बिजनेस स्टैंडर्ड - अपराध की तादाद में कैसे आए कमी?
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अपराध की तादाद में कैसे आए कमी?

अजय शाह /  November 14, 2017

अपराध को घटित होने से रोकने में पकड़े जाने की आशंका की अहम भूमिका है। संगठनात्मक और प्रक्रियागत सुधार की मदद से अपराध की तादाद कम करने में मदद मिल सकती है। बता रहे हैं अजय शाह


पकड़े जाने की आशंका अपराध को रोकती है। एक उदाहरण लेते हैं। दिल्ली में एक अनुमान के मुताबिक चोरी के कुल मामलों में से बमुश्किल 3 फीसदी में पकड़े जाने की आशंका होती है। हम दंड विधान को और कड़ा कर सकते हैं लेकिन इससे केवल भ्रष्टाचार ही बढ़ता है। हम लोगों की तादाद 10 गुना बढ़ा सकते हैं लेकिन यह महंगा साबित होगा। ऐसे में आगे राह यही है कि संगठनात्मक और प्रक्रियात्मक सुधार को अंजाम दिया जाए ताकि प्रति सजा लोगों के समय की खपत में कम से कम 10 गुना कमी की जा सके।
 
आईडीएफसी संस्थान द्वारा हाल ही में कराए गए एक सर्वेक्षण का इस्तेमाल करें तो अनुमान है कि इस साल दिल्ली में करीब 13.4 लाख लोग चोरी के शिकार हुए। इनमें से करीब 6 लाख मामले पुलिस में दर्ज हुए। आईडीएफसी संस्थान और एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक 90,000 लोगों ने प्राथमिकी दर्ज कराई। दिल्ली में चोरी के मामलों में सजा का प्रतिशत ज्ञात नहीं है। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में तमाम अपराधों में सजा का औसत 49.2 फीसदी है। इसे उपरोक्त 90,000 मामलों पर भी लागू किया जा सकता है। यानी इन मामलों में करीब 44,000 में सजा हुई होगी।
 
दिल्ली में होने वाली 100 चोरियों में से 44 मामलों में लोग पुलिस के पास जाते हैं और सात में प्राथमिकी दर्ज होती है। इनमें से तीन मामलों में सजा होती है। इन तीनों में से कुछ निर्दोष भी होते हैं। यानी इस बात की 97 फीसदी संभावना है कि असली चोर बच निकलेगा।  जाहिर है हमारी न्याय व्यवस्था लोगों को अपराध करने से रोक नहीं पा रही। पकड़े जाने की संभावना इतनी कम हो तो भला चोरी क्यों न हो? यह वृहत सामाजिक पूंजी वाले देश पर भी एक टिप्पणी है। हमारे यहां सत्ता भले ही दुव्र्यवहार पर दंडित न करे लेकिन शराफत एक मानक की तरह है।
 
बहरहाल, अपराध से निपटने का एक तरीका यह है कि सजा बढ़ा दी जाए। उदाहरण के लिए अगर किसी पार्किंग में सेल्फ सर्विस की व्यवस्था है और वहां 100 रुपये निर्धारित शुल्क है तो कुछ लोग फर्जीवाड़ा करते हैं और यह शुल्क नहीं चुकाते। अगर पकड़े जाने की संभावना केवल 10 फीसदी है तो यहां जुर्माना बढ़ाकर 1,000 रुपये कर दिया जाना चाहिए। यानी अगर 90 फीसदी लोग बच सकते हैं तो पकड़े जाने वाले 10 फीसदी लोगों पर 10 गुना जुर्माना लगाकर अनुपालन हासिल हो सकता है।
 
वित्तीय जगत में अनेक अपराध होते हैं। मसलन बाजार के साथ छेड़छाड़ करना। ऐसे मामलों में सारे दोषी नहीं पकड़े जाते। एफएसएलआरसी संबंधित रुख की बात करें तो वित्तीय एजेंसियां यानी सेबी और आरबीआई दो चरण में काम करती हैं। पहला, अभियोजन पक्ष को यह तय करना होगा कि गलत ढंग से लाभ कमाया गया। दूसरा, यह मान लिया जाता है कि केवल एक तिहाई मामलों में लोग पकड़े जाते हैं इसलिए जुर्माना गलत लाभ का तीन गुना होता है।
 
