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सहज और प्रभावी दर

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  November 10, 2017

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद ने 28 फीसदी के कर दायरे में शामिल वस्तुओं की संख्या में भारी कटौती का जो काम किया है, वह उसे पांच महीने पहले ही कर देना चाहिए था। जब पहली बार इस उच्च कर श्रेणी की घोषणा हुई थी तब भी बड़े पैमाने पर इसका विरोध हुआ था। लेकिन सरकार में बैठे हरेक शख्स ने उच्च दर को लेकर जताए जा रहे प्रतिरोध को अनसुना कर दिया। इतनी ऊंची दर की अव्वल तो कोई जरूरत ही नहीं थी और वह भी मूल्य-वद्र्धित कर व्यवस्था का पालन करते आ रहे देश में तो इसका वजूद ही नहीं होता है। अब उच्च कर दायरे में शामिल वस्तुओं की संख्या को घटाकर 50 कर दिया गया है और रोजमर्रा के इस्तेमाल वाली अधिकांश वस्तुओं को निचले कर दायरे में डाल दिया गया है। इस बदलाव के बाद जीएसटी प्रणाली अब कहीं अधिक तर्कसंगत व्यवस्था नजर आती है। कुछ लोग कह सकते हैं कि सरकार को सद्बुद्धि आने के लिए पांच महीने का वक्त कोई अधिक नहीं है। इसी तरह जीएसटी परिषद ने भी इस मसलेे के समाधान के लिए शुरुआती दौर खत्म होने का इंतजार नहीं किया है।

 
लेकिन अभी आधा काम ही हुआ है। पांच फीसदी कर वाली सूची में शामिल वस्तुओं की संख्या में बढ़ोतरी होना इसके गलत दिशा में जाने का संकेत देता है। निम्नतम श्रेणी को भी 28 फीसदी वाले कर दायरे की ही तरह एक परिधि मानना चाहिए और उसमें केवल खास उत्पादों को ही शामिल किया जाना चाहिए। पांच फीसदी कर दायरे की कुछ वस्तुओं को आसानी से 12 फीसदी कर वाली श्रेणी में डाला जा सकता है। इसमें चीनी जैसी चीज शामिल है जिसका इस्तेमाल आमतौर पर सॉफ्ट ड्रिंक निर्माता और मिठाइयां बनाने वाले करते हैं। मिठाइयां बनाने में लगने वाली अन्य चीजें मसलन मक्खन और घी आदि प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों की तरह 12 फीसदी के दायरे में ही हैं।
 
अब भी असंगतता बनी हुई है। इसका कोई तार्किक कारण नहीं है कि सीमेंट क्यों 28 फीसदी की श्रेणी में है जबकि कंक्रीट 18 फीसदी के दायरे में है। निर्माण में भी इस्तेमाल होने वाले इस्पात को भी लकड़ी की तरह 18 फीसदी की श्रेणी में रखा गया है। लेकिन प्लाईवुड पर 28 फीसदी कर है तो उसके विकल्प पार्टिकल बोर्ड पर 12 फीसदी है। इसी तरह जलयान (या जहाज) पर 18 फीसदी कर है लेकिन पट्टïे वाले परिवहन उपकरणों पर पांच प्रतिशत कर लग रहा है।
 
यह मसला चुनिंदा चीजों को लेकर छिद्रान्वेषण से कहीं अधिक है। जब जीएसटी का विचार पेश किया गया था, तब किसी ने यह नहीं सोचा था कि शून्य दर के अलावा चार कर दरें होंगी। परंतु ये दरें तो अब हकीकत हैं। ऐसे में तार्किक विसंगतियों को कम करने का एकमात्र तरीका यही है वर्गीकरण में बदलाव के लिए लॉबीइंग की जाए और लागू दर का भ्रम खत्म करने के लिए 12 और 18 फीसदी की बीच वाली दरों को अधिकांश चीजों पर लागू  किया जाए। 
 
दो दरें होने से तमाम तरह के विवादों की आशंका, भ्रम और अतार्किकता को दूर करने में मदद मिलेगी। इससे चीजें आसान हो जाएंगी क्योंकि इनपुट और आउटपुट पर आम तौर पर एक ही कर लगेगा और प्रणाली में स्पष्टता भी आएगी। बाद में इन दो बीच वाली दरों का विलय कर एक आदर्श दर बनाई जा सकती है। वित्त मंत्री इस बारे में आधा संकेत दे भी चुके हैं। अगर यह आखिरी कदम उठा लिया जाता है तो जीएसटी सचमुच में अच्छा और सरल कर बन जाएगा।
 
एक बड़ा मसला बहुत ही अत्यधिक उच्च कर दरों की व्यवहार्यता या उसकी उपयोगिता को लेकर है। अत्यधिक उच्च दर को प्रत्यक्ष कर व्यवस्था में पहले ही त्याग दिया गया है। इससे जीडीपी की तुलना में आयकर राजस्व बढ़ा है। अब जरूरत है कि अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में भी इसे अपनाया जाए। एक बात जिसे सरकार और राजनेताओं को समझना होगा वह यह है कि कर व्यवस्था के जरिए असमानता को दूर करने की कोशिश बेमानी है। यह एक सीमित दायरे के बाहर कारगर नहीं होती है। भारत का अब तक का अनुभव तो यही कहता है। असमानता से निपटने के लिए बजट के व्यय वाले हिस्से का इस्तेमाल होना चाहिए। उसमें गरीबों की सामाजिक सुरक्षा के प्रावधान हों। दुनिया के तमाम विकसित लोकतांत्रिक देश ऐसा ही करते हैं। वे कर दरों को तो सहज और कारगर स्वरूप में ही लागू करते हैं।
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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