बिजनेस स्टैंडर्ड - रेटिंग कंपनियों की स्थिति
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रेटिंग कंपनियों की स्थिति

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  November 17, 2017

इन्वेस्टर्स सर्विस ने भारत की सॉवरिन रेटिंग में सुधार किया है। यह हाल में मोदी सरकार को मिली दूसरी राहत है। सरकार को आर्थिक हालात के लिए देश में काफी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। पहली उत्साहवर्धक खबर विश्व बैंक की कारोबारी सुगमता सूची में सुधार की थी। अगर जुलाई-सितंबर माह के आर्थिक वृद्धि के आंकड़े भी पिछली दो तिमाहियों की तुलना में सुधार दर्शाते हैं तो यह सरकार के लिए और सुखद होगा। अगर मामूली सुधार भी देखने को मिलता है तो भी कम से कम छह तिमाहियों से आ रही गिरावट का क्रम तो बदलेगा। इससे निवेशकों का अनवरत आशावाद भी सही साबित होगा जो वे लगातार शेयर बाजार में दिखा रहे हैं।

 
जाहिर है कि आलोचक ऐसी रैंकिंग और रेटिंग की सीमाओं की बात करेंगे। बल्कि इसकी शुरुआत हो भी चुकी है। यह भी सच है कि जब ऐसी रेटिंग बेहतर नहीं थीं तब इनकी सीमाओं की बात नहीं की जाती थी। वैसे ऐसी कवायदों से उभरते बाजारों को कुछ खास हासिल नहीं होता है। खासतौर पर इसलिए कि कुछ रेटिंग उन अधिकारियों के मत पर निर्भर होती हैं जो अपने देश से बाहर एक अलग तरह के माहौल में काम कर रहे होते हैं। ऐसी कवायदों में जो पूर्वग्रह निहित होते हैं वे मेजबान देश के लिए नुकसानदेह साबित होते हैं। उदाहरण के लिए भारत को हमेशा विनिर्माण अनुमतियों के लिए बहुत कमजोर रेटिंग प्रदान की जाती है जो कि एक हद तक उचित भी है। परंतु अभी ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब एक अंतरराष्ट्रीय खनन कंपनी के मुखिया ने यह स्वीकार किया था कि उनकी कंपनी को मैनहैटन में अपने स्वामित्व वाली जमीन पर कॉर्पोरेट ऑफिस बनाने की मंजूरी लेने में पांच साल का वक्त लग गया था।
 
यह सवाल पूछना भी जायज है कि आखिर क्यों विश्व आर्थिक मंच द्वारा हर साल घोषित की जाने वाली वैश्विक प्रतिस्पर्धा रैंकिंग में दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं को शीर्ष रैंकिंग नहीं दी जाती है। तेज निर्यात वृद्धि वाले देेशों को भी यह रैंकिंग नहीं दी जाती। ऐसे में यह सवाल तो उठता ही है कि दरअसल प्रतिस्पर्धा का अर्थ क्या है? मंच का कहना है कि वह उत्पादकता का आकलन करता है। अगर ऐसा है तो फिर इसे उत्पादकता सूचकांक क्यों नहीं कहते? ऐसा इसलिए कि यह सूचकांक जो न तो वृद्धि, न निवेश और न ही निर्यात को दर्शाता है उसे प्रतिस्पर्धा का आकलन करने वाला कैसे माना जाए?
 
उभरते बाजारों को अक्सर कमजोर रैंकिंग का सामना करना पड़ता है क्योंकि धारणा ऐसी रहती है कि वहां भ्रष्टाचार अधिक होता होगा। परंतु जर्मनी की रैंकिंग में उस समय सुधार आया जबकि फोक्सवैगन ने व्यापक, संगठित और पूरे कंपनी के स्तर पर धोखाधड़ी की बात स्वीकार की। यह गड़बड़ी उसके डीजल इंजनों के उत्सर्जन से संबंधित थी। स्विट्जरलैंड दशकों तक तीसरी दुनिया के नकदी बनाने वाले लोगों के धन छिपाने का सुरक्षित ठिकाना बना रहा और इसकी मदद से वह फला-फूला, परंतु भ्रष्टाचार के लिए वह कभी सवालों के घेरे में नहीं आया। यह इस बात पर निर्भर करता है कि भ्रष्टाचार से आपका तात्पर्य क्या है और इसकी परिभाषा किसने तय की है। मूडीज इंडिया रेटिंग का इतिहास उसकी कहानी खुद कहता है। सन 1980 के दशक के आखिर में ये रेटिंग अपने उच्चतम स्तर पर थी। उस वक्त देश को ए 2 की उच्च मध्य ग्रेड दी गई थी जो उच्च ग्रेड से ठीक नीचे थी। अक्टूबर 1990 में विदेशी मुद्रा संकट उत्पन्न होने के बाद इसमें गिरावट आई और इसे पहले बीएए 1 और छह माह बाद बीएए 3 कर दिया गया। 
 
यह निम्र मध्य स्तर की निवेश ग्रेड की रैंकिंग थी, हालांकि चंद्रशेखर सरकार गिर चुकी थी। चूंकि वह बजट पेश करने में नाकाम रही थी इसलिए वह इस स्थिति में भी नहीं थी कि वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के समक्ष उस ऋण की प्रतिबद्धता की रक्षा कर पाए जिसकी उसने मांग की थी। तीन माह बाद जून 1991 में मूडी ने देश की निवेश रैंकिंग को निवेश ग्रेड से नीचे बीए 2 कर दिया। शायद ऐसा चुनाव के दौरान राजीव गांधी की हत्या से उपजी राजनीतिक अनिश्चितता और भुगतान संकट के चलते हुआ। इसके बाद तीन साल तक उसने देश की रैंकिंग में कोई सुधार नहीं किया जबकि देश की अर्थव्यवस्था में तमाम मानकों पर सुधार देखने को मिल रहा था। कहने का तात्पर्य यह है कि रेटिंग किसी चीज पर अंतिम निर्णय नहीं है। बल्कि कई बार वे गलत भी होती हैं तो कई अन्य मौकों पर वे भ्रमित करती हैं। रेटिंग में भारत की बेहतर स्थिति को हमें देश की सुधरी हुई वृहद आर्थिक स्थिति और चरणबद्ध सुधारों का नतीजा मानना चाहिए। 
Keyword: economy, narendra modi, rating, इन्वेस्टर्स सर्विस,
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