बिजनेस स्टैंडर्ड - कौशल विकास से जुड़ी भारत की तलाश
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कौशल विकास से जुड़ी भारत की तलाश

अजित बालकृष्णन /  November 22, 2017

देश की राजनीति और समाज को मौजूदा स्थिति में एक साथ आगे चलने की आवश्यकता है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजित बालकृष्णन

 
आज से कुछ वर्ष पहले आदर्श नायकत्व के दौर में मैंने अपने पड़ोस के एक स्कूल में कक्षा 8 के बच्चों को बीजगणित पढ़ाने की हामी भरी थी। यह स्कूल कोलाबा (मुंबई) में मेरे घर से चंद कदमों की दूरी पर है। मेरी कक्षा में जो बच्चे थे उनमें बड़ी तादाद करीबी ससून डॉक पर काम करने वाले मछुआरों के बच्चों-बच्चियों की थी। हालांकि मेरी यात्राओं ने मेरे उस आदर्शवादी प्रयास पर अंकुश लगा दिया लेकिन फिर भी मेरे दिलोदिमाग में उन बच्चों की प्रतिभा और सीखने की उनकी ललक की याद अब तक ताजा है। अगर उनमें से कोई मुझ जैसे मध्यवर्गीय परिवार में पैदा हुआ होता तो वे यकीनन आईआईटी और आईआईएम में बढिय़ा प्रदर्शन कर रहे होते। दुख की बात है कि मेरे उन छात्रों में से कई को अपने परिवार के लिए पैसे कमाने की खातिर पढ़ाई छोडऩी पड़ी और वे डिलिवरी ब्वॉय और घरेलू सहायिकाओं के रूप में काम करने लगे। 
 
इसमें कोई नई बात नहीं है। हम सभी यह बात जानते हैं। हम सभी ऐसी परिस्थितियों से दो चार हो चुके होते हैं। इसके बाद हमें अक्सर ऐसी सलाह सुनने को मिलती है कि इस समस्या का असली हल यही है कि एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था पेश की जाए जहां व्यावसायिक प्रशिक्षण भी दिया जाता हो। अगर इन बच्चों को ऐसा कौशल दिया जाए जो इनको बेहतर जीवन जीने में सहायक हो तो फिर उनको तीन साल की कॉलेज डिग्री की जरूरत ही क्या है जबकि उसकी मदद से वे अपनी आजीविका तक नहीं कमा सकते। एक दशक या उससे अधिक समय से देश के अधिकांश राज्य और केंद्र सरकार कौशल विकास कार्यक्रम चला रहे हैं। इनके लिए बाकायदा विभाग बनाए गए हैं और मंत्रियों को जिम्मेदारी सौंपी गई है लेकिन नतीजे में कुछ खास नजर नहीं आता। विभिन्न समितियों की मदद से कौशल आधारित रोजगार तैयार करने की कोशिश की गई। ऐसे रोजगार जो भविष्य में युवाओं के काम आ सकें। इसके लिए अलग पाठ्यक्रम तैयार किया गया। सीमेंस और एलऐंडटी जैसी कई कंपनियों ने तगड़े प्रयास किए लेकिन भारत में जिस पैमाने पर कौशल विकास की आवश्यकता है उसे देखते हुए ये प्रशिक्षण नाकाफी साबित हुए। कई लाख भारतीय बच्चे माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ रहे हैं जबकि इनमें से कुछ हजार ही कौशल विकास कार्यक्रमों का लाभ ले पा रहे हैं। 
 
मैंने इस क्षेत्र में गहन प्रयास कर रहे विचारवान लोगों के साथ मुलाकात कर इस बारे में ज्यादा मालूमात जुटानी चाही। उनमें से एक ने मुझसे ऐसी बात कही जो अब भी मेरे दिमाग में गूंज रही है। उन्होंने कहा, 'जर्मनी जैसे देशों में अपने हाथ से काम करने और उसके सही होने पर तारीफ मिलने का सिलसिला बचपन से शुरू हो जाता है। उदाहरण के लिए किसी टूटी हुई खिड़की को ठीक करना।' वहां बच्चे ऐसे माहौल में बड़े होते हैं जहां ऐसे कौशल की सराहना की जाती है और सफेदपोश मध्यवर्ग के मातापिता भी ऐसे कामों की तारीफ करते हैं। एक ऐसे समाज में जहां व्यावसायिक शिक्षण और कौशल आधारित रोजगारों की अहमियत है, वहां शुरुआत से ही मिलने वाली यह तारीफ मायने रखती है। भारत में कुछ अज्ञात वजहों से सामाजिक आकांक्षाओं का ताल्लुक सरकारी नौकरी से है। ऐसे काम जहां आप अपनी डेस्क पर बैठते हैं और पेन व कागज की मदद से कंप्यूटर के सहारे अपना काम करते हैं। 
 
