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देश में 'निर्माण' के लिए आरक्षित किया जाए समुचित बजट

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  November 13, 2017

रक्षा मंत्रालय के अधिकारी, सैन्य अधिकारी और रक्षा मंत्री प्राय: स्वदेशीकरण को लेकर प्रतिबद्घता जताते रहे हैं। परंतु स्वदेशीकरण के पक्ष में दलीलें बहुत कम दी जाती हैं। हाल में एक शीर्ष सरकारी अधिकारी ने फिक्की के एक सम्मेलन में मेक इन इंडिया और मेड इन इंडिया से जुड़े विषय पर बात की। लेकिन रक्षा राज्य मंत्री सुभाष भामरे और सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत समेत किसी ने स्वदेशीकरण को लेकर अपनी राय स्पष्टï नहीं की। क्या उनका स्वदेशीकरण वही था जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 'मेक इन इंडिया' पहल में है? क्योंकि वह विदेशी रक्षा सामग्री के लाइसेंसशुदा निर्माण के सिवा कुछ नहीं है। एक के बाद एक रक्षा खरीद मैनुअल इसे खरीदो और बनाओ तथा खरीदो और बनाओ (भारतीय) श्रेणियों में रखते आए हैं या फिर वक्ता देसी रक्षा मंचों के विकास की बात कर रहे थे जो सही अर्थ में मेक इन इंडिया होगा।

 
निर्माण की श्रेणी, खरीद की श्रेणी या खरीदकर बनाने की श्रेणी से एकदम अलग होती है। रक्षा खरीद नीति 2016 के मुताबिक खरीद और खरीद कर बनाने संबंधी श्रेणियों का लक्ष्य था लंबी अवधि में देसी रक्षा क्षमताएं तैयार करना। परंतु मेडइन इंडिया परियोजनाएं जिनके लिए गहन योजना, ढांचे और क्रियान्वयन की आवश्यकता है, उनको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेक इन इंडिया के नारे ने काफी धक्का पहुंचाया। सेना की इच्छा भी यही है कि तैयारशुदा हथियार खरीद लिए जाएं।
 
बीते दशक के दौरान सी-130जे सुपर हरक्यूलीस और सी-17 ग्लोबमास्टर परिवहन विमान, पी-81 समुद्री निगरानी विमान, सीएच-47एफ चिनूक और एएच-64ई अपाचे हेलीकॉप्टर, रफेल लड़ाकू विमान और एमआई-17 जैसी अरबों डॉलर की खरीद की गई। इससे सरकार की प्राथमिकता पता चलती है। नौसेना लगातार अपने युद्घपोत सफलतापूर्वक बनाती आई है।  केलकर समिति द्वारा 2005-06 में प्रस्तावित देसी निर्माण को लेकर रक्षा मंत्रालय की प्रतिबद्घता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस श्रेणी के लिए फंडिंग की भारी कमी है। वर्ष 2013-14 और 2015-16 में तो इस पर एक रुपया भी व्यय नहीं किया गया। इस श्रेणी को सबसे अधिक 184 करोड़ रुपये की राशि वर्ष 2016-17 में मिली। यह राशि बहुत कम थी। 
 
सरकार ने इन निर्माण परियोजनाओं को समर्थन देने की बात बार-बार कही है। मार्च 2012 में रक्षा मंत्रालय के अधिग्रहण महानिदेशक विवेक राय ने कहा कि यह कार्यक्रम अमेरिका डीएआरपीए का अनुकरण है। वह पेंटागन के डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट एजेंसी की बात कर रहे थे जिसका सालाना बजट ही 300 करोड़ डॉलर या 20,000 करोड़ रुपये है। डीएआरपीए के नवोन्वेष में इंटरनेट, स्टेल्थ तकनीक, जीपीएस, मानवरहित विमान या ड्रोन और माइक्रो-इलेक्ट्रो-मैकेनिकल सिस्टम शामिल हैं। यह अल्पावधि के चुनिंदा कार्यक्रमों को फंड करता है जो 3-5 साल में पूरे होने हों। विशेषज्ञों की टीम इस पर काम करती है। फंडिंग मॉडल के मामले में तो हमारी निर्माण श्रेणी इसके अनुरूप है क्योंकि रक्षा मंत्रालय निजी फर्म को एक प्रतिरूप तैयार करने में 80 फीसदी योगदान करती है। शेष 20 फीसदी राशि चुनी हुई एजेंसी देती है जो इसे विकसित कर रही है। डीपीपी-2016 ने मंत्रालय की 90 फीसदी की प्रतिबद्घता समाप्त कर दी है।
 
