बिजनेस स्टैंडर्ड - गैरसूचीबद्घ कंपनियों का नियमन
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गैरसूचीबद्घ कंपनियों का नियमन

संपादकीय /  November 14, 2017

खबरों के मुताबिक कंपनी मामलों का मंत्रालय अपने कुछ नियामकीय अधिकार भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) को सौंपना चाहता है। खासतौर पर वे अधिकार जिनकी मदद से बाजार नियामक गैर सूचीबद्घ कंपनियों पर कुछ हद तक निगरानी रख सकता है। ऐसी कंपनियां जो बाजार में सूचीबद्घ नहीं हैं वे प्राय: सेबी की प्रत्यक्ष निगरानी के दायरे में नहीं आतीं। यह अच्छा ही है क्योंकि इससे उसका नियामकीय बोझ कम होगा। सूचीबद्घ कंपनियां जो सार्वजनिक रूप से कारोबार करती हैं उनके खुलासे, पारदर्शिता और नियामकीय जरूरतें सब अधिक होते हैं। ऐसा तमाम बाजार प्रतिभागियों के हितों की रक्षा के लिए जरूरी है। यह दलील गैरसूचीबद्घ कंपनियों पर लागू नहीं होती। 

 
बहरहाल, भारत में चिंता की बात यह है कि इस तथ्य की बदौलत कई बड़ी कारोबारी कंपनियों ने भी अपना अधिकांश कारोबार गैर सूचीबद्घ अनुषंगी कंपनियों को स्थानांतरित कर दिया है ताकि वे जांच के दायरे से बाहर रह सकें। इसकी बदौलत नियामकीय और कानूनी कार्रवाई करना कठिन हो गया है। उदाहरण के लिए अब पैसे को सूचीबद्घ कंपनियों से गैर सूचीबद्घ कंपनी में डाला जा सकता है जबकि इस कंपनी पर सूचीबद्घ कंपनी के प्रवर्तकों का ही सीधा नियंत्रण होता है। इसका नुकसान सूचीबद्घ कंपनी के अल्पांश हिस्सेदारों पर पड़ता है। कई बड़ी सूचीबद्घ कंपनियों में ज्यादातर के कामकाज को गैर सूचीबद्घ कंपनियों के स्तर पर चलाया जाता है जो नियामकीय रडार की पहुंच से बाहर होती हैं। ऐसे में अल्पांश निवेशकों को यह ठीक से पता नहीं चल पाता कि पैसा कहां जा रहा है, कैसे खर्च हो रहा है आदि। यह आशंका भी जायज है कि कुछ कारोबारी समूह गैरसूचीबद्घ अनुषंगी कंपनियों के अपने बड़े नेटवर्क का इस्तेमाल कर वंचना करने या उचित कर नहीं चुकाने के लिए भी करते हैं। निश्चित तौर पर धन शोधन और कई बार आपराधिक गतिविधियों की भी आशंका रहती है। हालांकि यह भी सच है कि ऐसा कर वंचना की तुलना में निहायत छोटे पैमाने पर होता है। 
 
एक बार गैर सूचीबद्घ कंपनियों के मिल जाने के बाद भेदिया कारोबार को लेकर भी परिभाषा में अस्पष्टïता है। सेबी ने हाल ही में 25 सदस्यीय समिति की स्थापना की ताकि देश में कॉर्पोरेट गवर्नेंस की जांच की जा सके। समिति ने विविध नियामकों और विविध कानूनी ढांचों की समस्या को भी रेखांकित किया। ऐसी गतिविधयों को भेदिया कारोबार माना जाए या नहीं इसे लेकर सेबी के नियमन और कंपनी अधिनियम के नियमन में विरोधाभास है। इसका क्रियान्वयन कंपनी मामलों के मंत्रालय के जिम्मे है। यह एकदम स्पष्टï है नियमन को सुसंगत बनाया जाना आवश्यक हो चला है। अल्पांश निवेशकों के बचाव की बात करें तो कागजों पर यह काफी मजबूत नजर आता है लेकिन हकीकत यह है कि देश में पैसे की निकासी के नियंत्रण के मामले में कारोबारी प्रशासन खासा कमजोर रहा है। काले धन के खिलाफ मौजूदा अभियान ने भी यह दिखाया है कि गैरसूचीबद्घ कंपनियों का दुरुपयोग किया गया है। उस लिहाज से देखा जाए तो तमाम ऐसी सूचीबद्घ कंपनियां भी हैं जो लगभग सुषुप्तावस्था में रही हैं और जिनको बंद किया जाना चाहिए। जाहिर है पूरी व्यवस्था को सुसंगत किया जाना आवश्यक है। यह भी अच्छी खबर है कि कंपनी मामलों का मंत्रालय इस मामले में सेबी के साथ मिलकर काम करना चाहता है। बहरहाल, यह बात भी ध्यान में रखी जानी चाहिए कि गैरसूचीबद्घ कंपनियों पर पडऩे वाला नियामकीय बोझ अनावश्यक रूप से बढ़ाया नहीं जाना चाहिए। अगर ऐसा होता है तो यह सरकार के कारोबारी सुगमता बढ़ाने के दावे के प्रतिकूल होगा। अंतरराष्टï्रीय स्तर पर भी इस संबंध में क्या कुछ हो रहा है, इसका गहन अध्ययन किया जाना चाहिए। सेबी के लिए चिंता की एक अतिरिक्त वजह यह भी है कि उसे इस बढ़े हुए काम से निपटने के लिए अपनी क्षमताओं में भी इजाफा करना होगा।
Keyword: company, sebi, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी),
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