बिजनेस स्टैंडर्ड - किसानों को ही न दें दोष, वाहन उद्योग पर भी लगाम जरूरी
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Saturday, December 16, 2017 12:55 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

किसानों को ही न दें दोष, वाहन उद्योग पर भी लगाम जरूरी

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  November 20, 2017

नवंबर 2017 के दूसरे हफ्ते में दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर बेहद गंभीर होने का एक परिचायक यह रहा कि गोवा जैसे मनोरम स्थलों की ओर जाने वाली हवाई उड़ानों की कीमतों में अचानक तीव्र वृद्धि हो गई। फिर यह सुनने को मिला कि यूनाइटेड एयरलाइंस ने वायु प्रदूषण के चलते दिल्ली के लिए अपनी उड़ानें भी रोक दी हैं। इसके पहले इस एयरलाइंस ने दिल्ली पहुंचने वाले अपने यात्रियों को मास्क भी बांटे थे। अमेरिकी विमानन कंपनी का रवैया यह देखते हुए अजीब लगता है कि अमेरिका अपने पेट्रोलियम उद्योग के जहरीले कचरे को वैश्विक बाजार में खपाने में लगा हुआ है और भारत भी धड़ल्ले से उसे खरीद रहा है। यह काफी शर्मनाक है।

 
सच तो यह है कि उत्तर भारत में दिल्ली और उसके आसपास प्रदूषण पिछले पखवाड़े में खतरनाक रूप से काफी अधिक रहा है। पीएम 2.5 का सांद्रता स्तर आपातकालीन श्रेणी में पहुंच चुका था। ऐसी स्थिति हमारी सेहत के लिए काफी नुकसानदायक होती है। इसके कारण बहुत हैं। कुवैत, सऊदी अरब और इराक से आने वाली हवाओं के प्रतिचक्रवातीय प्रभाव और पाकिस्तान, पंजाब एवं हरियाणा में फसलों को जलाए जाने से निकले अवशेष भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। पूर्व दिशा से आने वाली नम हवाएं इन पश्चिमी हवाओं से दिल्ली के आसमान में टकराने लगीं। जमीनी स्तर पर भी हालात स्थिर होने से इस  वायुमंडलीय दबाव को बिखरने का मौका भी नहीं मिल पा रहा था। इसका नतीजा यह हुआ कि दिल्ली और नजदीकी इलाकों में प्रदूषक तत्त्वों से भरे बादल छा गए और हमारा दम घुटने लगा। लेकिन कुछ दिनों बाद हवा चली और संकट भी फौरी तौर पर खत्म हो गया। 
 
प्रदूषण की हालत खराब होते ही मीडिया में तमाम राज्यों के बीच सियासी नाटक खेला जाने लगा। मैं आश्वस्त नहीं हूं कि दिल्ली में इस समय बदतर स्थिति किसकी है- हमारी जान ले रही जहरीली हवा की या हरेक बार धुंध फैलते ही खेला जाने वाला सियासी नाटक? हरेक बार धुंध की स्थिति बनते ही नेताओं में एक-दूसरे पर दोषारोपण करने और लुभावने तरीकों से हालात सुधारने वाली घोषणाओं की भरमार देखने को मिलती है। मानो हर कोई प्रदूषण की अधिकता वाली इस समस्या को पसंद करता है। समस्या यह है कि हम इसका हल ही नहीं निकालना चाहते हैं। समाधान हो जाने से शायद किसी के हितों को चोट पहुंचने लगेगी। हम चाहते हैं कि कुछ किए बगैर ही समस्या खत्म हो जाए। हम जानते हैं कि वाहनों से निकलने वाला धुएं, पेट कोक का इस्तेमाल करने वाले उद्योगों, कचरे को जलाने, सड़कों पर फैली धूल, निर्माण कार्यों और सीमित विकल्प होने की वजह से अपने फसली अवशिष्टों को जलाने वाले किसानों के चलते वायु प्रदूषण की समस्या खड़ी होती है। लेकिन इस पूरे प्रकरण में हम यह भूल जाते हैं कि समाधान के लिए सुझाए गए हरेक तरीके को चुनौती दी जाती है।
 
