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जहरीले धुएं और धुंध से बदतर होती हालत मगर छूटती नहीं सियासत

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  November 22, 2017

कनाडा ने नई दिल्ली को अपने राजनयिक कर्मचारियों की तैनाती के लिहाज से कठिन पदस्थापना वाला स्थान घोषित किया है। यहां तैनात होने वाले कर्मचारियों को अलग से भत्ता मिलता है। अन्य पश्चिमी देश भी अपने कर्मचरियों को यहां तैनाती का भत्ता देते हैं क्योंकि दिल्ली में पदस्थापना से उनके स्वास्थ्य को ऐसा नुकसान होता है जिसकी भरपाई संभव नहीं। स्मॉग यानी जहरीली धुंध और धुएं की समस्या राजनीतिक हो चुकी है। 

 
इसकी शुरुआत दो-तीन सप्ताह पहले हुई जब दिल्ली प्रदूषण की चादर में लिपटी नजर आई। किसी को नहीं पता है कि इसकी वास्तविक वजह क्या है। परंतु चर्चा यह रही है कि इसकी वजह हरियाणा और पंजाब हैं जहां खेत में फसल अवशेष जलाए जाने के चलते प्रदूषण उत्पन्न हुआ और राजधानी पहुंचा। इसके अलावा मौसम, विनिर्माण, डीजल से चलने वाले जेनरेटरों से उपजा प्रदूषण और वाहनों से उपजे प्रदूषण आदि ने मिलकर हवा को इतना प्रदूषित कर दिया कि लोगों के गले और आंखों में चुभन और जलन तथा खांसी जैसी समस्या उत्पन्न होने लगी। 
 
हालात ऐसे हो गए कि जब राष्ट्रमंडल देशों के राजनयिक दिल्ली में द्वितीय विश्वयुद्घ में मारे गए जवानों की याद में आयोजित समारोह में पहुंचे तो उन्होंने प्रयास किया कि उनको खांसना न पड़े। यह आयोजन दुनिया भर में हुआ और पेइचिंग में आयोजित समारोह में यही राजनयिक नीले आसमान के नीचे खड़े नजर आए और उनके सर पर सूरज दमक रहा था। अभी एक साल पहले तक पेइचिंग प्रदूषण की समस्या से बहुत भयावह स्तर तक जूझ रहा था। चीन प्रदूषण के खिलाफ जंग जीतने के करीब है जबकि भारत में हालात जस के तस हैं। पहले राष्ट्रीय हरित पंचाट (एनजीटी) ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र यानी एनसीआर में विनिर्माण पर रोक लगाने का आदेश दिया। इसके बाद दिल्ली सरकार ने घोषणा की कि वह ऑड-ईवन (सम-विषम पंजीयन वाले वाहनों को सड़क पर अलग-अलग दिन उतारने की योजना) लागू करने जा रही है। इसके बाद इस योजना को स्थगित कर दिया गया। एनजीटी ने भी विनिर्माण रोकने संबंधी आदेश वापस ले लिया। यूनाइटेड एयरलाइंस ने पहले कहा कि वह न्यूयॉर्क और न्यूजर्सी से नई दिल्ली की उड़ानें खराब हवा के चलते रद्द कर रही है लेकिन बाद में उड़ान बदस्तूर चालू कर दी गईं। स्कूल बंद किए गए लेकिन कुछ दिन बाद दोबारा खोल दिए गए। लोग चेहरों पर मास्क लगाए नजर आए। 
 
हर कोई अपना सर खुजा रहा था कि आखिर यह प्रदूषण आया कहां से। केजरीवाल अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टïर से मुलाकात की याचना करते नजर आए। उन्होंने पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह से भी मुलाकात की गुजारिश की जिन्होंने केजरीवाल को अजीबोगरीब आदमी करार दिया।  केजरीवाल खट्टïर से मिलने चंडीगढ़ गए। उससे पहले खट्टर दिल्ली में थे लेकिन खबरों के मुताबिक केजरीवाल के कार्यालय ने कहा कि उनके पास दिल्ली में मुलाकात करने का वक्त नहीं है। बहरहाल, दोनों नेताओं ने कैमरे के लिए हाथ मिलाया और स्मॉग से निपटने के लिए कुछ बिंदुओं पर सहमति जताई। वहीं अमरिंदर सिंह ने कुछ भी करने से हाथ खड़े कर दिए क्योंकि राज्य का खजाना खाली था। किसानों को अपने खेत साफ करना जरूरी था और अगर सरकार उनको फसल अवशेष जलाने से रोकती तो उसे कोई वैकल्पिक व्यवस्था पेश करनी होती। पंजाब सरकार के पास इसके लिए धन नहीं था। सिंह और केजरीवाल के बीच मुलाकात नहीं हुई। इससे केजरीवाल को यह नैतिक साहस मिला कि वह कह सकें कि वह जीवन मरण के इस प्रश्न पर पंजाब के मुख्यमंत्री के साथ संवाद करना चाहते थे लेकिन उनको सफलता नहीं मिल सकी। कुल मिलाकर यह छवि चमकाने जैसा मामला बन गया। 
 
सेंटर ऑफ साइंस ऐंड एन्वायरनमेंट की महानिदेशक सुनीता नारायण कहती हैं कि दिल्ली में स्मॉग की सबसे बड़ी वजह वाहनों से होने वाला प्रदूषण है। उनका कहना है, 'सच तो यह है कि बीते कुछ समय में दिल्ली के वाहनों की तादाद में विस्फोटक वृद्घि हुई है। इन दिनों दिल्ली में रोज 1,000 नए वाहनों का पंजीयन होता है। सीएनजी के आगमन के पहले की तुलना में यह संख्या दोगुनी है। दिल्ली और उसके आसपास के शहरों के बीच रोज कार से करीब 12 लाख बार आवागमन होता है। यही वजह है कि वाहनों में स्वच्छ ईंधन का प्रयोग होने के बावजूद और ईंधन की गुणवत्ता और वाहन उत्सर्जन के मानक सख्त होने के बावजूद हवा की गुणवत्ता कमजोर बनी हुई है। वाहनों की संख्या में नाटकीय बढ़ोतरी इसके लिए उत्तरदायी है।'
 
दिल्ली की सरकार ने सार्वजनिक परिवहन में सुधार के लिए कुछ नहीं किया। न तो साइकिल ट्रैक सुधारे गए और न ही पैदल चलने वालों का रास्ता ठीक किया गया। बीते कई सालों में एक भी नई बस सार्वजनिक परिवहन के बेड़े में शामिल नहीं की गई। बीते दो साल में दिल्ली सरकार ने एनसीआर में घुसने वाले प्रदूषणकारी ट्रकों से 800 करोड़ रुपये की राशि बतौर कर जमा की है। परंतु प्रदूषण से निपटने में पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क या उपकर महज एक करोड़ रुपये ही व्यय किया गया। सत्ताधारी आम आदमी पार्टी ने कहा है कि वह इस पैसे का इस्तेमाल लो फ्लोर वाली बिजली चालित बसों को खरीदने में करना चाहती थी लेकिन यह योजना लंबित है क्योंकि इसके लिए जरूरी जमीन के मामले में केंद्र का सहयोग नहीं मिल रहा। इन सब बातों का नतीजा यह है कि दिल्ली को शायद आने वाले समय में भी भयंकर प्रदूषण के साथ जीना होगा। वहां वायु प्रदूषण का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा सुरक्षित घोषित किए गए स्तर से 30 गुना तक ज्यादा हो सकता है। 
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