यह एक तार्किक तरीका है और उन मौजूदा प्रावधानों से काफी बेहतर है जिनमें मनमाने ढंग से सजा सुनाई जाती है। उदाहरण के लिए सेबी अक्सर गलत लाभ का आकलन करता ही नहीं और संबंधित कंपनियों को एक खास अवधि के लिए कारोबार करने से रोक देता है। जब दो कंपनियों को 30 दिनों के लिए रोक दिया जाता है तो ऐसा प्रतीत होता है कि समान सजा दी गई है। बहरहाल, इनका मौद्र्रिक मूल्यांकन काफी अलग हो सकता है। कंपनियों के कारोबार के आकार और उनके मुनाफे पर पडऩे वाले दीर्घकालिक असर से यह तय होगा। हमें समान जुर्माने के रूप में समान व्यवहार लागू करने की आवश्यकता है। जांच और अभियोजन के दौरान गलत ढंग से जुटाई गई संपदा का भी आकलन किया जाना चाहिए और अदालत में अपने आकलन के बचाव की पूरी तैयारी रखनी चाहिए। 
 
भारत में हम अक्सर नाराज होकर कड़ी सजा की मांग करते हैं। इसके पीछे शायद यही सोच रहती है कि जब अपराधी इतनी कम तादाद में पकड़े जा रहे हैं तो कम से कम सजा ऐसी हो कि लोग अपराध करने से बचें। परंतु कड़ी सजा के साथ दो तरह की समस्याएं जुड़ी हैं।  कड़ी सजा के मामलों में जांच और अभियोग तय करने वाले अधिकारियों के पास अधिकार बढ़ जाते हैं। जरा कल्पना कीजिए क्या हो अगर किसी यातायात पुलिस के जवान को लाल बत्ती का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति पर 10,000 रुपये का जुर्माना लगाने का अधिकार मिल जाए। कमजोर प्रक्रिया और कमजोर जवाबदेही के माहौल में कड़ी सजा का प्रावधान भ्रष्टाचार का मार्ग प्रशस्त करेगा।
 
इसमें एक दिक्कत यह भी है कि निर्दोष व्यक्तियों को बड़ी सजा का शिकार होना पड़ सकता है। यह भी एक वजह है जिसके चलते मौत की सजा का इतना विरोध होता है। न्यायपालिका जब-तब गलती करती रहती है। ऐसे में अगर किसी निर्दोष को सजाए मौत हो जाए तो यह बहुत बड़ी चूक होगी। सऊदी अरब की तरह चोरी करने वाले को हाथ काटने की सजा भी दी जा सकती है लेकिन एक सुसंस्कृत समाज में सजा का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं है। उदार लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं ने कम सजा के साथ लोगों को अपराध करने से रोके जा सकने की दिशा में धीमी प्रगति की है। दिल्ली में चोरी के मामलों में 3 फीसदी के आंकड़े को बढ़ाकर 6 फीसदी या 30 फीसदी कैसे किया जा सकता है?
 
न्यायाधीशों की तरह देश में पुलिसकर्मियों की भी काफी कमी है। परंतु केवल तादाद बढ़ाने से बात नहीं बनने वाली। दरअसल 3 फीसदी के प्रतिरोध को 30 फीसदी तक पहुंचाने के लिए 10 गुना पुलिस बल की आवश्यकता है। इसमें करदाताओं का पैसा तो लगेगा साथ ही बात यह भी है कि यही कर्मचारी अर्थव्यवस्था के अन्य हिस्सों में रहते तो अधिक बेहतर प्रदर्शन कर सकते थे।
 
ऐसे में उत्पादकता पर ध्यान देना भी जरूरी है। प्रक्रियाओं और संगठनों में क्या बदलाव किए जाएं कि उत्पादकता 10 गुना तक बढ़ जाए। इसके लिए पुलिस बल, जांचकर्ताओं, फोरेङ्क्षसक प्रयोगशालाओं, अभियोजकों और अदालतों का सावधानीपूर्वक विश्लेषण करना आवश्यक है। अंतिम निष्कर्ष का आकलन क्राइम विक्टिमाइजेशन सर्वे (सीवीएस) के जरिये किया जाता है। यह हमें बताता है कि हमारा प्रदर्शन कैसा है। फिलहाल तो सीवीएस के मुताबिक दिल्ली में हर साल 13.4 लाख लोग चोरी के शिकार होते हैं। सुधारों का आगमन होने के बाद इस तादाद में कमी आएगी।
Keyword: crime, delhi, law,,
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