बिजनेस स्टैंडर्ड - दिवालिया कानून की दूर करनी होगी कमी
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दिवालिया कानून की दूर करनी होगी कमी

देवाशिष बसु /  November 15, 2017

दिवालिया प्रक्रिया की खामियों को दूर करने के लिए अभी संबंधित कानून के नियम कायदों में कई बदलाव किए जाएंगे। विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं देवाशिष बसु

 
गत 7 नवंबर को इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंगक्रप्टसी बोर्ड ऑफ इंडिया (आईबीबीआई) ने एक अधिसूचना जारी की। यह अधिसूचना इस बात का जीवंत उदाहरण है कि जब उसका सामना एक ऐसे व्यावहारिक मुद्दे से होता है जो कानून बनाते वक्त विधिक विशेषज्ञों और जानकारों की नजर से बचा रह गया हो, तो उसकी प्रतिक्रिया किस तरह की होती है। अधिसूचना हमें यह याद दिलाती है कि निस्तारण योजना ऐसे किसी व्यक्ति की ओर से आनी चाहिए जिसमें वास्तव में दिवालिया कारोबार को उबारने की क्षमता हो और ऋणदाताओं की समिति से अपेक्षा की जाती है कि वह उनमें से सर्वश्रेष्ठ को मंजूरी देगी। इसके बाद नियामक यह निर्देश देता है कि ऋणदाताओं की समिति को किस तरह आचरण करना चाहिए। समिति 'खुद को संतुष्टï करने के लिए हर निस्तारण योजना की समुचित जांच परख करे और देखे कि (अ) योजना व्यवहार्य हो और (ब) जिन लोगों ने योजना प्रस्तुत की है और इसका क्रियान्वयन करेंगे वे विश्वसनीय हों। ऐसा इसलिए ताकि ऐसी योजनाओं से बचा जा सके जो आगे चलकर निस्तारण बाद नकदीकरण की ओर ले जा सकती हैं और ताकि सबसे उपयुक्त योजना को चुना जा सके।' 
 
इसे पढ़ रहा कोई भी शख्स इस उपदेशपूर्ण भाषा से नाराज हो सकता है। ऋणदाताओं की समिति का अपना पैसा दांव पर लगा हुआ है। वे सरकार या अदालत द्वारा नियुक्त रिसीवर की तरह नहीं हैं जिन्हें उनका दायित्व याद दिलाना पड़ता है। इन दिनों अक्सर ऋणदाता परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनियों से होते हैं जिनका इकलौता लक्ष्य अपने प्रतिफल को बढ़ाना रहता है। वे निजी क्षेत्र के बैंकर भी हो सकते हैं जो खराब हालात से अधिकतम लाभ लेना चाहते हैं। केवल सरकारी क्षेत्र के बैंकरों को ही यह सलाह देने की आवश्यकता है कि वे अपने हितों का ध्यान रखते हुए काम करें। ये बैंक देनदारी में चूक करने वालों से घिरे हुए हैं। अगर ऐसा है तो आईबीबीआई की ओर से उन्हें दिए जाने वाले निर्देश वित्त मंत्रालय की ओर से आने चाहिए थे।
 
बहरहाल आईबीबीआई ने ऐसे निर्देश क्यों जारी किए? ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय प्रवर्तकों ने अपनी कंपनियों का बहुत खराब ढंग से प्रबंधन किया है और वे उन पर नियंत्रण छोडऩा नहीं चाहते। इसलिए एक के बाद एक मामलों में प्रवर्तक नई दिवालिया प्रक्रिया की मदद से उसी पुरानी संपत्ति पर नए सिरे से कब्जा जमाने की जुगत में नजर आते हैं। इसकी वजह से बहुत अधिक नाराजगी देखने को मिली। जेएसडब्ल्यू समूह के संस्थापक सज्जन जिंदल ने ट्वीट किया, 'संदिग्ध प्रवर्तकों को अपने पुनर्वास की योजना प्रस्तुत करने का अवसर नहीं दिया जाना चाहिए। यह इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंगक्रप्टसी कोड (आईबीसी) का दुरुपयोग होगा। बोली की प्रक्रिया को भी बोली आमंत्रित करने के पहले स्पष्टï किया जाना चाहिए।' यह एक अलग मसला है कि जेएसडब्ल्यू के एक सफल कंपनी बनने से बहुत पहले इसकी पूर्ववर्ती कंपनी जिंदल विजयनगर करीब एक दशक तक बहुत खस्ता हालत में थी और जिंदल इस पर कब्जा बनाए रखने में कामयाब रहे। बाद में वह कंपनी की तकदीर बदलने में कामयाब रही। 
 
