बिजनेस स्टैंडर्ड - सम-विषम जैसे उपायों की क्या है प्रासंगिकता!
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सम-विषम जैसे उपायों की क्या है प्रासंगिकता!

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  November 10, 2017

हमारे पास ल्हासा नस्ल का एक छोटा शिकारी श्वान था जिसका नाम था टेडी। वह निचले खानों में रखी किताबों के अलावा कभी न तो किसी चीज को नुकसान पहुंचाता था न कहीं खाने या शिकार की तलाश करता था। एक दिन शाम उसे रसोई घर में चूहा नजर आ ही गया। उसने उसका पीछा किया और घबराया हुआ चूहा गैस सिलिंडर के पीछे फंस गया। टेडी ने एक पल के लिए अपने पहले शिकार को पकड़ा फिर जाने दिया। वह थोड़ा घबरा गया और हमें लगता है एक अजब शर्मिंदगी में पड़ गया। वह हमारे परिवार के साथ और बाद में उसकी यादों में बना रहा। वह हमारे अतिथियों का मनोरंजन करता। 'चूहा' कहते ही वह हरकत में आ जाता और सीधा गैस सिलिंडर के पीछे लपकता। उसे लगता कि वह एक बार वहां चूहा पकड़ चुका है तो हर बार वह वहीं मिलेगा। यह एक दास्तान बन गई क्योंकि जब भी कोई ऐसी भावना दिखाता है तो हम कहते हैं चूहे को वहीं मत तलाश करो जहां तुमने उसे एक दफा पाया था। 

 
सचाई यह है कि दिल्ली की आप सरकार पहली बार लाई गई ऑड-ईवन (सम-विषम) योजना में भी सफल नहीं रही थी। आंकड़ों से यही पता चला था कि इससे हवा की गुणवत्ता में नाममात्र का फर्क नहीं आया। हां यह राजनीतिक रूप से सफल योजना अवश्य रही। दिल्ली के लोगों को लगा (जिनमें ज्यादातर कई वाहनों वाले थे) कि चलो कुछ तो ऐसा हो रहा है जिसमें उनकी भी हिस्सेदारी है। चाहे जो भी हो, जैसा कि हमने पिछले दिनों दीवाली में पटाखों पर रोक के मूर्खतापूर्ण निर्णय पर कहा था, इसमें एक अहम भावना छिपी थी कि हमें भी कुछ करना है। समाचार चैनल समर्थन में उमड़ पड़े। कहा गया कि इससे हवा में सुधार होगा। इस बीच हाइब्रिड कार और घरों में लगने वाले एयर प्यूरीफायर निर्माताओं ने कार्यक्रमों का प्रायोजन शुरू कर दिया। दो जाड़े बीतने के बाद दिल्ली की आप सरकार दोबारा वही कर रही है। आप देश की सबसे लोकलुभावन कदमों वाली पार्टी बनकर उभरी है। इस मामले में उसने ममता बनर्जी तक के लिए चुनौती पैदा कर दी है। परंतु अन्य लोकलुभावन नेताओं वाले दलों के उलट इसमें विचारों की विविधता और समझदारी है। दिक्कत की बात यह है कि इसी सप्ताह पंजाब के आप नेता सुखपाल सिंह खैरा ने किसानों के साथ फसल अवशेष जलाए और कहा कि किसान तब तक ऐसा करना जारी रखेंगे जब तक उनको इसके निपटान के लिए 5,000 रुपये मासिक भुगतान नहीं किया जाएगा। गजब की बात है कि ठीक इसी वक्त आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल ट्विटर पर पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से मिलने का वक्त मांग रहे थे। अब आप इस पर हंसिए, रोइये या नाराज होइए। एक सवाल तो यह है कि क्या केवल दिल्ली की हवा प्रदूषित है? उत्तर है नहीं पूरे देश की। तो फिर दिल्ली को लेकर इतना आग्रह क्यों? 
 
सवाल तो अच्छा है लेकिन देश के अधिकांश ताकतवर लोग यहीं रहते हैं। प्रधानमंत्री और पर्यावरण मंत्री तक, पर्यावरण सचिव जैसे नौकरशाह, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, खासतौर पर वे जो पर्यावरण पीठ में बैठते हैं, सांसद, राजनयिक और मीडिया के दिग्गज तक सब यहां रहते हैं। अगर वे अपनी समस्या से ने नहीं निपट सकते तो शेष मुल्क के लिए क्या संभावना है? वह भी तब जबकि पूरे देश में हवा का स्तर खराब है, नदियां सूख रही हैं, झीलों का दम घुट रहा है और पहाड़ पिघल रहे हैं। 
 
ऐसा नहीं कि ये सब प्रयास नहीं कर रहे। परंतु हमारे नन्हें ल्हासा की तरह उनकी तलाश का सिरा गलत है। एक तरफ माननीय राष्टï्रीय हरित पंचाट (एनजीटी) है। वह दिल्ली को लेकर जितना चिंतित है उसे देखते हुए मैं बहुत सम्मान के साथ कहना चाहता हूं कि उसका नाम राष्टï्रीय राजधानी क्षेत्र हरित पंचाट रख दिया जाए। वह ऐसे फरमान जारी करता है कि तुगलक को रश्क हो जाए। मैं तो कहूंगा कि इसे जो भवन दिया गया है उसका नाम तुगलक भवन रख दिया जाए। 
 
