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शेल तेल लगाएगा ब्रेंट की तेजी पर अंकुश!

राजेश भयानी / मुंबई 11 13, 2017

शेल तेल की मांग बढ़ी

डब्ल्यूटीआई और ब्रेंट के बीच बढ़ा अंतर
निकट भविष्य में कच्चे तेल, भले ही यह ब्रेंट हो या डब्ल्यूटीआई, की कीमतें मजबूत रहने के आसार
तेल की कीमतों में तेजी जारी न रहने की एक वजह है दुनियाभर में इलेक्ट्रिक वाहनों पर जोर दिया जाना
इस समय डब्ल्यूटीआई का कारोबार करीब 56 से 57 डॉलर प्रति बैरल पर हो रहा है, जबकि ब्रेंट तेल की कीमत 63 से 64 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई है

दोनों प्रमुख बेंचमार्क ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि दोनों तरह के तेलों की कीमतों में अंतर की खाई भी बढ़ती जा रही है। इससे अमेरिकी शेल तेल की मांग बढ़ी है और आगे डब्ल्यूटीआई (वेस्ट टैक्सस इंटरमीडिएट्स) की कीमतें भी बढ़ेंगी।  विश्लेषकों के मुताबिक इस समय ब्रेंट के दाम 12 फीसदी अधिक हैं। इतना ही नहीं, ऊंची कीमतों से शेल तेल का उत्पादन फायदेमंद हो जाता है। इसके चलते शेल तेल का उत्पादन बढऩे के आसार हैं, जो ब्रेंट तेल की कीमतों में बढ़ोतरी पर अंकुश लगा सकता है। 

इस समय डब्ल्यूटीआई का कारोबार करीब 56 से 57 डॉलर प्रति बैरल पर हो रहा है, जबकि ब्रेंट तेल की कीमत 63 से 64 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई है। हालांकि निकट भविष्य में कच्चे तेल, भले ही यह ब्रेंट हो या डब्ल्यूटीआई, की कीमतें मजबूत रहने के आसार नजर आ रहे हैं।

जोखिम सलाहकार कंपनी कॉमट्रेंडज रिसर्च के निदेशक ज्ञानशेखर त्यागराजन ने कहा, 'अब तक अमेरिका के शेल तेल उत्पादक केवल कारोबार जारी रखने के लिए नुकसान पर तेल बेच रहे थे, लेकिन अब उनके शेयरधारक नुकसान पर तेल नहीं बेचने की सलाह दे रहे हैं। अब कीमतें बढ़ रही हैं, लेकिन आम धारणा के विपरीत शेल तेल के उत्पादक ऊंची कीमतों का फायदा लेने के लिए बड़ी मात्रा में उत्पादन नहीं करेंगे।' 

शेल तेल के उत्पादकों की औसत लागत 60 डॉलर से अधिक होने का अनुमान है और वर्तमान कीमतें अभी उस स्तर पर नहीं पहुंची हैं, इसलिए कुछ उत्पादकों के लिए वर्तमान कीमतें मामूली फायदेमंद होंगी। अमेरिकी वेस्ट टैक्सस इंटरमीडिएट कच्चे तेल और ब्रेंट क्रूड की कीमतों के बीच भारी अंतर की वजह से अमेरिकी कच्चे तेल की मांग बढ़ रही है। अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में अमेरिकी तेल निर्यातकों ने रोजाना 21.3 करोड़ बैरल का रिकॉर्ड निर्यात किया। ज्ञानशेखर का कहना है कि शेल उत्पादक चाहेंगे कि कीमतों में ज्यादा से ज्यादा बढ़ोतरी हो और इसलिए वे बाजार में बहुत अधिक आपूर्ति नहीं करेंगे। इस बात के आसार हैं कि ओपेक एक साल पहले लागू की गई उत्पादन कटौती जारी रखेगा और उत्पादन में और अधिक कटौती नहीं करेगा। 

एक आर्थिक सलाहकार कंपनी फोकस इकनॉमिक्स की रिपोर्ट के मुताबिक, 'रूस और सऊदी अरब के अधिकारी 2018 में भी करार जारी रखने पर सहमत हैं। अमेरिकी कच्चे तेल का भंडार 27 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में घटकर 24 लाख बैरल पर आ गया। यह गिरावट थॉमसन रॉयटर्स के सर्वेक्षण में विश्लेषकों के गिरावट के अनुमान 17.5 लाख बैरल से काफी अधिक है। इससे अमेरिका में तेल का भंडार घटकर जनवरी 2016 के स्तर पर आ गया है।'

इस समय कच्चे तेल की कीमतों को लेकर तेजडिय़ा रुझान है। ओपेक और गैर-ओपेक देशों की संयुक्त मंत्रिमंडलीय निगरानी समिति के आंकड़ों से पता चलता है कि अनुपालना स्तर यानी पिछले साल के उत्पादन करार के तहत कटौती अक्टूबर में 120 फीसदी रही, जो इस करार के बाद सबसे अधिक है।  हाल में रूस और सऊदी अरब के अधिकारियों ने यह करार मार्च 2018 के बाद भी जारी रखने पर सहमति जताई थी। मांग के लिहाज से उभरती और विकसित अर्थव्यवस्थाओं के अच्छे वृहद आंकड़े तेल की कीमतों के लिए सकारात्मक हैं। 

फोकस इकनॉमिक्स रिपोर्ट में कहा गया है, 'तीन साल तक कीमतों में गिरावट के बाद अब वैश्विक स्तर पर तेल के भंडार में कमी आने के संकेत नजर आ रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद अमेरिकी शेल तेल उत्पादकों के बढ़ते उत्पादन और ओपेक करार के भागीदारों के अपने कोटे पर कायम रहने या न रहने की चिंताएं ब्रेंट कच्चे तेल की कीमतों में तेजी पर अंकुश लगा रही हैं।'

इसमें पश्चिम एशिया में भूराजनैतिक जोखिमों की भी एक अहम भूमिका होगी। विशेष रूप से ईरान और अमेरिका के बीच राजनीतिक तनाव बढ़ रहा है। तेल की कीमतों में तेजी जारी न रहने की एक वजह यह है कि दुनियाभर में इलेक्ट्रिक वाहनों पर जोर दिया जा रहा है। इन वाहनों से तेल की मांग में भारी गिरावट आएगी। इसलिए तेल उत्पादक देश इलेक्ट्रिक वाहनों के तेल की मांग पर असर डालने से पहले ऊंची तेल कीमतों का फायदा उठाना चाहते हैं। ज्ञानशेखर ने कहा, 'इससे ओपेक को तेल की कीमतें ऊंची रखने के लिए कम उत्पादन का फैसला लेना पड़ सकता है।'
Keyword: cruid oil, price, dollar,,
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