बिजनेस स्टैंडर्ड - नोटबंदी के आलोचकों का गलत है आकलन
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नोटबंदी के आलोचकों का गलत है आकलन

अरविंद पानगडिय़ा /  November 16, 2017

पिछले साल की गई नोटबंदी के खिलाफ किए जा रहे अधिकांश दावे अपुष्टï हैं। उनमें से कुछ प्रमुख दावों की पड़ताल करके विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अरविंद पानगडिय़ा

 
गत सप्ताह नोटबंदी को लेकर एक बार फिर गहन बहस देखने को मिली। अनुमान के मुताबिक ही आलोचकों ने कई ऐसे दावे किए जो निराधार हैं। मौजूदा आलेख में हम तीन ऐसे ही दावों की पड़ताल करेंगे।  
 
पहला दावा: चूंकि उच्च मूल्य वर्ग के तकरीबन सभी नोट बैंकों में वापस जमा हो चुके हैं इसलिए नोटबंदी का प्राथमिक लक्ष्य पूरी तरह विफल रहा। यानी कि बेनामी नकदी को सामने लाना। 
 
यह दावा दो वजहों से गलत है। पहला, नोटबंदी का प्राथमिक लक्ष्य भ्रष्टïाचार से मुकाबला करना था, न कि बेनामी नकदी का पता लगाना। बेनामी धन का पता लगाना तो वह तरीका था जिसकी मदद से भ्रष्टïाचार से मुकाबला किया जाना था। दूसरा, नोटबंदी ने भ्रष्टïाचार पर सफलतापूर्वक वार किया। हालांकि बेनामी धन उतना नहीं निकला जितनी कि उम्मीद की गई थी।
 
फिर भी, बैंकिंग व्यवस्था में लौटने वाले 500 और 1,000 रुपये के हर नोट से अब किसी कंपनी या व्यक्ति का नाम जुड़ा हुआ है। आधुनिक युग में डाटा जुटाने की जो तकनीक है वह हमें यह इजाजत देती है कि हम पता कर सकें कि कौन सा नोट साफ सुथरा है और कौन सा दागी। आयकर विभाग पहले ही 17.7 लाख संदिग्ध बैंक खातों की पहचान कर चुका है जिनमें करीब 3.68 लाख करोड़ रुपये की रकम जमा है। यह वह राशि है जो खाताधारक के कर प्रोफाइल से मेल नहीं खाती। करीब 70,000 ऐसे लोगों और संस्थाओं को नोटिस जारी किए जा रहे हैं जिन्होंने बैंक खातों में 50 लाख रुपये से अधिक की राशि जमा की लेकिन कर रिटर्न दाखिल नहीं किया या फिर आयकर विभाग की प्रतिक्रियाओं पर जवाब नहीं दिया। कई अन्य नोटिस आने वाले महीनों में जारी किए जाएंगे। 
 
इसके समांतर कंपनी मामलों के मंत्रालय ने 224,000 कंपनियों का पंजीयन समाप्त किया है। ये ऐसी कंपनियां हैं जिन्होंने पिछले दो साल या उससे अधिक समय से कोई कारोबार नहीं किया है और इस संबंध में कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सकीं। इनमें से कई कंपनियों के तो 100 से अधिक बैंक खाते हैं और उन्होंने नोटबंदी के बाद बड़ी तादाद में नकदी जमा की है या निकाली है। ये कंपनियां अब अपने बैंक खाते संचालित नहीं कर सकतीं। कंपनी मामलों के मंत्रालय ने करीब 309,000 ऐसे निदेशकों को भी पद के अयोग्य घोषित कर दिया है जो लगातार तीन साल तक वित्तीय दस्तावेज दे पाने में नाकाम रहे या इसी अवधि तक सालाना रिटर्न दाखिल न कर पाए। 
 
नोटबंदी ने जिस दूसरे क्षेत्र में बेनामी संपत्ति पर सीधा हमला बोला वह है अचल संपत्ति। आलोचकों का कहना है कि नोटबंदी भ्रष्टïाचार से निपटने का सही उपाय नहीं थी क्योंकि अधिकांश काला धन अचल संपत्ति जैसे क्षेत्रों में है, नकदी के रूप में नहीं। परंतु ये आलोचक यह भूल गए कि बेनामी नकदी की मदद से ही अचल संपत्ति खरीदी जाती है। यही वजह है कि नोटबंदी की घोषणा के बाद अचल संपत्ति के दामों में एकबारगी ही एक चौथाई तक गिरावट आई। अचल संपत्ति में रखा गया काला धन अचानक एक चौथाई कम हो गया। इतना ही नहीं आज अपना काला धन जमा करने की सोचने वाले भी उसे अचल संपत्ति में निवेश करने से पहले दो बार सोचते हैं।  
 