उसका ताजा आदेश यह है कि दिल्ली के छोटे से प्रदर्शन स्थल को जंतर मंतर से हटाकर किसी ऐसे स्थान पर ले जाया जाए जहां होने वाला शोर शासक वर्ग के लोगों को परेशान न करे। आपको लगा होगा कि विरोध प्रदर्शन इसलिए किया जाए ताकि शासक उसे सुन सकें। बहरहाल, भला इस प्राधिकार को चुनौती कौन देगा? एनजीटी की ताजा सुर्खी है विनिर्माण पर रोक। आप कहेंगे यह अच्छा विचार है, हालांकि आर्थिक गतिविधियों को रोकना प्रदूषण रोकने का तरीका नहीं हो सकता। कहा गया है कि विनिर्माण का काम रुक जाएगा लेकिन ठेकेदार अपने मजदूरों को पैसा देते रहेंगे। भला ऐसा कौन सा ठेकेदार है? यहां तक कि राष्टï्रीय मानवाधिकार आयोग तक ने कुछ नोटिस जारी किए हैं। राज्य की शह पर धमका रहे गौ रक्षकों से निपटने का यह एक सुरक्षित दिखावा ही तो है। इसके बाद बात आती है सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित भूरे लाल समिति की जो सर्वोच्च न्यायालय के 17 मुख्य न्यायाधीशों का कार्यकाल देख चुकी। इस बीच दिल्ली की हवा की गुणवत्ता गिरती गई। शुरुआती दिनों में राजधानी के परिवहन को सीएनजी से बदलने से काफी असर पड़ा। बाद में वही ढाक के तीन पात। इन दिनों डीजल चालित वाहन और ट्रक मुख्य निशाना हैं। कहने का मतलब हर किसी के पास एक न एक शिकार है। 
 
निंदा कोई हल नहीं है लेकिन सबसे पहले हमें स्वीकार करना होगा कि वाकई समस्या है। उसके बाद यह मानना होगा कि राजनेताओं, न्यायाधीशों, सामाजिक कार्यकर्ताओं आदि ने अपने स्तर पर जो भी करना चाहा वह कारगर नहीं रहा। तीसरी बात, किसी का नाम लेने की कोई आवश्यकता नहीं है।  आप नेता अतिशि मरलेना ने उत्तर भारत का एक स्मॉग मैप ट्वीट किया जो बताता है कि समस्या केवल दिल्ली की नहीं है बल्कि पूरे क्षेत्र का दम घुट रहा है। यह इस मौसम में पहली समझदारी भरी बात है जो कही गई। जैसा कि मैंने पहले कहा आप में बौद्घिक वैविध्य भरा हुआ है। अगर आप इस नक्शे को पश्चिम की ओर ले जाएं तो पाएंगे कि पाकिस्तान का बड़ा हिस्सा भी इस दिक्कत से दो चार है। 
 
बहरहाल, कश्मीर समस्या के हल होने के पहले पाकिस्तान के साथ तो कुछ किया नहीं जा सकता है लेकिन प्रधानमंत्री से यह आग्रह किया जा सकता है कि वह दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाएं। एक ऐसा तरीका निकाला जाए कि किसानों को धान के अवशेष न जलाने के एवज में बढिय़ा क्षतिपूर्ति की जा सके, आखिरकार डीजल ट्रकों से प्रवेश उपकर के रूप में सैकड़ों करोड़ रुपये की राशि सर्वोच्च न्यायालय और एनजीटी के आदेश पर जमा की जा रही है। दिल्ली की स्मॉग की समस्या उन तमाशों से नहीं निपटेगी जो गाहेबगाहे देखने को मिलते हैं। यह अपने आप में ऐसा ही भ्रम है जैसे कि सांस या गले में अवरोध की तकलीफ मिंट की गोली खाने या अगरबत्ती जलाने से खत्म हो जाएगी। ऐसा नहीं होगा भले ही यह पतंजलि या ऐसे ही किसी अन्य ब्रांड की क्यों न हो। 
 
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्देशित ईपीसीए की रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली के स्मॉग का 38 फीसदी हिस्सा धूल से उपजा है। हवाई छिड़काव जैसे विचारों या फायर ब्रिगेड के जरिये वृक्षों को स्नान कराने जैसे मूर्खतापूर्ण उपाय तो भूल ही जाइए। दिल्ली सरकार पर दबाव बनना चाहिए कि वह वैक्यूम स्वीपिंग मशीन खरीदे जिसका वादा उसने 2016 में किया था। इसके बाद पुरानी डीटीसी बसों को बदला जाए। बीते सात सालों से एक भी नई बस नहीं खरीदी गई। सरकार के पास नकदी की कमी है? उसे मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त और सब्सिडी पर बिजली-पानी देने के पहले सोचना चाहिए था।  इन कदमों में वह आकर्षण तो नहीं है जो सम-विषम या प्रतिबंधों में है लेकिन इनसे मदद मिलेगी। हर बार स्मॉग के मौसम में इसके अलावा सबकुछ किया जाता है। 
 
यह अत्याचार है, सैकड़ों करोड़ लोगों के साथ यह सामूहिक ढकोसला। आखिर इसे क्या कहा जाए? चूंकि पत्रकारिता में सिनेमा जैसी रचनात्मक स्वतंत्रता नहीं है। यही वजह है कि हम वह शब्द इस्तेमाल नहीं कर सकते जो विशाल भारद्वाज की फिल्म इश्किया में विद्या बालन ने मनोहारी ढंग से प्रयोग किया था।
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