किसी देश के सामाजिक पहलू को कभी भी उसकी शिक्षा व्यवस्था से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। मुझे इसका पहला अनुभव उस समय हुआ जब मैं पूर्वी भारत में पॉलिटेक्रीक्स की कार्यप्रणाली का अध्ययन करने में तल्लीन था। देश के पॉलिटेक्रीक्स की अक्सर इस बात के लिए आलोचना की जाती है कि वे बढिय़ा कौशल संपन्न स्नातक नहीं दे पा रहे हैं। मुझे इसकी वजह का अंदाजा है। मुझे लगता है कि बच्चों पर माता-पिता का सामाजिक दबाव बहुत ज्यादा होता है। इसलिए जो बच्चे इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिला नहीं ले पाते हैं वे बाद में पॉलिटेक्रीक कॉलेज के कोटा के सहारे इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लेने का प्रयास करते हैं। इसकी वजह से पॉलिटेक्रीक संस्थानों ने अपने पाठ्यक्रम में बदलाव कर दिया ताकि जो पॉलिटेक्रीक छात्र बाद में इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिला ले लेते हैं वे कहीं इंजीनियरिंग कॉलेज के पाठ्यक्रम से पिछड़ न जाएं। जाहिर सी बात है इस पूरी प्रक्रिया में वे बच्चे कहीं पीछे छूट जाते हैं जो पॉलिटेक्रीक में पढ़ाई करते हुए कौशल विकास करना चाहते हैं।
 
नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर कैथलीन थेलेन ने अपनी पुस्तक हाऊ इंस्टीट्यूशंस इवॉल्व- द पॉलिटिकल इकनॉमी ऑफ स्किल्स इन जर्मनी, ब्रिटेन ऐंड यूनाइटेड स्टेट्स ऐंड जापान, में इस बात का उल्लेख किया है कि जर्मनी जैसे समाज में व्यावसायिक शिक्षण का माहौल पहले से मौजूद है और ब्रिटेन में भारत की तरह पहले से व्यावसायिक शिक्षण का कोई माहौल नहीं रहा है लेकिन अब वह जगह बना रहा है। ब्रिटेन में प्रशिक्षण की कमी को अगर अर्थशास्त्रियों की भाषा में समझें तो एक ऐसे देश में जहां कुशल लोगों की कमी है, वहां अगर किसी फर्म में उच्च गुणवत्ता वाला कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम हो तो अन्य लोग अपने कर्मचारियों को उनका मुफ्त लाभ उठाने के लिए प्रेरित करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया के चलते ब्रिटेन एक ऐसे दुष्चक्र का शिकार हो गया जहां अर्थव्यवस्था में कौशल की कमी के चलते विभिन्न फर्म इस बात के लिए प्रोत्साहित हुईं कि वे कम कौशल से बनने वाले उत्पाद खरीदें। वह कहती हैं कि इससे कौशल में निवेश कम हुआ। 
 
वह समाजविज्ञानी गैरी बेकर का हवाला देते हुए कहती हैं कि कौशल दो प्रकार का होता है। विशिष्टï कौशल, जो किसी फर्म के लिए जरूरी होता है और सामान्य कौशल जो विभिन्न कंपनियों और कर्मचारियों के बीच विस्तारित रह सकता है। जब कंपनियां कौशल प्रशिक्षण का काम करती हैं तो उनके पास ऐसी कोई वजह नहीं होती कि वे आम कौशल को प्रोत्साहन दें। वहीं दूसरी ओर विशिष्टï कौशल की बात करें तो वह पूरी तरह अहस्तांतरणीय होता है। यानी उसका एक खास जगह इस्तेमाल संभव होता है। वे उसी कंपनी के लिए मूल्यवान होते हैं। इससे आप यह समझ सकते हैं कि आखिर क्यों कंपनियों के लिए होने वाला कौशल विकास समूची अर्थव्यवस्था में कौशल की कमी की समस्या को दूर नहीं कर पाता। थेलन कहती हैं कि उदार बाजार वाली अर्थव्यवस्थाओं में युवाओं में ऐसे कौशल विकास के लिए खासा प्रोत्साहन होता है जिनका बाजार हो। विशिष्टï कौशल पर यह बात लागू नहीं होती। नई प्रौद्योगिकी के विकास का समाज और सामाजिक ढांचे से संबंध होता है। एक बड़ा घरेलू बाजार और कौशल विकास व्यवस्था की कमी ने ऐतिहासिक रूप से भी और आज भी अमेरिकी कारोबारी जगत को अपने उत्पादों को मानक बनाने और कौशल को प्रतिस्थापित करने वाली तकनीक तलाशने पर मजबूर किया है। 
Keyword: skill india, economy, growth,,
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