बिजनेस स्टैंडर्ड - व्यापारियों और किसानों के बीच उलझी चौहान की सियासत
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, December 12, 2017 06:05 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

व्यापारियों और किसानों के बीच उलझी चौहान की सियासत

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  November 17, 2017

 

एक कहावत है जिसका अर्थ है किसी शासक ने जूते की चाह में अपना साम्राज्य गंवा दिया था। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी तकरीबन 350 कृषि व्यापारियों को प्रसन्न करने के चक्कर में 64 लाख किसानों का अपना साम्राज्य गंवा सकते हैं। इस वर्ष जून-जुलाई में जो हुआ उससे सभी अवगत हैं। किसानों ने प्याज की जबरदस्त पैदावार की। इसके चलते कीमतें गिर गईं। मध्य प्रदेश सरकार ने हस्तक्षेप किया और करीब 9 लाख टन प्याज 8 रुपये प्रति किलोग्राम की दर पर किसानों से खरीदा। परंतु किसान इससे भी खुश नहीं थे और आंदोलन ने हिंसा का रूप ले लिया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी शुरू कर दी। पांच लोग मारे गए। आखिर में प्याज सड़ गया क्योंकि मार्कफेड जैसी सरकारी एजेंसियों ने प्याज खरीद तो लिया लेकिन उसके पास उसे रखने की सुविधा नहीं थी और बुनियादी ढांचा न होने के कारण वे उसे बेच नहीं सकीं।
 
इसके बाद सोयाबीन की बारी आई। सोयाबीन का तेल निकाल कर उसकी खली को पश्चिमी देशों में निर्यात किया जाता है जहां वह किसानों के बीच काफी लोकप्रिय है। वे उसे पालतू पशुओं को खिलाते हैं। मध्य प्रदेश के किसान बहुत बड़े पैमाने पर तुअर की दाल भी उगाते हैं। इन दोनों जिंसों की कीमत में अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी कमी आई। रोचक बात यह है कि पड़ोसी राज्यों महाराष्ट्र और राजस्थान में कीमतें स्थिर बनी रहीं क्योंकि उन राज्यों में न्यूनतम राज्य समर्थन मूल्य (एमएसपी) मध्य प्रदेश की तुलना में कम था। कीमतें केवल मध्य प्रदेश में गिरीं। यह इस बात का साफ संकेत था कि चंद लोगों का समूह बाजार के साथ खिलवाड़ कर रहा था। जो लोग इनके बारे में जानते थे उनका कहना था कि मंडी एजेंटों ने एकजुट होकर गठजोड़ कर लिया और जानबूझकर कीमतों पर दबाव बनाया।
 
नतीजतन सरकार ने हस्तक्षेप किया। शिवराज सिंह चौहान को अंदाजा था कि किसान उनको भारी राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकते हैं, इसलिए वह एक ऐसी योजना लेकर आए जो सबको खुश रखने वाली थी। इसमें व्यापारियों के गठजोड़ और कारोबारियों दोनों के लिए गुंजाइश थी। नया एमएसपी घोषित किया गया और तीन राज्यों में जिंस के औसत बाजार मूल्य के आधार पर एक आदर्श मूल्य तय करने का फॉर्मूला पेश किया गया। किसान अपनी उपज को राज्यों की मंडी में बेचने के लिए पंजीयन करते हैं और बदले में उनको रसीद दी जाती है। एमएसपी और आदर्श मूल्य के बीच के अंतर यानी भावांतर के भुगतान का बोझ राज्य सरकार वहन करेगी। इस अंतर को सीधे किसान के खाते में जमा कर दिया जाएगा। यह दोहरी सब्सिडी जैसी व्यवस्था थी। इसमें कारोबारियों को अप्रत्यक्ष रूप से और किसान को प्रत्यक्ष रूप से सब्सिडी दी जा रही है। भावांतर योजना के अधीन आठ फसलों को शामिल किया गया है। इसके लिए 16 अक्टूबर से 15 दिसंबर की बिक्री अवधि तय की गई है। केवल तुअर की बिक्री के लिए 1 फरवरी से 30 अप्रैल, 2018 तक की अवधि तय है।
 
व्यापारी इससे बेहद उत्साहित नजर आए। वे किसानों को न्यूनतम कीमत चुका रहे हैं और कह रहे हैं कि बीच का अंतर तो सरकार वहन करेगी ही। ऐसे में कौन पैसे दे रहा है इससे क्या लेना देना? यहां भ्रामक सवाल यह है कि किस चीज का अंतर? व्यापारियों द्वारा किसान को चुकाए गए दाम और आदर्श मूल्य का अंतर या एमएसपी और आदर्श मूल्य का अंतर? इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं मिल सका। किसान जाहिर तौर पर उच्चतम मूल्य हासिल करना चाहते हैं। परंतु एक बात स्पष्ट है: वह अभी भी पूरी तरह व्यापारियों और मंडी की दया पर निर्भर है। अगर वह अपनी उपज को मंडी में बेच नहीं सकता तो उसके लिए कीमत का कोई संदर्भ ही नहीं बचता। 
 
सवाल यह है कि एक ओर चौहान ने मध्य प्रदेश में शून्य प्रतिशत ब्याज पर कृषि ऋण, तमाम तरह के प्रोत्साहन आदि की मदद से खेती के क्षेत्र में इतना शानदार प्रदर्शन किया है, वहीं वह कृषि व्यापारियों की उस लॉबी को क्यों नहीं नष्ट कर पाए जो कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएमसी) को चलाती है। नौकरशाही का कहना है कि यह थोड़ा जटिल मामला है। इन कारोबारियों की तादाद भले ही 350-400 हो, परंतु ये एजेंट स्थिरता लाते हैं। दरअसल ये स्थानीय राजनेताओं के मददगार होते हैं, उनके चुनाव और अन्य खर्च ये वहन करते हैं जबकि किसानों के लिए इनका महत्त्व यह है कि उनके बुरे दिनों में काम आते हैं। ये एजेंट राजनीतिक व्यवस्था का अंग हैं। शुरुआती दिनों में जब चौहान एजेंट सिस्टम को खत्म करने के इच्छुक थे तो जिस व्यक्ति ने उनका सबसे कड़ा विरोध किया और साथ देने से इनकार किया वह थे उनके तत्कालीन वित्त मंत्री राघव जी। दरअसल वह स्वयं विदिशा के एक एजेंट थे। जब तक एपीएमसी से जुड़े एजेंट एकजुट होते रहेंगे और कीमत तय करेंगे तब तक कृषि-जिंसों का सही मूल्य तय नहीं होगा। 
 
अब तक प्रदेश के करीब तीन चौथाई किसानों ने भावांतर योजना में पंजीयन कराया है। इस योजना के तहत राज्य सरकार को करीब 10,000 करोड़ रुपये तक की धनराशि व्यय करनी पड़ सकती है। अगर किसानों को लगता है कि सरकार ने उनको धोखा दिया है तो चौहान को मुश्किल हो सकती है। राहत की बात केवल यह है कि प्रदेश विधानसभा चुनाव अभी भी दूर हैं।
Keyword: madhya pradesh, bhopal, farmer,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या बिटकॉइन पर नियमन बनाए सरकार?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.