बिजनेस स्टैंडर्ड - दवा क्षेत्र की वृद्धि दूसरी छमाही से पकड़ेगी रफ्तार
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दवा क्षेत्र की वृद्धि दूसरी छमाही से पकड़ेगी रफ्तार

राम प्रसाद साहू /  November 19, 2017

अमेरिकी बाजार में कीमत दबाव धीरे-धीरे कम होने के अनुमान गलत साबित हुए हैं क्योंकि भारतीय दवा कंपनियों ने एक और तिमाही में कमजोर वृद्धि दर्शाई है। अमेरिकी बाजार में भारत की अग्रणी जेनेरिक दवा कंपनियों की दवाओं के दाम पिछले साल की तुलना में 11 से 12 फीसदी कम हुए हैं, जिससे उनका राजस्व चालू वित्त वर्ष की सितंबर तिमाही में पिछले साल की इसी तिमाही के मुकाबले 20 फीसदी से अधिक घटा है। 

 
हालांकि ब्रोकिंग कंपनियों ने पहले ही कीमतों पर कुछ दबाव रहने का अनुमान जताया था, लेकिन कंपनियों के नतीजे दर्शाते हैं कि यह दबाव जून तिमाही जितना ही ज्यादा रहा। कैडिला हेल्थकेयर और अरबिंदो को छोड़कर ज्यादातर भारतीय दवा कंपनियों का राजस्व अमेरिकी बाजार में 7 फीसदी से लेकर 46 फीसदी तक कम हुआ है।  भारतीय दवा कंपनियों की आमदनी में अमेरिकी बाजार की हिस्सेदारी 30 फीसदी से अधिक है। कंपनियों की अमेरिकी बाजार में आमदनी घटने की मुख्य वजह यह है कि वर्तमान जेनेरिक दवाओं और विशेष बिक्री अवधि के तहत दवाओं को तेजी से मंजूरी दी गई है। उदाहरण के लिए अमेरिका में ल्यूपिन की बिक्री पिछले एक साल के दौरान 32 फीसदी कम हो गई है। इसकी वजह यह है कि कंपनी का मिनास्ट्रीन (एक गर्भनिरोधक) की बिक्री पर विशेषाधिकार खत्म हो गया है और ग्लूमेट्जा और फॉरटामेट जैसी मधुमेह की दवाओं की कीमत पर दबाव बढ़ा है। 
 
इसी तरह सन फार्मास्युटिकल इंडस्ट्रीज का अमेरिकी राजस्व 44 फीसदी गिरा है। इसकी वजह कंपनी के मुख्य कारोबार (त्वचा उत्पाद) पर कीमत का दबाव, कुछ उत्पादों की बिक्री की शुरुआत दिसंबर तिमाही के लिए टालना और कैंसर की जेनेरिक दवा ग्लिवेक से घटती आय है। पिछले साल की इस तिमाही में कंपनी के पास इस दवा की बिक्री का विशेष अधिकार था। 
 
प्रतिस्पर्धा बढऩे के अलावा अमेरिकी राजस्व में कमी की एक अन्य वजह नियामकीय अड़चनों की वजह से दवाओं को मंजूरी नहीं मिलना भी है। विश्लेषकों का मानना है कि सन फार्मा के हलोल और डॉ. रेड्डीज के श्रीकाकुलम (विशाखापत्तनम) संयंत्रों को मंजूरी इसलिए नहीं मिली है क्योंकि ये इकाइयां अमेरिकी नियमनों पर खरी नहीं उतरती हैं। अमेरिकी बाजार में नई जेनेरिक दवाओं की शुरुआत और वितरण शृंखलाओं के एकीकरण की वजह से दवा कीमतों में गिरावट आ रही है, लेकिन ज्यादातर कंपनियों के लिए न बिक्री बढ़ाना और न ही नए उत्पाद शुरू करना संभव हो पा रहा है। केवल अरबिंदो फार्मा और कैडिला हेल्थकेयर ने लीक से हटकर प्रदर्शन किया है। अरबिंदो ने अपनी कुल बिक्री में 17 फीसदी और कैडिला ने 37 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की है। इसकी वजह यह है कि उनके उत्पादों में सीमित प्रतिस्पर्धा है। 
 