आखिर में नोटबंदी और उसके बाद उठाए गए कदमों ने बेनामी संपदा रखने वालों को यह सीधा संकेत दिया कि प्रधानमंत्री भ्रष्टïाचार से निपटने के मामले में राजनीतिक जोखिम उठाने से भी नहीं चूकेंगे। यही वजह है कि डिजिटलीकरण के चलते करदाताओं और औपचारिक लेनदेन की तादाद में तेज इजाफा हुआ है। अगर सरकार मौजूदा राह पर बढ़ती रहेगी तो मुझे इसमें कोई शक नहीं है कि यह बहुत बड़ा बदलाव साबित होगा। 
 
दूसरा दावा: नोटबंदी के कारण देश के सकल घरेलू उत्पाद में दो फीसदी की गिरावट आई।
 
सरकारी विश्लेषकों समेत तमाम लोगों का मानना था कि देश में जितनी नकदी चलन में है उसमें से 86 फीसदी के एकबारगी बंद कर दिए जाने से जीडीपी पर नकारात्मक असर पड़ेगा। कुछ लोगों ने तो जीडीपी में कई प्रतिशत की गिरावट का अनुमान भी जता दिया था। परंतु वर्ष 2016-17 के जीडीपी अनुमान ने सबको चौंका दिया।
 
जहां तक जीडीपी में दो फीसदी गिरावट की बात है तो एक सामान्य विश्लेषण भी यह बताने के लिए पर्याप्त है यह दावा कितना कमजोर है। वर्ष 2015-16 के दौरान वृद्धि दर 8 फीसदी थी। जानकार विश्लेषकों ने कहा था कि इस 8 फीसदी में एक फीसदी हिस्सेदारी तो तेल कीमतों में तेज गिरावट की भी है। अगर हम इस आकलन को स्वीकार करते हैं तो वर्ष 2016-17 में वृद्धि दर 7 फीसदी रहनी चाहिए। ऐसे में 7.1 फीसदी की दर हासिल हुई है जो बताता है कि नोटबंदी का इस पर कोई असर नहीं हुआ। अगर एक बार के लिए यह मान लिया जाए कि वर्ष 2015-16 में तेल कीमतों के कारण कोई लाभ नहीं मिला था तो भी यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वर्ष 2015-16 में नोटबंदी का असर हद से हद 0.9 फीसदी ही रहा।
 
दावा 3: नोटबंदी के चलते देश भर में कुल 15 लाख रोजगार छिने।
 
आलोचकों के मुताबिक इस दावे का स्रोत है सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई)। उसने एक जनवरी 2016 को आरंभ हुए अपने सर्वेक्षण में रोजगार और बेरोजगारों की गिनती शुरू की। सीएमआई के सीईओ महेश व्यास के मुताबिक इस सर्वेक्षण के मुताबिक सितंबर-दिसंबर 2016 के दौरान 40.65 करोड़ लोग रोजगारशुदा थे जबकि जनवरी-अप्रैल 2017 के दौरान यह आंकड़ा 40.5 करोड़ का था। यानी नोटबंदी से 15 लाख नौकरियां गईं।
 
परंतु इस आकलन के साथ दिक्कत यह है कि रोजगार में अलग-अलग समय में बदलाव आता रहता है। ऐसे में सही आकलन के लिए हमें जनवरी-अप्रैल 2017 के रोजगार आंकड़ों की तुलना जनवरी-अप्रैल 2016 के आंकड़ों से करनी होगी। ये आंकड़े बताते हैं कि जनवरी-अप्रैल 2016 के दौरान देश में 40.1 करोड़ लोग रोजगारशुदा थे। ऐसे में अगर हम व्यास की बात एक बार मान भी लें और उपरोक्त दो अवधियों के बीच रोजगार में बदलाव का श्रेय पूरी तरह नोटबंदी को दे दें तो भी नतीजा यही कहता है कि 15 लाख रोजगार जाने के बजाय 40 लाख रोजगार तैयार हुए।
 
(लेखक कोलंबिया विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर और नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष हैं)
Keyword: demonetization, note, rupee,,
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