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सुधरता माहौल

संपादकीय /  November 19, 2017

अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भारत की संप्रभु बॉन्ड रेटिंग को बीएए3 से सुधार कर बीएए2 कर दिया है। यह निस्संदेह देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी खबर है। सैद्घांतिक तौर पर देखा जाए तो इस सुधार का अर्थ यह हुआ कि न केवल संप्रभु बल्कि सरकारी क्षेत्र की कंपनियों और निजी क्षेत्र की कंपनियों के लिए भी विदेशी फंड जुटाना आसान होगा। देश की संप्रभु रेटिंग में सुधार के साथ एजेंसी ने कहा है कि ऐसा उन सुधारों के कारण किया गया जिन्हें सरकार ने अब तक अंजाम दिया है। उसका कहना है कि इन सुधारों से देश में कारोबारी माहौल सुधरेगा और मजबूत और स्थायी विकास की परिस्थितियां निर्मित होंगी। सरकार लंबे समय तक यह दलील देती रही है कि राजकोषीय समावेशन की उसकी प्रतिबद्घता और देश के स्थिर वृहद आर्थिक विकास संकेतकों को देखते हुए रेटिंग में सुधार आवश्यक हो चला है। कई पर्यवेक्षक कह रहे थे कि भारत, विकास की गति गंवा रहा है। ऐसे में यह भरोसा बहाली का एक मजबूत संकेत है। सरकार को विभिन्न नीतिगत बदलावों का श्रेय मिलना चाहिए जिनके चलते रेटिंग में यह सुधार संभव हो सका। 

 
यह खबर स्पष्ट रूप से सकारात्मक है लेकिन अभी इसका उत्सव मनाना ठीक नहीं होगा। मूडीज ने खुद मौजूदा रेटिंग और भारत की मौजूदा वृद्घि दर से जुड़े खतरों की ओर भी संकेत किया है। उसने दो बातों का जिक्र किया है। पहला बैंकिंग व्यवस्था की सेहत और दूसरा बाह्यï खाते की संवेदनशीलता। माना जा रहा है कि बैंकिग व्यवस्था सुधार की ओर है। अब कई गड़बड़ खातों को नई दिवालिया प्रक्रिया के हवाले कर दिया गया है और बैंकों ने फंसी हुई परिसंपत्तियों को लेकर अपनी बैलेंस शीट में उपयुक्त समायोजन कर दिया है। सरकार ने संकटग्रस्त सरकारी बैंकों के लिए पुनर्पूंजीकरण योजना भी घोषित कर दी है। बहरहाल, अगर यह प्रक्रिया बताए मुताबिक नहीं चली तो ऋण वृद्घि और वित्तीय स्थिरता के मोर्चे पर अवश्य संकट उत्पन्न हो सकता है। इसका असर व्यापक अर्थव्यवस्था पर भी होगा और देश की नई संप्रभु रेटिंग के पूर्वानुमान पर भी। इसके अलावा मूडीज ने बाहरी मोर्चे पर संकट की आशंका जताई है। यहां फिलहाल तो कोई समस्या नहीं नजर आ रही है। देश की बाहरी उधारी बहुत ज्यादा नहीं है और विदेशी पूंजी की आवक बरकरार है, विदेशी मुद्रा भंडार भी एकदम सहज स्तर पर है और मुद्रा की बात करें तो वह भी खासी मजबूत है। 
 
यह भी सच है कि अतीत की तरह अब भी काफी कुछ कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर करता है। अगर इसकी कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाती है तो देश का व्यापार संतुलन संवेदनशील स्थिति में पहुंच जाएगा जबकि वह अभी भी बढ़ रहा है। अगर ऐसा होता है तो बाहरी संकट के अन्य मोर्चों पर भी खतरा बढ़ जाएगा। सरकार को इस जोखिम को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए। इसके अलावा मूडीज ने यह भी कहा है कि भारत के ऋण प्रोफाइल में सरकारी कर्ज का बोझ अन्य समतुल्य देशों के मुकाबले एक बड़ी बाधा बना हुआ है। वर्ष 2016 में देश के सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में सरकारी ऋण 68 फीसदी था जबकि अन्य समान रैंकिंग वाली अर्थव्यवस्थाओं में इसका औसत 44 फीसदी था। यह हमारे लिए असल चुनौती है। 
 
कुलमिलाकर देखा जाए तो सरकार का खुश होना उचित है। उसके प्रयासों को अंतरराष्ट्रीय सराहना मिली है। इससे पहले विश्व बैंक की कारोबारी सुगमता सूची में उसने 30 अंकों की छलांग लगाकर 100वां स्थान हासिल किया था। कहने का तात्पर्य यह है कि देश की विकास गाथा सही दिशा में बढ़ रही है। अर्थव्यवस्था को इस रेटिंग सुधार का लाभ लेना चाहिए, वहीं राजनीतिक नेतृत्व को सुधार के पथ पर बने रहना चाहिए और लोकलुभावन कदमों से बचना चाहिए। 
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