ज्यादातर कंपनियां वर्ष 2017-18 की वृद्धि को लेकर सतर्क हैं। सन फार्मा ने कहा है कि उसका मानना है कि वित्त वर्ष 2018 में समेकित राजस्व एक अंक में घटेगा। विश्लेषकों का मानना है कि इसकी मुख्य वजह कंपनी का अमेरिका में निराशाजनक प्रदर्शन है। आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज के विश्लेषकों का अनुमान है कि अमेरिका में कंपनी की बिक्री 24.7 फीसदी घटेगी। कारण कि कंपनी के उत्पादों को मंजूरी मिलने में देरी हो रही है और कीमतों पर लगातार दबाव बना हुआ है। कंपनी के प्रबंधन ने लाभ के बारे में संकेत दिया है कि यह 20 से 22 फीसदी रहेगा, जो रैनबैक्सी के विलय के बाद दर्ज किए गए 30 फीसदी मार्जिन से कम है। 
 
कीमतों पर दबाव के अलावा विशेष दवाइयां  विकसित करने पर ज्यादा खर्च से भी मार्जिन प्रभावित हो रहा है। जहां ल्युपिन और डॉ. रेड्डीज के मार्जिन में सालाना आधार पर 100 से 240 आधार अंक की गिरावट आई, वहीं सन फार्मा ने मार्जिन में भारी गिरावट दर्ज की है। सन फार्मा का मार्जिन 17 फीसदी घटा है। दूसरी ओर कैडिला ने परिचालन लाभ मार्जिन में 457 फीसदी की उछाल दर्ज की है। नई कंपनियों से मिल रही कड़ी टक्कर, वितरण शृंखलाओं के एकीकरण और उत्पादों को मंजूरी मिलने में देरी को देखते हुए विश्लेषकों का अनुमान है कि अमेरिकी बाजार में अन्य कंपनियों के मुनाफे पर भी 7-8 फीसदी से अधिक दबाव रहेगा। 
 
फार्मा सेक्टर के लिए सकारात्मक बात इस क्षेत्र के प्रबंधकों का यह अनुमान है कि वित्त वर्ष 2018 की दूसरी छमाही पहली छमाही की तुलना में बेहतर रहेगी। इसकी वजह यह है कि भारतीय दवा कंपनियों के लिए जून तिमाही पिछले कुछ वर्षों में सबसे कमजोर रही है। वहीं अमेरिकी बाजार भी कमजोर है। इसके अलावा भारत में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का असर पड़ रहा है और उनके सामने कुछ अन्य बाजारों में करेंसी से संबंधित दिक्कते हैं। इन वजहों से लगभग सभी कंपनियों की आमदनी और मार्जिन पर असर पड़ा है। कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के विश्लेषकों का मानना है कि वित्त वर्ष 2019 की दूसरी छमाही में दवा कंपनियों की नए पेशकश बढ़ेंगी, जिससे उनका अमेरिका में जेनेरिक राजस्व बढ़ेगा और कुल राजस्व एवं लाभ में भी इजाफा होगा। 
 
ऐसा लगता है कि दवा कंपनियों की भारत में वृद्धि क्रमिक आधार पर बढ़ी है। बड़ी दवा कंपनियों के लिए भारत राजस्व के हिसाब से दूसरा सबसे अहम बाजार है। कंपनियों ने जून तिमाही के दौरान बिक्री में 2 से 10 फीसदी गिरावट दर्ज करने के बाद सितंबर तिमाही में घरेलू बिक्री में दो अंकों में बढ़ोतरी दर्ज की है। सिप्ला, ल्यूपिन और सन फार्मा ने सालाना आधार पर वृद्धि में 11 से 16 फीसदी वृद्धि दर्ज की है। इसकी एक वजह यह है कि जीएसटी से पहले आपूर्ति शृंखला खाली हो गई थी, जिसे फिर से भरा गया है। इससे दवा कंपनियों को अमेरिकी बाजार का अपना कुछ दर्द कम करने में मदद मिली है।
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