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कृषि-कृषकों के हित में है मजबूत खाद्य प्रसंस्करण

चंद्रजित बनर्जी /  November 12, 2017

मजबूत खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र कृषि उत्पादकता बढ़ाने और नुकसान को कम करने में तो सहायक होगा ही साथ ही वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने में भी मददगार होगा। बता रहे हैं चंद्रजित बनर्जी

 
भारत में कई प्रकार के कृषि जलवायु क्षेत्र, विभिन्न प्रकार की मिट्टिïयां और भूभाग हैं जिनमें अनेक प्रकार की कृषि उपज होती है। इनमें अनेक प्रकार के अनाज, फल और सब्जियां तथा नाना प्रकार के पोषक सभी शामिल हैं।  इन संसाधनों के साथ भारत खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए एक स्वाभाविक केंद्र है। बहरहाल, देश में 10 फीसदी से भी कम कृषि उपज का प्रसंस्करण किया जाता है जबकि 30 फीसदी तक फसल खराब हो जाती है। अगर खाद्य प्रसंस्करण को व्यवस्थित ढंग से आजमाया जाए तो कृषि की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है, नुकसान से बचा जा सकता है और सरकार के 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य को पूरा करने में भी मदद की जा सकती है।
 
यह क्षेत्र कृषि विनिर्माण दोनों क्षेत्रों का अहम घटक है। कृषि क्षेत्र में यह किसानों की आय बढ़ाने में मदद करता है। इसकी बदौलत फसल उत्पादन में वृद्घि और उसका मूल्यवद्र्घन किया जा सकता है। कृषि विपणन सुधारों के साथ किसानों के उत्पादक संगठनों को बढ़ावा देकर तथा सिंचाई पर ध्यान केंद्रित कर कृषि क्षेत्र खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की मजबूत बुनियाद है। यह उद्योग सुनिश्चित करता है कि उपज का अधिकतम इस्तेमाल किया जा सके और उपभोक्ताओं तक वह सुरक्षित और साफ-सुथरी स्थिति में पहुंचे।
 
इसके अलावा खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र सर्वाधिक रोजगापरक इलाकों में से एक है। यह क्षेत्र कई अन्य पूंजी आधारित क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा रोजगार प्रदान करता है। खासतौर पर महिलाओं के लिए यहां काफी रोजगार हैं। इस तरह यह हमारी अर्थव्यवस्था की एक सामाजिक आवश्यकता को भी पूरा करता है। किसानों की आय के साथ-साथ यह महिला सशक्तीकरण का भी माध्यम है। 
 
फिलहाल खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र देश के कुल खाद्य बाजार में 32 फीसदी का हिस्सेदार है और उत्पादन, खपत, निर्यात और संभावित वृद्घि के मामले में पांचवें स्थान के साथ यह देश के सबसे बड़े उद्योगों में से एक है। वर्ष 2013 में जहां यह क्षेत्र 40 अरब डॉलर का था, वहीं सन 2020 तक इसके बढ़कर 100 अरब डॉलर होने की उम्मीद है।  भारत में खाद्य प्रसंस्करण पांच क्षेत्रों से मिलकर बना है- डेयरी, फल एवं सब्जी प्रसंस्करण, अनाज का प्रसंस्करण, मांस एवं पोल्ट्री प्रसंस्करण, मछली एवं उपभोक्ता वस्तुएं मसलन पैकेटबंद खाद्य और पेय पदार्थ। वर्ष 2015-16 में 15.55 करोड़ टन दूध के साथ भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक राष्ट्र रहा। भैंस के मांस, पालतू पशुओं और मोटे अनाज का भी यह सबसे बड़ा उत्पादक है। इसके अतिरिक्त अनाज, फलों और सब्जियों के उत्पादन के मामले में इसका स्थान दूसरा है। कुल खाद्यान्न उत्पादन में भी यह विश्व में दूसरे स्थान पर है। सरकार ने खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के विकास के लिए विशेष प्रयास किए हैं। मेक इन इंडिया अभियान के अधीन इसे महिलाओं के लिए रोजगार सृजन की खातिर खासतौर पर रेखांकित किया गया है। 
 
खाद्य प्रसंस्करण उद्योग से जुड़े मंत्रालय ने देश भर में कई मेगापार्क स्थापित किए हैं। इनका उद्देश्य हर क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली उन्नत खाद्य उपज को सामने लाना है। इन फूड पार्क को विश्वस्तरीय बुनियादी सुविधाओं, शोध सुविधाओं, परीक्षण प्रयोगशालाओं, विकास केंद्रों और परिवहन लिंकेज के साथ मजबूत बनाना होगा। मंत्रालय ने 41 मेगा फूड पार्क मंजूर किए हैं और नौ फूड पार्क पहले से परिचालित हो रहे हैं। 100 से अधिक शीत गृह शृंखलाएं परिचालित हैं जबकि 236 अन्य की मंजूरी दी जा चुकी है। 
 