गाडिय़ों के मामले में ईंधन की गुणवत्ता को सुधारना और उन्हें बीएस-6 मानक पर उन्नत करने से उत्सर्जन कम होगा। हालांकि वाहन निर्माता कहते रहे हैं कि वर्ष 2020 तक इस मानक को लागू कर पाना संभव नहीं होगा। सरकार ने भी वाहन कंपनियों का ही पक्ष लेते हुए समयसीमा को पहले 2028 और फिर 2025 करने की बात कही। कुछ ऐसी ही तकरीरें उस समय भी दी गई थीं जब वाहनों के लिए अप्रैल 2017 से बीएस-4 मानक अनिवार्य किया जाना था। कंपनियां बीएस-4 मानक लागू करने के लिए अधिक समय चाहती थीं क्योंकि उनके पास वाहनों का स्टॉक जमा था। वाहन उद्योग का यह तर्क था कि 'नए वाहन इस समस्या की वजह नहीं हैं। पुराने वाहनों को दुरुस्त कीजिए। इस समस्या में हमारा योगदान तो सिर्फ एक फीसदी है।' 
 
बड़ी समस्या डीजल के चलते पैदा होती है क्योंकि डीजल वाहन पेट्रोल वाहनों की तुलना में अधिक प्रदूषण करते हैं और उनका उत्सर्जन भी कैंसर को जन्म देता है। इसलिए डीजल पर लगाम लगाना जरूरी है। लेकिन ऑटो लॉबी काफी सशक्त है और वाहन कंपनियां भी डीजल एवं पेट्रोल की कीमतों के फासले को देखते हुए मुनाफा कमाने की फिराक में लगी रहती हैं। हम ग्राहक भी तो डीजल से चलने वाली भारी-भरकम एसयूवी गाडिय़ां पसंद करते हैं। हम सभी बराबर के अपराधी हैं। लेकिन जैसे ही ऑटो उद्योग से सवाल पूछो तो वह खुद को वायु प्रदूषण के लिए महज एक फीसदी जिम्मेदार होने का हवाला देने लगता है।
 
हालात सुधारने के लिए हमें दो नीतिगत सुधार करने होंगे। पहला, सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को दुरुस्त करना और दूसरा, पार्किंग शुल्क एवं अन्य करों को इस तरह से बढ़ाया जाए कि लोग गाडिय़ां खरीदने से परहेज करने लगें। लेकिन यह 'पहले अंडा या मुर्गी' वाली दुविधा होगी। हमें कहीं से तो शुरुआत करनी ही होगी। एक उपाय लागू नहीं हो पाने का मतलब है कि दूसरे उपाय पर भी काम नहीं हो पाएगा।
 
फिर ऐसे बिजली संयंत्र भी हैं जो कोयला से चलते हैं और पुराने संयंत्रों से पैदा होने वाली सस्ती बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करने वाली व्यवस्था भी है। लेकिन जैसे ही आप इसे बदलने की मांग करते हैं तो आपको दूर रहने की हिदायत दी जाती है। इसी तरह निजी जरूरतों के लिए जेनरेटरों के इस्तेमाल पर रोक लगाने की बात करने पर भी यही कहा जाता है। ईंधन के सबसे खराब रूप माने जाने वाले पेट कोक का आयात रोकने का सवाल भी उठाया जाना चाहिए। अमेरिका और चीन जैसे देशों ने पेट कोक के इस्तेमाल पर कई तरह की बंदिशें लगाई हुई हैं और वे इसे भारत में डंप कर रहे हैं। इसका इस्तेमाल कर रहे उद्योगों पर निगरानी की व्यवस्था भी खंडित एवं अव्यवस्थित है। 
 
हालांकि पूरी समस्या के लिए पंजाब और हरियाणा के किसानों के किसानों को जिम्मेदार ठहराने के मामले में सभी एकमत हैं। इसका समाधान यह है कि हम किसानों को ऐसे विकल्प मुहैया कराएं कि उन्हें फसलों के अवशिष्ट जलाने की जरूरत ही न पड़े। हमें यह समझना होगा कि केवल टीवी बहसों से ही प्रदूषण के खिलाफ जंग नहीं जीती जा सकती है।
Keyword: delhi, pollution, smog, farmer, vehicle,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या चमड़ा क्षेत्र को प्रोत्साहन मिलने से बढ़ेगा रोजगार?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.