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अधिकरणों की सीमित भूमिका से बढ़ेगी उच्च न्यायालयों की ताकत

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  November 19, 2017

पिछले कुछ दशकों में न्याय मिलने में होने वाले विलंब और लंबित मामलों की बढ़ती संख्या ने न्यायाधिकरणों की अवधारणा को काफी मजबूती दी है। विभिन्न विधि आयोगों की रिपोर्ट में इस मसले का जिक्र आता रहा है। इस बीच न्यायाधिकरणों की संख्या बढ़ती रही और 30 के भी पार जा पहुंची। हालांकि सरकार ने हाल ही में इनमें से आठ न्यायाधिकरणों का वजूद समाप्त कर दिया है। प्रतिस्पद्र्धा अपीलीय न्यायाधिकरण के राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण में विलय, साइबर अपीलीय न्यायाधिकरण के दूरसंचार विवाद निपटान अधिकरण और कॉपीराइट बोर्ड के बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड में विलय जैसे कदमों से ऐसा हो पाया है। सरकार कुछ अन्य अधिकरणों के विलय की दिशा में भी काम कर रही है ताकि कुल न्यायाधिकरणों की संख्या को घटाकर 18 पर लाया जा सके।

 
इन कदमों के बावजूद विधि आयोग की पिछले महीने आई 272वीं रिपोर्ट में न्यायाधिकरणों के कामकाज को लेकर असंतोष जताया गया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक 'कुछ न्यायाधिकरणों के कामकाज से संबंधित आंकड़े संतोषजनक तस्वीर नहीं पेश करते हैं। हालांकि हर साल सुनवाई के लिए आने वाले मामलों की तुलना में उनके निपटारे की दर 94 फीसदी के साथ काफी अच्छी है लेकिन इसके बाद भी लंबित मामलों की संख्या अधिक है।' शीर्ष पांच न्यायाधिकरणों पर करीब 3.5 लाख मामलों का बोझ है। आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण के पास 91,538 मामले लंबित हैं जबकि सीमा शुल्क एवं सेवा कर अपीलीय अधिकरण के समक्ष 90,592 और ऋण वसूली न्यायाधिकरण के समक्ष 78,118 मामले लंबित हैं।
 
पर्याप्त ढांचागत आधार न होने और असंतोषजनक सेवा शर्तों के अलावा वकीलों एवं संबद्ध पक्षों की तरफ से विलंबकारी तरीके अपनाने जैसी समस्याओं का सामना इन न्यायाधिकरणों को करना पड़ता है। उच्चतम न्यायालय के समक्ष दायर कुछ याचिकाओं में इस पहलू की तरफ ध्यान आकर्षित कराया गया है। आयोग ने बेहद अहम मसलों पर ध्यान दिया है और कुछ बुनियादी सवाल भी उठाए हैं। अधिकांश अपीलीय अधिकरणों का गठन उच्च न्यायालयों के समकक्ष स्तर पर किया गया है लिहाजा कार्यपालिका के प्रभाव से उनकी आजादी को सुरक्षित रखा जाना निहायत जरूरी है। यह एक संवैधानिक जरूरत है। विधि आयोग का कहना है कि इन अधिकरणों का ढांचा तैयार करने वाले अधिकांश कानून संबद्ध उच्च न्यायालयों से उनका अधिकार क्षेत्र ले लेते हैं और उसे अधिकरणों के सुपुर्द कर देते हैं। हालांकि इन अधिकरणों में नियुक्ति के तरीके, योग्यता निर्धारण और कार्यकाल उच्चतम न्यायालय के विभिन्न फैसलों में निहित मानदंडों के अनुकूल नहीं होते हैं। इससे भी बढ़कर इन अधिकरणों का गठन करने वाले विधानों में इनकी स्वतंत्रता अक्षुण्ण रखने का कोई प्रावधान नहीं है। आयोग कहता है कि इसके उलट कार्यपालिका के पास इन अधिकरणों का प्रशासकीय नियंत्रण होने से अधिकरण काफी हद तक उस कार्यपालिका के ही अधीन हो जाते हैं जिनके मामले उसके पास निपटारे के लिए आते हैं। इससे इस संदेह को बल मिलता है कि न्यायाधिकरणों के सैकड़ों रिक्त पदों पर सेवानिवृत्त लोकसेवकों को तैनात करने का इंतजार किया जा रहा है। 
 
