी चिंता सुरक्षा की है। देश में हर दिन करीब 407 लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं। ऐसे में सड़क सुरक्षा पर ध्यान दिए बिना इतना बड़ा सड़क निर्माण कार्यक्रम चलाने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। इसके लिए एक स्वतंत्र सड़क सुरक्षा एजेंसी बनाना जरूरी है। साथ ही मौजूदा संहिताओं को प्रासंगिक बनाना, सुरक्षित वाहन चालन सुनिश्चित करना और राजमार्ग सुरक्षा में आधुनिक तकनीक अपनाना जरूरी है।  यहां संक्षेप में दो बातें आवश्यक हैं। सबसे पहले तो नई मेट्रो रेल नीति में उल्लिखित 'बेटरमेंट लेवी' को सड़क क्षेत्र पर भी लागू किया जाना चाहिए। सड़क निर्माण का लाभ केवल अचल संपत्ति कारोबारियों को क्यों मिले?  दूसरा, ऐसे बड़े सार्वजनिक व्यय के मामले में मौजूदा टोल-ऑपरेट-ट्रांसफर कार्यक्रम के साथ परिसंपत्ति पुनर्चक्रण नीति का होना जरूरी है। देश में सड़क विकास का काम अच्छी तरह चल रहा है। 
 
(लेखक फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं। लेख में प्रस्तुत विचार इनके निजी हैं।) 
Keyword: bharat mala project, road, transport,,
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