यह मसला जटिल है कि निस्तारण प्रक्रिया में शामिल कंपनी के प्रवर्तकों को बोली लगाने का अधिकार मिलना चाहिए या नहीं। इन प्रवर्तकों को एक लाभ तो होता है क्योंकि उन्हें अन्य बोलीकर्ताओं की तुलना में ज्यादा जानकारी होती है। दूसरा मुद्दा नैतिकता का है। प्रवर्तक ही कंपनी की इस हालत के लिए जिम्मेदार होते हैं। ऐसे में उन्हें दोबारा कंपनी की जिम्मेदारी कैसे सौंपी जा सकती है? खासतौर पर जब बार-बार देनदारी में चूक हुई हो और गड़बड़ी स्पष्टï रही हो। मीडिया में ऐसी बात भले ही चल जाए लेकिन अदालत की बात करें तो किसे बाहर रखा जाए और क्यों यह अधिनियम के मुताबिक ही तय होना चाहिए। खराब ढंग से तैयार किए गए आईबीसी की कई खामियों में से एक यह है कि इसमें इस बात को ध्यान में नहीं रखा गया कि प्रवर्तक चीजों को अपने मुताबिक ढालने का प्रयास करेंगे। दिवालिया निस्तारण में इन परिस्थितियों से बचने के लिए बड़ी कंपनियों के मामले में ट्रेडेबल सिक्युरिटीज का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि प्रतिभूति ऋण का बाजार मूल्य रेखांकित परिसंपत्ति के मूल्य पर अधिक बेहतर निर्धारित हो सकता है बजाय कि बंद कमरों में होने वाली बातचीत की तुलना में। परंतु हमारे देश में यह राह अपनाना आसान नहीं है। 
 
इसके बजाय हमारे देश में काम नियामकों के जिम्मे है जो अनगिनत परिपत्र जारी करते हैं। उन तमाम व्यावहारिक समस्याओं से निपटने के क्रम में इन्हें जारी किया जाता है जिनका ध्यान कानून बनाते वक्त विधि विशेषज्ञ नहीं रख पाए थे।  उदाहरण के लिए 7 नवंबर के निर्देश के मुताबिक आईबीबीआई ने कहा है कि निस्तारण योजना में ऐसे ब्योरे पेश किए जाने चाहिए कि ऋणदाताओं की समिति आवेदकों की समझदारी भरे निर्णय लेने की क्षमता का आकलन कर सकती है। इस खुलासे में निस्तारण आवेदक का पूरा ब्योरा भी होना चाहिए। मसलन उसकी होल्डिंग कंपनियों की जानकारी, अनुषंगी कंपनियों की जानकारी, संबद्घ कंपनियां और संबंधित पक्ष, लंबित या सजायाफ्ता मामलों की जानकारी, कंपनी अधिनियम 2013 के अधीन अपात्रता की जानकारी आदेश या सेबी द्वारा जारी किए गए निर्देश, जानबूझकर देनदारी में चूक करने वालों के रूप में वर्गीकरण आदि। इस योजना में प्राथमिकता वाले लेनदेन, कम मूल्य वाले लेनदेन, असंगत रूप से अधिक ऋण वाले लेनदेन और धोखाधड़ी भरे लेनदेन का विस्तृत ब्योरा आईबीसी की परिभाषा के मुताबिक होना चाहिए। 
 
यह स्पष्ट नहीं है कि ये सारे ब्योरे स्पष्टीकरण के एक और दौर की वजह बनेंगे या इनका इस्तेमाल आवेदन खारिज करने के लिए किया जाएगा। अगर बाद वाली स्थिति बनती है तो इसे तत्काल अदालत में चुनौती दी जा सकती है। रोचक बात यह है कि आईबीसी भी ऋणदाताओं को यह बताने में व्यस्त है कि वे समझदारी का परिचय दें और उन आवेदकों को चुनें जो भरोसेमंद हों। आईबीसी में 'उचित और सक्षम' जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि भविष्य में भी कई कानूनी लड़ाइयों और आईबीसी के नियमों में भी कई तरह के बदलाव देखने को मिलेंगे।
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