बिजनेस स्टैंडर्ड - वृद्धि दर के अनुमान और जमीनी हकीकत
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वृद्धि दर के अनुमान और जमीनी हकीकत

राहुल खुल्लर /  November 20, 2017

वर्ष 2017-18 की दूसरी तिमाही में वृद्घि के शुरुआती अनुमानों की घोषणा आगामी 30 नवंबर को की जानी है। इस बीच इससे जुड़ी जमीनी हकीकतों पर बात कर रहे हैं राहुल खुल्लर

 
इस समाचार पत्र समेत कई का यह विचार है कि दूसरी तिमाही के साथ वृद्घि दर में सुधार आना शुरू हो जाएगा। माना जा रहा है कि आंकड़े सरकार के लिए खुशखबरी लेकर आएंगे। लेकिन अगर दूसरी तिमाही खुशखबरी लेकर नहीं आई तो? क्या जो कमजोर थे उनका प्रदर्शन बेहतर होगा और जो बेहतर दिख रहे हैं वे लडख़ड़ा जाएंगे? क्या हमें वाकई चंद आंकड़ों पर इस कदर अपेक्षाएं पाल लेनी चाहिए। भला शुरुआती वृद्धि अनुमान को आर्थिक स्थिति की सेहत कैसे और किस हद तक मान लिया जाए?
 
देखना यह भी होगा कि हम वृद्धि के आंकड़ों पर पहुंचते कैसे हैं। असंगठित और गैर कारोबारी क्षेत्र के प्रदर्शन के अनुमान को कब और कैसे शामिल किया जाता है? अब शुरुआती अनुमानों की बात करें तो जिन गैर कारोबारी क्षेत्रों के हिस्सों को ठीकठाक ढंग से शामिल किया गया है वे हैं: कृषि, विनिर्माण और खुदरा कारोबार। शेष क्षेत्रों की बात करें तो उनके अनुमान कॉर्पोरेट डाटा के बाहरी विस्तार में समाहित हैं। कुछ विनिर्माण क्षेत्रों के आंकड़े 18 महीने बाद सामने आते हैं। कुछ अन्य क्षेत्रों में हमें गैर कॉर्पोरेट क्षेत्र के एनएसएस सर्वे की प्रतीक्षा करनी होती है। (यह सूचना देने के लिए मैं अपने 48 वर्ष पुराने मित्र प्रणव सेन का आभारी हूं)।
 
इसके दो निहितार्थ हैं। पहला, शुरुआती अनुमान में हमेशा संशोधन की गुंजाइश रहती है। यानी वृद्धि के आंकड़ों में ऊपर या नीचे की ओर संशोधन हो सकता है। यानी हमें सच्चाई बहुत बाद में पता चलेगी। दूसरा कॉर्पोरेट आंकड़ों का बाहरी विस्तार उचित है जब तक कि इसका परस्पर संबंध सकारात्मक हो। परंतु अगर यह नकारात्मक हुआ तो? अगर यह ज्ञात हो कि गैर कॉर्पोरेट और असंगठित क्षेत्र का प्रदर्शन कॉर्पोरेट क्षेत्र की तुलना में खराब है तो कॉर्पोरेट क्षेत्र के आंकड़ों का किसी भी तरह का बाह्य विस्तार वृद्धि अनुमानों को बढ़ेचढ़े रूप में पेश करता है।
 
नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के दोहरे झटके ने असंगठित क्षेत्र तथा सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यमों (एमएसएमई) पर बहुत बुरा असर डाला। कॉर्पोरेट क्षेत्र पर उतना बुरा असर नहीं हुआ। जाहिर है उसकी स्थिति को मानक नहीं माना जा सकता। असंगठित क्षेत्र और गैर कारोबारी क्षेत्र के वृद्धि के ऐसे अनुमान सही तस्वीर नहीं पेश करते। ऐसे में फिलहाल आंकड़े चाहे जो कहानी कह रहे हों, लेकिन उनके आधार पर अभी किसी किस्म का शोरगुल करना सार्थक नहीं प्रतीत हो रहा है। क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हम वृद्धि के आंकड़ों को लेकर छिड़ी किसी बहस से बाहर निकलें? जैसा कि मनमोहन सिंह ने हाल ही में कहा, 'किसी भी लोकतंत्र के इतिहास में ऐसा वक्त आता है जब अर्थव्यवस्था को राजनीति पर तरजीह देनी पड़ती है। भारत में फिलहाल ऐसा ही वक्त है। हमें देश को हर किस्म की राजनीति से ऊपर रखना चाहिए।'
 
