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नौकरशाही को करेंगे दुरुस्त तो ठीक होगी आर्थिक हालत

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  November 12, 2017

अगर आपने अपनी बीए की पढ़ाई में अर्थशास्त्र को बतौर विषय बरता है तो आपको एकदम शुरुआत में ही यह पढ़ाया गया होगा कि दुनिया का कारोबार मांग पर आधारित होता है। अगला सबक यह सिखाया जाता है कि मूल्य और मांग की मात्रा के बीच संबंध होता है। अगर किसी चीज की कीमत बढ़ती है तो आमतौर पर उसकी मांग कम होती है। आमतौर पर इसका उलट भी इतना ही सच होता है। 

 
बहरहाल, पढ़ाई के शुरुआती वर्ष में आपको यह नहीं सिखाया जाता है कि मुद्रा आपूर्ति का स्तर भी अर्थव्यवस्था में कुल मांग को प्रभावित करता है। यह मांग चक्र में तेजी भी ला सकता है और गिरावट भी। यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि मांग बढ़ रही है या घट रही है। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे मांग के साथ बदलाव कहा जाता है। यह ऊपर-नीचे होता है। इसे मांग में बदलाव भी कहा जाता है। कंपनियां इनमें से पहले पर ध्यान केंद्रित करती हैं और सरकारें दूसरे पर। मनमोहन ने बतौर अर्थशास्त्री सन 1996 से 2003 के बीच मांग में कमी को महसूस किया था और इसे ठीक ढंग से समझने में भी कामयाबी हासिल की थी। वर्ष 2004 से 2014 के दरमियान बतौर प्रधानमंत्री अपने एक दशक के कार्यकाल में मांग में जबरदस्त उछाल देखने को मिली। मांग में यह तेजी प्रचुर मुद्रा आपूर्ति की बदौलत संभव हुई। देश में उत्पादन की राह की कठिनाइयों को देखते हुए उनके कार्यकाल के अंत तक जबरदस्त मुद्रास्फीति देखने को मिली। 
 
जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो उन पर यह दबाव था कि वह मांग दोबारा पैदा करें। आठ नवंबर 2016 तक सबकुछ ठीकठाक भी चल रहा था। उस दिन प्रधानमंत्री की एक घोषणा से देश की मुद्रा आपूर्ति पूरी तरह बाधित हो गई। एक दशक में जो भी सुधार किया गया था वह एक झटके में खत्म हो गया और लगभग पुरानी स्थिति बन गई। अब उनकी सरकार हालात को दोबारा पटरी पर लाने की कोशिश कर रही है। बहरहाल, जल्दबाजी से सफलता मिलती नहीं दिख रही है। 
 
ऐसा इसलिए क्योंकि मांग चक्र में बदलाव एक और अहम चीज पर निर्भर करता है। वह है सरकारी नीतियों में भरोसा। अगर भरोसा मजबूत हो तो मांग बढ़ती है वरना इसका उलटा होता है। परंतु इस बारे में कोई बात नहीं कर रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारतीय जनता पार्टी राजनीतिक विश्वास की पूंजी को कारोबारी विश्वास समझने की भूल कर रही है। आज मोदी सरकार के सामने असली मुद्दा निवेश, ऋण, मुद्रा आपूर्ति तथा उन तमाम बातों का नहीं है जो अक्सर अर्थशास्त्री चर्चा करते दिखते हैं। असल मुद्दा यह है कि क्या औसत भारतीय को यह यकीन है कि देश की सरकार कुछ गलत नहीं करेगी। 
 
पी चिदंबरम ने चाहे जितनी बहादुरी दिखाई हो लेकिन आखिरकार वह एक कमजोर वित्त मंत्री साबित हुए जो सोनिया गांधी का प्रतिरोध नहीं कर सके। बल्कि उन्होंने उनको प्रेरित किया कि समेकित मांग चक्र को उच्च अनम्य आपूर्ति के समक्ष ले जाएं। इसके बाद जो महंगाई बढ़ी उसके चलते सरकार लोगों का भरोसा ही गंवा बैठी। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार भी समान वजह से ऐसी ही स्थिति में फंसती नजर आ रही है। इस सरकार का वित्त मंत्रालय भी राजग के सर्वोच्च नेतृत्व को नोटबंदी जैसी विचित्र नीतियों को आगे बढ़ाने से नहीं रोक पा रहा है। इसके अलावा वस्तु एवं सेवा कर परिषद के रूप में एक समिति कर निर्धारण कर रही है। सवाल यह है कि ऐसी संप्रभु शक्ति किसी समिति को कैसे दी जा सकती है?
 
मोदी सरकार के सामने यह एक बड़ी समस्या है। परंतु सरकार ऐसा कोई संकेत नहीं दे रही है कि उसने इस समस्या को समझ लिया है। सरकार बैंक ऋण वृद्घि और बुनियादी विकास में खर्च जैसे पुराने उपाय अपनाने में लगी हुई है। हो सकता है ये कदम जरूरी हों लेकिन ये पर्याप्त नहीं हैं। इस बीच रहस्यमय बात यह है कि मोदी के नेतृत्व में राजनीतिक यकीन जहां पूरी तरह बरकरार है वहीं आर्थिक नेतृत्व पर यकीन के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती। विश्व बैंक ने कारोबारी सुगमता को लेकर जो सूची जारी की है वह यकीनन मददगार साबित होगी लेकिन उतनी नहीं। जैसा कि मोहन गुरुस्वामी ने टेलीविजन पर कहा कि मामला नौकरशाही की बाधाओं का है, न कि आर्थिक नीति का। 
 
मोदी सरकार को अब कारोबारियों और ग्राहकों के मन से सरकार की मनमानी और बेतुकी मांगों का डर निकालना होगा। यह काम आसान नहीं होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि मामला केवल राजनीतिक नेतृत्व की आश्वस्ति का नहीं है। यह नए नियमों और कानून का मामला भी नहीं। इन सबसे बढ़कर यह कम प्रशिक्षित और भ्रष्टï नौकरशाही से जुड़ा है जिसे मोदी सरकार ने कुछ ज्यादा ही शक्तिशाली बना दिया है। सरकारें नीतियां बनाती हैं, सांसद कानून बनाकर उन नीतियों का प्रवर्तन करते हैं और हमारी नौकरशाही इन दोनों प्रक्रियाओं को नुकसान पहुंचाती है। परंतु सरकार और सांसद जहां चुनाव दर चुनाव आते-जाते रहते हैं, वहीं नौकरशाही बरकरार रहती है। विश्व बैंक की कारोबारी विश्वास संबंधी रिपोर्ट का असल संदेश यही है। इस सूची में 50 के भीतर स्थान पाने के लिए मोदी को सबसे पहले नौकरशाही को ठीक करना होगा।
Keyword: india, economy,,
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