न्यायाधिकरणों में लंबे समय से रिक्त पदों पर भर्ती नहीं होना इनकी कार्यक्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम का ही उदाहरण लें तो इसमें जिला स्तर पर भी तीन सदस्यों का पीठ बनाने का प्रावधान रखा गया है। लेकिन एक भी ऐसा उपभोक्ता फोरम मिल पाना कठिन है जिसमें यह कोरम पूरा होता हो। दूसरे अधिकरण भी कम सदस्यों से ही काम चला रहे हैं। आयोग का सुझाव है कि किसी भी अधिकरण में किसी पद के रिक्त होने की तारीख के छह महीने पहले ही उस पर नियुक्ति की कार्रवाई शुरू कर दी जानी चाहिए। लेकिन किसी भी न्यायाधिकरण में इस सुझाव का पालन नहीं किया गया है। इसका नतीजा यह होता है कि अक्सर जनहित याचिकाएं दायर कर रिक्त पदों पर जल्द नियुक्ति की गुहार लगानी पड़ती है।
 
अपीलीय अधिकरणों के मामले में तो हालत और भी अधिक खराब है। आम तौर पर अपीलीय अधिकरणों में एक ही पद होता है और वह भी नई दिल्ली में होता है। आयोग का सुझाव है कि इन अपीलीय अधिकरणों की शाखाएं देश के अलग-अलग हिस्सों में गठित की जाएं। लेकिन जब सरकार मौजूदा समय में एक ही जगह नहीं भर पा रही है और उसके लिए जरूरी ढांचा मुहैया नहीं करा पा रही है तो फिर इन अधिकरणों की कई शाखाएं गठित करने के बारे में सोच पाना भी मुश्किल है। हालांकि कर अधिकरण जैसे कुछ न्यायाधिकरणों की कई शाखाएं हैं लेकिन लोकसेवकों के न्यायिक भूमिका में आने की छिपी हुई चाहत के चलते ऐसा हुआ है।
 
न्यायाधिकरणों के गठन का रास्ता खोलने वाले संवैधानिक प्रावधानों को कुछ लोग 1975 में लगे आपातकाल के दौरान उच्च न्यायालयों की भूमिका को कमतर करने की कोशिश के तौर पर देखते हैं। अगर ऐसा नहीं है तो वर्तमान सरकार ने न्यायाधिकरणों की संख्या को कम करने की जो पहल की है उसकी तारीफ की जानी चाहिए। न्यायाधिकरणों के जरिये न्याय मुहैया कराने की सोच के फायदों को लेकर न्यायविदों में अक्सर मतभेद रहे हैं। लेकिन इन अधिकरणों की संख्या कम करने के पहले उच्च न्यायालयों को सशक्त करने के प्रयास तत्काल किए जाने चाहिए। फिलहाल देश के 24 उच्च न्यायालयों में 400 पद रिक्त हैं और यह निंदनीय अक्षमता चिरस्थायी हो चुकी है। 
 
उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम के संदर्भ में यह समस्या और भी अधिक गंभीर नजर आने लगती है और सरकार शीर्ष न्यायपालिका में नियुक्ति की प्रक्रिया पर वर्चस्व को लेकर सरकार न्यायपालिका से भिड़ गई। यह संकट ऐसे समय आया है जब उच्च न्यायालयों की समेकित संवैधानिक भूमिका पुनस्र्थापित की जानी चाहिए जबकि विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत अधिकरणों की प्रक्रियागत एवं निर्णयकारी शक्तियों में कटौती होनी चाहिए।
Keyword: supreme court, high court,,
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