चूंकि कुछ भी करने की कार्यकारी शक्तियां सरकार में निहित हैं इसलिए सबसे बड़ा उत्तरदायित्व भी सरकार का ही बनता है। विपक्ष पर ऐसा कोई दायित्व नहीं है। किसी को सरकार से यह अपेक्षा नहीं है कि वह सार्वजनिक रूप से नीतिगत गलतियों को स्वीकार करेगी। वह इससे इनकार को कम अवश्य कर सकती है। हमारे देश में समस्या को हल करने की जवाबदेही पूरी तरह सरकार पर है।
 
कुछ सुझाव इस प्रकार हैं। पहली बात, एमएसएमई क्षेत्र में 1 दिसंबर, 2017 से 31 मार्च, 2019 के बीच हुए तमाम निवेश पर 3 फीसदी का ब्याज अनुदान। इसकी पात्रता इस बात पर निर्भर होगी कि कम से कम 50 फीसदी ऋण इसके समाप्त होने की तिथि से पहले लिया गया हो। अगर इससे एक लाख करोड़ रुपये का ऋण भी लिया जाता है तो अगले 5-7 साल के दौरान इसकी वित्तीय लागत 20,000 करोड़ रुपये के आसपास होगी। इस निवेश चक्र की शुरुआत उन लोगों से हो जिनको सबसे अधिक कष्ट हुआ है। अच्छा अर्थशास्त्र, अच्छी राजनीति भी है।
 
दूसरा, विशेष आर्थिक क्षेत्रों (एसईजेड) में लगने वाले न्यूनतम वैकल्पिक कर (मैट) को शून्य कर दिया जाए। अगर ऐसा करना संभव नहीं है तो घरेलू टैरिफ क्षेत्र में इसे घटाकर 25 फीसदी कर दिया जाए। इससे एसईजेड विकसित करने वाले बुनियादी क्षेत्र में निवेश बढ़ाएंगे। इससे निर्यात और उत्पादन क्षेत्र की एसईजेड इकाइयों द्वारा नया निवेश किया जाएगा। एक वर्ष के भीतर यह निर्यात को गति प्रदान करेगा। कर अधिकारी अनुमानित राजस्व हानि के चलते इस कदम का विरोध कर सकते हैं। अगर गतिविधियों में अपेक्षित तेजी नहीं आई तो भी राजस्व हानि नाममात्र की होगी। वित्त मंत्री अरुण जेटली से अनुरोध है कि वे कर अधिकारियों की बात पर ध्यान न दें। खासतौर पर कारोबारी अखबारों के संपादकीयों पर तो कतई ध्यान न दें जो इसे पुरातनपंथी उपाय बताएंगे।
 
तीसरा, हमें व्यापक ग्रामीण मांग को बढ़ावा देना होगा। बीते कुछ वर्षों में व्यापार की शर्तें कृषि के विरुद्ध हो गई हैं। ग्रामीण सड़कों पर खर्च तत्काल बढ़ाया जाना चाहिए, ग्रामीण क्षेत्र के बुनियादी ढांचे का विकास किया जाना चाहिए और वहां आवास सुविधाएं बढ़ानी चाहिए। मौजूदा आवंटन को दोगुना करने में महज 20,000 करोड़ रुपये लगेंगे।
 
चौथा, राजमार्ग कार्यक्रम की घोषणा काबिलेतारीफ है लेकिन उसका विस्तृत ब्योरा देखना होगा। उसके ब्योरे में कई जगह विश्वसनीयता का संकट है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने विनिर्माण के लिए 5-6 लाख करोड़ रुपये देने की बात कही है। हकीकत में यह वह राशि है जो सरकार हर साल राजकोषीय घाटे की पूर्ति के लिए उधार लेती है। अब से 31 मार्च, 2019 तक बनाई जाने वाली सड़कों की सूची देखें तो उनमें से कुछ जरूर टोल मार्ग होने चाहिए। अगर राजमार्ग निर्माण की फंडिंग को बजट अनुदान से बाहर ले जाना है तो ऐसा करना ही होगा। आखिर में बॉन्ड की एक किस्त की घोषणा।
 
आखिर में ब्याज दर की बात करें तो वह सरकारी नियंत्रण के बाहर है। अधिकांश गैर सरकारी अर्थशास्त्री मानते हैं कि उसे कम करने की आवश्यकता है। फिलहाल जरूरत यह है कि ब्याज दर में दो छोटे चरणों में 100 आधार अंकों की कमी की जाए।
 
वर्ष 2017-18 की दूसरी तिमाही में वृद्धि के आरंभिक अनुमानों की घोषणा 30 नवंबर को की जाएगी। क्या हमें दम साधे आंकड़ों की प्रतीक्षा करनी चाहिए और एक और राजनीतिक गुणा-गणित का एक और दौर शुरू कर देना चाहिए? या फिर हमें समस्या के बारे में बात करने के बजाय उसे हल करने के लिए प्रयास शुरू कर देना चाहिए? यह चयन हमें ही करना है। 
 
(लेखक भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण के पूर्व चेयरमैन हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं)
Keyword: india, economy, growth,,
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