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संपादकीय /  November 12, 2017

जुलाई में लागू किए जाने के बाद से ही वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की लगातार आलोचना होती रही है। इसके पीछे इसमें मौजूद कमियां जवाबदेह हैं। समस्या जीएसटी के मूल विचार को लेकर ज्यादा नहीं थी बल्कि उसके क्रियान्वयन को लेकर की गई हड़बड़ी आलोचना के घेरे में थी। एक राष्ट्र एक कर के वादे के बावजूद यह व्यवस्था विभिन्न शर्तों के अधीन और जटिल थी। यह इसके मूल विचार के उलट था। विविध कर दरों के चलते एक ओर जहां नाना प्रकार की लॉबीइंग की राह खुली, वहीं कर दरें इतनी ज्यादा थीं कि उनके अनुपालन पर ही संशय खड़ा हो गया। तमाम तरह की प्रशासनिक नाकामियों और जीएसटी नेटवर्क की तकनीकी कमियों ने मामला और खराब कर दिया। मासिक आधार पर कर रिटर्न दाखिल करने के चलते तकनीकी क्षमता दबाव में आ गई। ऐसे में असहमति का उभार तय था। खासतौर पर नोटबंदी के बाद उपजी परिस्थितियों में।

 
इस संदर्भ में देखें तो जीएसटी परिषद ने शुक्रवार को जो फैसले लिए वे इस नई व्यवस्था की कमियों को दूर करने की दिशा में साहसी कदम हैं। यह सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए राजनीतिक लाभ का विषय भी हो सकता है क्योंकि फिलहाल गुजरात चुनाव में कांग्रेस उसके सामने है।  हल्के फुल्के बदलावों से परे देखा जाए तो यह जीएसटी दरों में अब तक का सबसे बड़ा संशोधन है। कुल मिलाकर 178 वस्तुओं को 28 फीसदी के शीर्ष कर दायरे से बाहर कर दिया गया। इसके अलावा भी अनेक वस्तुएं सस्ती हुई हैं। परिषद ने छोटे और मझोले उद्यमों के लिए कंपोजिशन स्कीम का लाभ लेने की खातिर तय कारोबार 1 करोड़ रुपये से 1.5 करोड़ रुपये कर दिया था। इतना ही नहीं कंपोजिशन स्कीम के तहत कर दर भी घटाकर 1 फीसदी कर दी गई। इसके अलावा विस्तृत इनपुट-आउटपुट रिटर्न की फाइलिंग और कर रिटर्न फाइलिंग की तिथियों को आगे बढ़ाकर अनुपालन का बोझ कम किया गया है। इसके चलते छोटे और मझोले उद्यमों की कई समस्याएं कम होंगी। इन व्यापक सुधारों से एक संकेत यह भी निकलता है कि जीएसटी अभी भी उस परिपक्वता के करीब नहीं है जितना कि उसे आदर्श रूप से होना चाहिए था। अभी भी इस कर ढांचे में तमाम अनियमितताएं हैं जिन्हें शीघ्र दूर किया जाना आवश्यक है। 
 
मूल जीएसटी ढांचे में कर रियायतों के लिए कहीं कोई गुंजाइश ही नहीं थी। परंतु निर्यातकों को नकदी संकट से उबारने के लिए जीएसटी परिषद ने 6 अक्टूबर की अपनी बैठक में जीएसटी से पहले की दो योजनाओं को जारी रखने का फैसला किया। इनके तहत मार्च 2018 तक निर्यात उत्पादन की सामग्री को शुल्क मुक्त प्राप्त किया जा सकता है। अभी यह भी स्पष्ट नहीं है कि कर दरों में ताजा कमी का सरकार के राजस्व पर क्या असर हो सकता है। अगर राजस्व में ज्यादा कमी देखने को मिली तो इससे मध्यम अवधि में समस्या पैदा हो सकती है। भले ही अल्पावधि में नीति निर्माताओं को इससे राजनीतिक लाभ मिले। 
 
राज्यों पर भी एकीकृत कर प्रक्रिया को लेकर काम करने की बहुत बड़ी जवाबदेही है। उन्हें भी कर दरों के साथ छेड़छाड़ कर अल्पावधि में लाभ हासिल करने के आकर्षण से बचना होगा। इससे एकल बाजार बनाने की अवधारणा को खासा नुकसान पहुंच सकता है। आखिरी बात, बदलाव का यह ताजा दौर एक आशा जगाता है कि देश 18 फीसदी और 12 फीसदी की दो स्तरीय कर व्यवस्था लागू करने की दिशा में बढ़ रहा है।
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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