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यौन उत्पीडऩ के विरुद्घ अच्छी पहल कमियों का निकालना होगा हल

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  November 16, 2017

अमेरिका के फिल्म निर्माता हार्वी वाइन्सटीन के एक के बाद एक कई यौन अपराध और उनके बाद सुर्खियों में आए राजनेताओं समेत तमाम बड़े यौन अपराधियों की सूची चकित करती है। अगर अमेरिका जैसे जागरूक समाज में जहां महिलाएं उल्लेखनीय रूप से मजबूत हैसियत में हैं, वहां ऐसा हो सकता है तो भारत जैसे देशों में क्या होता होगा? भारत में हालात आपकी सोच से ज्यादा बुरे हैं। भारतीय समाज में गहरे तक पैठा स्त्रीद्वेष (जो आंकड़ों में भी नजर आता है) इसका उदाहरण है। यह बात भी ध्यान दीजिए कि बॉलीवुड से वैसा कोई खुलासा सामने नहीं आया है, हालांकि कुछ साल पहले हुए एक स्टिंग ऑपरेशन में कास्टिंग काउच की पुष्टि हुई थी। जहां तक कार्यस्थलों की बात है, वहां का ढांचा ही कुछ ऐसा होता है कि शिकायत करना पीडि़त के लिए एक बड़ी कवायद बन जाता है। भारतीय महिलाएं विकसित देशों की व्यवस्थित शिकायत प्रणाली को देखकर केवल ईष्र्या ही कर सकते हैं।

 
महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने गत सप्ताह शी-बॉक्स नामक ऑनलाइन शिकायत प्रबंधन व्यवस्था की शुरुआत की। यह सुविधा सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं की मदद करेगी। यह प्रथम दृष्टया समझदारी भरा फैसला लग रहा है। अब कम से कम देश की कामकाजी महिलाओं के पास शिकायत निवारण की संस्थागत व्यवस्था तो है। गौरतलब है कि विभिन्न सर्वेक्षणों से जाहिर हो चुका है कि देश की ज्यादातर कंपनियों में यौन शोषण की शिकायतों से निपटने के लिए अनिवार्य समिति तक नहीं है। रोचक बात यह है कि मंत्रालय की वेबसाइट में यह व्यवस्था भी है कि जिन महिलाओं ने अपनी आंतरिक या स्थानीय समिति के समक्ष शिकायत की है वे भी इस वेबसाइट पर जाकर शिकायत दर्ज कर सकती हैं।
 
मेनका गांधी की यह पहल एक व्यापक कवायद का हिस्सा है। प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक इसका मकसद कामकाजी महिलाओं को सुरक्षित और बेहतर माहौल मुहैया कराना। जानकारी के मुताबिक इस वेबसाइट की शुरुआत इसलिए की गई है ताकि पीडि़त महिलाएं सीधे अपनी शिकायत दर्ज करा सकें और उनके निवारण के लिए जरूरी कदम उठाए जा सकें। कहा गया है कि मंत्रालय इन शिकायतों की निगरानी करेगा और हल मुहैया कराएगा। कोई भी वायरल हो चुकी मीटू से प्रेरित इस पहल के पीछे की गंभीरता पर संदेह नहीं करेगा लेकिन इसे लेकर कुछ सवाल हैं जिनका जवाब तलाशना होगा।
 
पहली बात तो यह कि इस कवायद का दायरा सीमित है। आखिर इसे सरकारी और निजी कंपनियों तक सीमित क्यों रखा गया है? कार्यस्थल की परिभाषा बहुत व्यापक है। क्या सरकारी और अद्र्ध सरकारी संस्थानों को भी इसमें शामिल नहीं किया जाना चाहिए? विश्वविद्यालयों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों को इसका हिस्सा नहीं होना चाहिए? अभिनेत्रियों, घरेलू सहायिकाओं तथा असंगठित क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं के लिए यह किस तरह मददगार होगा, जबकि इन क्षेत्रों में बहुत बड़ी तादाद में महिलाएं काम करती हैं।
 
दूसरा, मंत्रालय पीडि़त महिलाओं को शीघ्र न्याय मिलना कैसे सुनिश्चित करेगा? प्रेस विज्ञप्ति में इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई लेकिन मान लेते हैं कि इसके लिए मंत्रालय संबंधित संस्थानों को कड़ाई भरे पत्र लिखेगा। अगर किसी वैधानिक दंडात्मक उपाय की व्यवस्था नहीं है तो ऐसे में यह मानना मुश्किल है कि केवल मंत्रालय के पत्र के चलते संबंधित मानव संसाधन विभाग कदम उठाएंगे।
 
तीसरा और शायद सबसे अहम प्रश्न यह है कि इस वेबसाइट पर दर्ज किए जाने वाले मामलों की गोपनीयता की क्या गारंटी है? पंजीयन की प्रक्रिया आसान है और इसमें शिकायत की सतत निगरानी की भी व्यवस्था है। परंतु मानवीय चूक से जानकारी बाहर आ जाने की आशंका भी उतनी ही सहज है। एक स्पष्टïीकरण के जरिये सरकार ऐसे किसी भी दायित्व से मुक्त हो जाती है। विशुद्घ शासकीय भाषा में लिखे हुए इस स्पष्टïीकरण का अर्थ है कि अगर कोई बदनीयत कर्मचारी चाहे तो शिकायतों से संबंधित सारी जानकारी सार्वजनिक कर सकता है और इस स्थिति में शिकायत करने वाले या जिसके खिलाफ शिकायत की गई है उसे किसी किस्म की कोई राहत नहीं मिल सकती है।
 
इसमें दो राय नहीं कि अगर पीडि़त का नाम सामने आ गया तो उसे पर्याप्त शर्मिंदगी का सामना करना पड़ सकता है। परंतु अगर व्यवस्था में गोपनीयता की कमी होती है तो इससे उन लोगों को भी प्रोत्साहन मिल सकता है जो केवल अपने उच्चाधिकारी के प्रति नाराजगी या द्वेष के चलते ऐसी झूठी शिकायत करना चाहते हैं। उनको गोपनीयता नहीं होने का लाभ मिल सकता है। 
 
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की एक छात्रा ने पिछले दिनों ऐसे तमाम पुरुष शिक्षकों का नाम जारी किया था जिन्होंने कथित तौर पर अपनी विद्यार्थियों का यौन शोषण किया। जाहिर है इस तरह की अनियंत्रित हरकतों के अपने कई खतरे हैं। इनकी वजह से कई लोग बिलावजह भी बदनाम हो सकते हैं। एक विद्यार्थी द्वारा जारी की गई यह सूची पूरी तरह अपुष्टï है। इसमें आरोप लगाने वाले का नाम तो सामने है लेकिन संबंधित आरोपितों की ओर से इसे लेकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई। 
 
कम से कम एक प्रोफेसर ने अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों का विस्तृत ब्योरा मांगा है लेकिन नतीजा सिफर। ऐसी पहल की वजह से ही शी-बॉक्स जैसी पहल पर भी प्रश्नचिह्नï लगता है और उस संकट का हल होना और मुश्किल हो जाता है जिनसे निपटने के लिए इसे बनाया गया है। मेनका गांधी के मंत्रालय को इन मसलों से भी निपटना चाहिए। 
Keyword: hollywood, bollywodd, sexual harassment,,
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