कई ऐसी भी पहल हैं जिनको बुनियादी सुविधाओं और भंडारण सुुविधाओं के समायोजन, खाना बरबाद होने की समस्या से निपटने और उत्पादकों और उपभोक्ताओं दोनों के मूल्यवद्र्घन के लिए शुरू किया गया है। स्कीम फॉर एग्रो मरीन प्रोसेसिंग ऐंड डेवलपमेंट ऑफ एग्रो प्रोसेसिंग क्लस्टर्स (संपदा) के विकास के लिए 6,000 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की गई है। यह 500 करोड़ डॉलर तक की राशि इस उद्योग के आधुनिकीकरण के लिए जुटाने में मददगार हो सकती है। 
 
सरकार ने चिह्निïत फूड पार्क को रियायती दर पर ऋण देने के लिए विशेष फंड बनाया है और खाद्य एवं कृषि आधारित प्रसंस्करण उद्योगों तथा शीतगृहों तथा इसके बुनियादी क्षेत्र को बैंक ऋण के लिए प्राथमिकता वाला क्षेत्र बनाया है। देश की 130 करोड़ की आबादी और तेजी से विकसित होते उपभोक्ता बाजार (इसके 2025 तक 4 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है) के साथ भारत खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित करना चाहता है ताकि तकनीकी और उन्नत व्यवहार को इसका हिस्सा बनाया जा सके। फसल कटाई के बाद की सुविधाएं विकसित करने और शीत गृह का बुनियादी ढांचा विकसित करने पर 100 फीसदी एफडीआई की इजाजत है। हाल ही में ई-कॉमर्स के जरिये विनिर्मित खाद्य उत्पादों या भारत में उत्पादित खाद्य पदार्थ के लिए भी हाल में इसकी इजाजत दी गई।
 
विदेशों में भारतीय पकवानों की लोकप्रियता और कृषि उपज में निर्यात योग्य अधिशेष को देखते हुए कहा जा सकता है कि ऐसा एफडीआई प्रसंस्कृत खाद्य उपज के निर्यात में भी मददगार साबित होगा। हाल ही में आयोजित वल्र्ड फूड इंडिया के जरिए भी देश के खाद्य उद्योग की संभावनाओं को लेकर जागरूकता बढ़ाने और विदेशी निवेशकों, सरकार और उद्योग जगत को एक मंच पर लाने का लक्ष्य है। इसका लक्ष्य खाद्य क्षेत्र में स्टार्टअप और नवाचार को बढ़ावा देने का भी है।
 
अभी कई चुनौतियां बाकी हैं। अपर्याप्त परिवहन और भंडारण क्षमता के कारण खेत से उपभोक्ता तक पहुंचने में बहुत अधिक नुकसान होता है। जमीन का रकबा बहुत अधिक बंटा हुआ होने, तकनीक के कमतर इस्तेमाल और कमजोर उत्पादकता के कारण भी यह क्षेत्र प्रभावित होता है। खाद्य सुरक्षा और पैकेजिंग की नियामकीय व्यवस्था अभी विकास कर रही है। सुरक्षा और गुणवत्ता के मसले तथा कुशल श्रमिकों की कमी भी इस क्षेत्र को प्रभावित कर रही है।  इसके अलावा, बेहतर खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता प्रमाणन व्यवस्था, तकनीकी उन्नयन, निर्यात मानकों को शिथिल बनाना और ऋण तक आसान पहुंच की मदद से इस क्षेत्र में बदलाव लाया जा सकता है। 
 
उम्मीद है कि राज्य सरकारों से सलाह मशविरे के बाद तैयार की जा रही राष्ट्रीय खाद्य प्रसंस्करण नीति को जल्द से जल्द पेश किया जाएगा। इतना ही नहीं अनुबंधित कृषि, कृषि बाजार सुधार और सिंचाई तथा बेहतर कच्चे माल की मदद से कृषि उत्पादकता बढ़ाना आदि कुछ ऐसे कदम हैं जिनकी मदद से किसानों की आय में भी इजाफा हो सकता है। खुदरा खाद्य क्षेत्र में एफडीआई की इजाजत से भी विदेशी निवेश जुटाने में मदद मिल सकती है। खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र किसानों, श्रमिकों और महिलाओं के जीवन में बदलाव का एक अहम क्षेत्र है। वल्र्ड फूड इंडिया 2017 ने पहली बार भारतीय खाद्य क्षेत्र के लिए दुनिया के दरवाजे खोले हैं। उसे अपने समृद्घि खानपान की विरासत सामने रखने का अवसर मिला है। 
 
(लेखक भारतीय उद्योग परिसंघ के महानिदेशक हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: agri, आधुनिक मशीन, किसान, कृषि उपकरण,,
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