राय ने माना कि इन परियोजनाओं के जरिये गतिविधियों को नई शुरुआत दी जा सकती है। सरकार द्वारा भारतीय उद्यमियों को फंड देने से देश का रक्षा उद्योग मजबूत होगा। जनवरी 2015 में रक्षा मंत्रालय के रक्षा उत्पादन सचिव जी मोहन कुमार ने कहा कि हर साल 8 से 10 निर्माण परियोजनाएं शुरू की जाएंगी। परंतु अब तक केवल दो शुरुआती परियोजनाओं की निविदा की गई है जो टैक्टिकल कम्युनिकेशंस सिस्टम्स और बैटलफील्ड मैनेजमेंट सिस्टम को मिली। इनके लिए विकास एजेंसी का चयन जून 2012 और फरवरी 2014 में किया गया। परंतु मूल्य पर मोलभाव जारी है। अब तक एक भी अनुबंध नहीं हो सका है।
 
तीसरी 'मेक' परियोजना तो और भी परेशान करने वाली तस्वीर पेश करती है। सेना को 2600 बीएमपी-2 कैरियर की जगह फ्यूचर इन्फैन्ट्री कॉम्बैट व्हीकल (एफआईसीवी) की आवश्यकता है। यह छोटी-मोटी फायरिंग से बचाव करता है और टैंकों के साथ पेशकदमी भी कर सकता है। वर्ष 2010 में मंत्रालय ने अभिरुचि पत्र आमंत्रित किए लेकिन 2012 में इन्हें रद्द कर दिया गया क्योंकि उसने दोनों विकास एजेंसियों की चयन प्रक्रिया की अनदेखी कर दी थी। मंत्रालय को नया अभिरुचि पत्र जारी करने में तीन साल लग गए और यह 2015 में दोबारा जारी किया गया। अब पांच औद्योगिक समूहों द्वारा एफआईसीवी प्रस्ताव दिए जाने के बाद रक्षा मंत्रालय की क्रय प्रमुख स्मिता नागराज का मानना है कि चयन प्रक्रिया में कंपनी की वाणिज्यिक क्षमता पर जोर दिया गया, बजाय कि जटिल सिस्टम तैयार करने की उसकी क्षमता के। 
 
यह बात डीपीपी के विरोधाभासी है जिसमें कहा गया था कि अहम तकनीकी क्षेत्रों में भारतीय उद्योग का योगदान ही प्रस्तावों के आकलन का मुख्य मानक होना चाहिए। दुविधा में फंसी नागराज ने प्रस्ताव रखा है कि पांचों दावेदारों से विस्तृत परियोजना रिपोर्ट मांगी जाए। सेना ने इस पर आपत्ति ली क्योंकि इसमें विकास एजेंसी के बजाय पांचों डीपीआर का तकनीकी आकलन शामिल होगा। परंतु नागराज को लगा है कि एक संपूर्ण डीपीआर तैयार करने और उसका बचाव करने से यह आकलन भी मिल जाएगा कि निजी भारतीय कंपनी केवल विदेशी कंपनी की राह बना रही है या उसमें तकनीकी क्षमता है। मंत्रालय को पहली तीन परियोजनाओं से सीख लेकर सुनिश्चित करना चाहिए कि इन परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाया जा सके। अधिग्रहण के बजट का एक उचित हिस्सा निर्माण परियोजनाओं के लिए अलग किया जाना चाहिए।
Keyword: defense, military, budget,,
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